हिन्द महासागर क्षेत्र में चीन की ब़ढती शक्ति से चिंता
अमेरिकी हेरिटेज फाउंडेेशन के प्रतिष्ठित रणनीतिकार विशेषज्ञ देन चेंग का कहना है कि हिन्द महासागर में चीन के ब़ढते सैन्य प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका को भारत के साथ मजबूती से हाथ मिला लेना चाहिए। उन्होंने ओबामा सरकार से अनुरोध किया है कि वह इस बारे में पहल करे और समय रहते हिन्द महासागर को पूरी तरह चीनी कब्जे में जाने से बचाए। यह भारत और अमेरिका दोनों के लिए बहुत आवश्यक है। चेंग का साफ कहना है कि चीन अपनी चर्चित ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति के जरिए हिन्द महासागर के तटवर्ती तथा भारत के प़डोसी देशों को अपने प्रभाव में लाकर वास्तव में भारत के आर्थिक व रणनीतिक विकास को रोक कर उसे ठिकाने लगाना चाहता है। इस तरह वह एशियायी क्षेत्र तथा उसके सागरीय इलाके से अमेरिका का भी पांव उख़ाडना चाहता है। उनका यह कहना है कि जिस तरह अमेरिका चीन की ब़ढती सामरिक व आर्थिक शक्ति से चिंतित है, उसी तरह चीन भी भारत की ब़ढती शक्ति से परेशान है। फर्क यही है कि जहां चीन के पास भारत को नियंत्रित करने के लिए एक सोची समझी रणणनीति है, जिस पर वह काम भी कर रहा है, वहां अमेरिका के पास ऐसी कोई रणनीति नहीं है।
चेंग का कहना है कि वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए अमेरिका को हिन्द महासागर में अपनी उपस्थिति ब़ढानी चाहिए और भारत के साथ लगातार संवाद बनाए रखना चाहिए। भारत के पास भी एक अच्छी नौशक्ति है, किंतु वह चीन का मुकाबला करने के लिए काफी नहीं है। उसके लिए अमेरिका को उसका साथ देना चाहिए। दुनिया के स्तर पर अमेरिका अभी भी सामरिक शक्ति में सबसे आगे है, लेकिन उसकी वैश्विक उपस्थिति घटी है। शीतयुद्धकाल में तो प्राय: पूरी धरती के सभी रणनीतिक महत्व के क्षेत्रों में अमेरिका की मजबूत उपस्थिति थी। लेकिन शीतयुद्धकाल समाप्त होते ही अमेरिका अपने पांव समेटने में लग गया। इसे चीन को आगे ब़ढने के लिए काफी खाली जगह मिल गयी। उसने ब़डी चतुराई से हिन्द महासागर को अपने काबू में लाने का अभियान शुरू किया। इसके लिए उसने भारत के अतिरिक्त सारे तटवर्ती देशों को अपना मित्र बनाने तथा उनके बंदरगाहों पर अपनी उपस्थिति ब़ढाने का कार्य शुरू किया। ये सारे देश ज्यादातर गरीब व पिछ़डे हुए हैं, जिनके पास न अपनी कोई मजबूत नौसना है, न अच्छे बंदरगाह। चीन ने अपने खर्चे पर इन देशों के बंदरगाहों को विकसित करने का काम शुरू किया, शर्त केवल यही कि वहां उसके व्यापारिक पोतों के साथ सैनिक पोत भी आ जा सकेंगे। म्यांमार, बंगलादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान आदि के बंदरगाह इसी रणनीति के तहत विकसित किये जा रहे हैं।
