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जनप्रतिनिधियों की जान को खतरे क्यों?

Swatantra Vaartha  Fri, 3 Sep 2010, IST

जनप्रतिनिधियों की जान को खतरे क्यों?

अभी हाल ही में यह खबर चर्चा में आयी है कि देश के सबसे ब़डे राज्य उत्तर प्रदेश में गृहविभाग के फर्जी आदेश पत्र पर तमाम लोगों ने सरकारी सुरक्षा गार्ड ले रखे हैं और अब इस प्रसंग की जांच की जा रही है। एक दूसरी खबर भी उत्तर प्रदेश से ही है कि वहां के एक कैबिनेट मंत्री पर उनकी किसी व्यक्तिगत रंजिश को लेकर गत दिनों बमों से जानलेवा हमला किया गया। मंत्री समेत उनके सुरक्षा अमले के कई लोग घायल हो गये हैं। विधायकों, सांसदों और अन्य जनप्रतिनिधियों पर भी जानलेवा हमलों की खबरें अक्सर आती ही रहती है। बहुत बार तो यह हमले गैंगवार सरीखे होते हैं, जिसमें कई जानें जाती हैं और भारी खूनखराबा होता है।

प्रश्न यह है कि जनप्रतिनिधियों पर जानलेवा हमले क्यों होते हैं? देश की राजनीति में जब से अपराधियों का प्रवेश शुरू हुआ है और येनकेनप्रकारेण चुनाव जीत कर वे सांसद, विधायक और फिर मंत्री तक बनने लगे हैं, तभी से जनप्रतिनिधियों पर इस तरह के हमलों और हत्याआें की घटनाएं शुरू हुई हैं। आज के समय में जो प़ीढी जवान हुई है, वह शायद यह कल्पना भी न कर सके। अभी मुश्किल से ढाई दशक पहले तक सामान्य जनप्रतिनिधि से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक, सार्वजनिक कार्यक्रमों आदि में जनता के बीच में जाकर उनसे सीधे संवाद कर लेते थे और लोग उन्हें पुष्पगुच्छ या माला आदि भी पहना देते थे! अपने इतने ब़डे नेताआें या देश के कर्णधारों को अपने इतने नजदीक पाकर जनता को जो लगाव और प्रसन्नता महसूस होती थी, उसे आज महसूस करना आम लोगों के लिए संभव नहीं। स्व इंदिरा गांधी की हत्या के बाद से सत्ताऱूढ नेताआें ने तथा स्व राजीव गांधी की हत्या के बाद से कैसे भी नेता ने जनता के बीच सीधे जाने में भय महसूस करना शुरू कर दिया। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या नितांत राजनीतिक कारणों और अंतर्राष्ट्रीय षड्‌यंत्रों के फलस्वरूप हुई थी। इन दोनों शीर्ष नेताआें को सुरक्षा अधिकारियों द्वारा बताया भी गया था कि उन्हें किस तरह से खतरा है, लेकिन उन्होंने उस पर अमल इसलिए नहीं किया था कि उससे जनता में सही संदेश न जाता, लेकिन अब उप्र सरकार के मंत्री नंदी जैसे लोगों पर हुए हमले के पीछे जो कारण समाचार माध्यमों में आ रहे हैं, वे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि आजकल कैसेकैसे लोग राजनीति में आ रहे हैं और किस तरह वे अपने दागदार अतीत को मंत्रिपद की रजाई से ढंकने की कोशिश करते हैं ! उत्तर प्रदेश और बिहार में तो अपराधी प्रवृत्ति और चरित्र वाले जनप्रतिनिधियों के गैंगवारों में मारे जाने की लम्बी फेहरिस्त है। इस पर क़ोढ में खाज यह है कि ऐसे अपराधियों पर जब हमला होता है, तो उनकी पार्टी ही सबसे पहले अपनी धुुर विरोधी पार्टी पर हमला कराने का आरोप लगा देती है!

उप्र के इस ताजा मामले में सत्ताऱूढ बसपा और प्रमुख विपक्षी दल सपा की शर्मनाक बयानबाजी से पता चलता है कि ये राजनेता लोग खुद ही पुलिस और अदालत हो गये हैं! एक तरफ इस गंभीर घटना पर राज्य सरकार का एक शीर्ष पुलिस अधिकारी तर्कसंगत बयान दे रहा है, दूसरी तरफ बसपा प्रमुख और प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती इसे सपा के गुंडों की करतूत बता रही हैं,तो सपा प्रमुख और पूर्व रक्षा मंत्री/ मुख्यमंत्री मुुलायम सिंह यादव इसे माफियाआें का आपसी संघर्ष बता रहे हैं। ये दो अत्यंत वरिष्ठ राजनेताआें की गैरकानूनी बयानबाजी है और इससे यह महसूस किया जा सकता है कि मामले की जांच कर रही एजेंसियां कितने तरह के दबाव में आ जाती होगीं ! ये दोनों नेता भी अपनी इस असंवैधानिक हरकत को जानते हैं, लेकिन अपनेअपने गुंडे नेताआें को बचाना दोनों की राजनीतिक मजबूरी है।

नब्बे के दशक से भारतीय राजनीति में अपराधियों का प्रवेश और तेज हुआ। यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक दलों में इस राह को लेकर जो एक झिझक और संकोच था, वह खत्म हो गया। इसके पीछे राजनीतिक दलों का बारबार अल्पमत में आना ही प्रमुख कारण था। यह यक्ष प्रश्न हर राजनीतिक दल के सामने ख़डा था कि बहुमत में कैसे आया जाए ? इसके लिए जिताऊ उम्मीदवारों पर जोर दिया जाने लगाऐसा उम्मीदवार जो धन भी खर्च कर सके तथा प्रतिद्वंद्वियों से पंगा लेकर किसी भी तरह अपने पक्ष में वोट भी डलवा सके। ऐसे में गिरोहबंद अपराधियों से बेहतर उम्मीदवार और कौन हो सकता था ! उप्र ने तो इस मामले में अद्‌भुत कीर्तिमान स्थापित किया हैयहां तो चम्बल के खूंखार डकैतों तक को राजनीतिक दलों ने अपना प्रत्याशी बनाया और इसकी शर्मनाक शुरुआत चालचरित्र और चेहरा का शंखनाद करने वाली देश की दूसरे नम्बर की राष्ट्रीय पार्टी भाजपा ने की। फिर तो सभी राजनीतिक दलों के संकोच का जैसे ताला ही टूट गया ! आज देश में राज्यों की विधान सभाएं हों या संसद के दोनों सदन, अपराधियों के रक्तरंजित पैर उन्हें रौंद रहे हैं।

इस चिंतनीय समस्या के उत्पन्न होने का एक दूसरा पहलू भी है, जो है तो सामाजिक, लेकिन उसका जिम्मेदार भी देश का राष्ट्रीय नेतृत्व ही रहा है। सत्ताऱूढ दलों में लगातार भ्रष्टाचार व्याप्त होते जाने, इसके चपेट में धीरेधीरे नौकरशाही के भी आ जाने तथा इस सबके फलस्वरूप कानूनव्यवस्था की स्थिति खराब होती जाने से, जनता ने अपना काम निकालने के लिए अपने क्षेत्र के दबंगों की मदद लेनी शुरू कर दी। दूसरी तरफ, चुनावों के समय नेता लोग अक्सर अपनेअपने क्षेत्र के अपराधियोंं और दबंगों की मदद लेते रहते थे। इन सबसे अपराधियों को लगा कि जो काम वे नेता नामक दूसरे प्राणी केे लिए कर सकते हैं, वही वे अपने लिए क्यों न करें ? फिर जैसी कि कहावत है कि एक हाथ ही दूसरे हाथ को खुजाता है, नेता और अपराधी, दोनों ने गठज़ोड कर लिया और उसका नतीजा अब हमारे सामने है।

जनता भी जब यह जान गई कि विधायक, सांसद और मंत्री तक जब अपराधियों की मदद निःसंकोच लेते हैं, तो वह भी मदद या अन्य लाभ क्यों न ले। किसी क्षेत्र में एक छोटा सा हैंडपम्प, कहीं चार खम्भे ग़ाड कर बिजली के तार खींच देना और किसीकिसी को हजारपांच सौ रुपयों की मदद, यही वे कार्य हैं जिनको अपने गुगा] से करवा कर जेल में बंद एक खूंखार अपराधी आजकल चुनाव जीत लेता है। यह जानकर बहुत चिंता होती है कि अब समाज में इज्जत और रसूखदार नेताआें के मुकाबले दोदो दर्जन बदमाशों का असला लहराता हुआ गिरोह लेकर चलने वाला माफिया जनता में ज्यादा तवज्जो पाने लगा है। चुनाव में धन या अन्य प्रलोभन लेकर मतदाताआें द्वारा अब बिना किसी संकोच के वोट दिया जाने लगा है। अपने चुनाव क्षेत्र में बीसों वषा] से लगन से कार्य करने वाले लोगों को, अचानक वहां नमूदार हुआ एक माफिया अपनी गुंडई और पैसे के बल पर भारी मतों के अन्तर से हरा देता है। फिर अगले चुनाव के मद्देनजरे कोई और माफिया उस क्षेत्र में जब उतरता है, तो वहां मारकाट होना तो लाजिमी ही है। यही जीते या भूतपूर्व हुए अपराधी जब मारे जाते हैं, तो समाचार माध्यमों में खबरें आती हैं कि माननीय मारे गये! जबकि इस बात का खुलासा ही नहीं हो पाता कि माननीय जनसेवा करते हुए मारे गये या अपने किन्ही पूर्व या वर्तमान कुकमा] के कारण।

देश की गरीब जनता की ग़ाढी कमाई का पैसा अपराधी जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा पर खर्च करना भी एक ब़डा अपराध ही है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जिसे अपनी जान को बहुत ज्यादा खतरा हो वे कृपया जनप्रतिनिधि न बनें और अपनी जान की हिफाजत संविधान प्रदत्त अधिकाराेें से करते रहें। जो चुन लिए गए हैं और जिन पर हमले हो रहे हों, उनकी भी सघन प़डताल होनी चाहिए कि उन पर हमले क्या जनप्रतिनिधि होने के नाते हो रहे हैं या अपराधी होने के कारण? लेकिन यह जांच कराये कौन ? बहरहाल, चुनाव ल़डकर जनता की सेवा करने वही लोग आयें, जो अपनी जान जाने का रोन न रोते हों। यह इस देश का दुर्भाग्य ही है कि यहां मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भी अपनी जान को खतरा बताकर केन्द्र से और सुरक्षा की मांग करता रहता है, तो जनता के जानमाल की वह क्या रक्षा कर सकेगा।

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