विकास की गति तेज करने के लिए चीन की ईंधन की मांग ब़ढती जा रही है। अभी एक दो वर्ष पहले तक उसकी करीब ७५ प्रतिशत पेट्रोलियम उत्पादों की मांग उसके घरेलू स्रोतों से पूरी हो जाती थी। वह केवल २५३० प्रतिशत पेट्रोलियम का ही आयात करता था, लेकिन अभी पिछले एक वर्ष में उसने अपनी जरूरत का ५० प्रतिशत तेल ख़ाडी के देशों से आयात किया। पेट्रोलियम के उसके घरेलू उत्पादन में कोई कमी नहीं आयी है, जाहिर है कि खपत ब़ढने के कारण ही यह आयात ब़ढा है। उसका यह सारा तेल आयात हिन्द महासागर से होकर होता है। इसलिए वह अपनी इस ‘लाइफलाइन’ की सुरक्षा का पूरा प्रबंध कर लेना चाहता है। इसके साथ ही उसे भारत की ब़ढती शक्ति पर काबू भी करना है, इसलिए वह उसे चारों तरफ से अपने सैन्य उपस्थिति द्वारा घेर के रखना चाहता है। इसका मतलब यह नहीं है कि वह भारत पर कोई हमला करने की योजना बना रहा है, लेकिन वह भारत पर इस तरह का अपना सैनिक दबाव कायम करना चाहता है, जिससे कि वह अपने आर्थिक विकास की तरफ अधिक ध्यान न दे सके और अपना सैनिक खर्च ब़ढाए।
भारत इस दबाव में अपना सैनिक खर्च ब़ढा भी रहा है, लेकिन किसी भी तरह अकेले वह चीन को पीछे छ़ोडकर आगे नहीं निकल सकता। इसलिए उसे अमेरिका जैसी किसी ब़डी ताकत की सक्रिय मदद चाहिए। दुर्भाग्यवश अमेरिका पाकिस्तान के साथ उलझा हुआ है, जबकि पाकिस्तान केवल अरबों डॉलर की सहायता के लिए अमेरिका के साथ है, अन्यथा वह पूरी तरह चीन की गोद में जा चुका है। पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में चीन को तीन बंदरगाह विकसित करने की अनुमति दे रखी है। उसने चीन की मुख्य भूमि से इन बंदरगाहों को ज़ोडने के लिए प्रशस्त राजमार्ग बनाने व रेल लाइनें बिछाने की भी छूट दे दी है। इस स़डक व रेल मार्ग के निर्माण के लिए ११ हजार चीनी सैनिकों की गिलगिट व बाल्टिस्तान में उपस्थिति की खबर अमेरिकी दैनिक न्यूयार्क टाइम्स ने प्रकाशित की है। पाकिस्तान की सरकार ने गिलगिट व बाल्टिस्तान में चीन की उपस्थिति स्वीकार की है, लेकिन उसका कहना है कि ये चीनी सैनिक नहीं, बल्कि चीन के श्रमिक हैं, जो यहां भारी ब़ाढ व वर्षा के कारण क्षतिग्रस्त स़डक व पुलों के निर्माण के लिए वहां आए हुए हैं। अब यह कोई भी समझ सकता है कि पाकिस्तान या चीन की सरकार सीधे यह कैसे स्वीकार कर सकती है कि ये चीनी सैनिकों का समूह है, जो गिलगिट में विद्यमान हैं। दूसरे देशों में सहायता व निर्माण के लिए भी प्राय: सेना के जवान ही भेजे जाते हैं। इसलिए इस्लामाबाद व बीजिंग से किये गये दावों से न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट का खंडन नहीं हो जाता।
यह तो आइने की तरह साफ है कि आज भारत अपने क्षेत्र में पूरी तरह अकेला है। उसके सारे प़डोसी देश चीन के प्रभाव में हैं। पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार व बंगलादेश पूरी तरह चीनी प्रभाव में है। पूर्वी अफ्रीकी देशों में भी चीन की उपस्थिति ब़ढ रही है। इसलिए अमेरिका से अधिक भारत को इस बारे में सोचना है। हिन्द महासागर में यदि भारत और अमेरिका की सैन्य उपस्थिति ब़ढती है, तो स्वाभाविक है कि चीन की ‘लाइफ लाइन’ भारत और अमेरिका के दबाव में रहेगी। चीन पाकिस्तान से होकर ईरान से सीधी गैस पाइप लाइन बिछाने की योजना पर भी कार्य कर रहा है। लेकिन वह उसकी जरूरत का एक छोटा हिस्सा ही पूरा कर सकेगा और उसमें अभी कम से कम १० वर्ष और लगेंगे। इसलिए हिन्द महासागर भारत व चीनी हितों की दृष्टि से हमेशा महत्वपूर्ण बना रहेगा, इसलिए भारत व अमेरिका दोनों का रणनीतिक हित इसी में है कि वे इस क्षेत्र में आपसी सहयोग ब़ढाए।
