चीन में दंड का भय और आर्थिक विकास
हाल ही में वैश्विक स्तर पर चीन की सकल घरेलु उत्पाद दर ११२ फीसदी हो जाने की खबर आई है। आर्थिक विकास के इस पैमाने पर चीन ने जापान को नीचे के पायदान पर धकेला और अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर जा पहुंचा। चीन में उन्नति की इस गति के सरोकार केवल औद्योगिक प्रौद्योगिक विकास पर अवलंबित नहीं हैं, कानून में सख्त और फौरी दंडात्मक कार्यवाई भी आर्थिक विकास दर को ब़ढाने में सहायक बनी हुई है। हाल ही में वहां भ्रष्टाचार के आरोप साबित होने पर दो अधिकारियों को मृत्युदंड तो दिया ही गया, उनकी चलअचल संपत्ति भी जब्त कर ली गई । यही नहीं एक अधिकारी की पत्नी को भी आठ साल की सजा दी गई है। प्रशासकीय तंत्र को भ्रष्टाचार व कदाचरण से मुक्त बनाए रखने के कुछ ऐसे ही उपाय हैं, जिनके बूते चीन विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने की ह़ोड में शामिल है। दूसरी तरफ हम हैं कि मौजूदा विकास कार्यक्रमों से देश में जो आर्थिक असंतुलन और क्षेत्रीय विषमता ब़ढ रही है, उस हकीकत से मुंह चुराते हुए भ्रष्टाचार का समाजीकरण करने में लगे हैं।
हमारे देश में समग्र और संतुलित विकास में भ्रष्टाचार सबसे ब़डी बाधा है। हम आर्थिक विकास के क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहे, जिस चीन की दुहाई देते नहीं अघाते वहां भ्रष्टाचार का आरोप सिद्ध होने पर क्या दुर्गति होती है,इसे कमोबेश नजर अंदाज ही करते हैं। हाल ही में चीन में दो अधिकारियों को मौत की सजा सुनाई गई है। बीजिंग के एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी वांग ई पर १८ लाख अमेरिकी डॉलर की रिश्वत का आरोप साबित हुआ और सजा मिली मौत। इसी तरह एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वेन छियांग को २४ लाख अमेरिकी डॉलर की रिश्वत लेने का आरोप तय होने पर मृत्युदंड दिया गया। यही नहीं इन दोनों की चलअचल संपत्ति भी जब्त कर ली गई। छियांग की तो पत्नी को भी आठ साल की बमुशक्त कैद की सजा दी गई है, क्योंकि वह छियांग को अनैतिक कृत्यों के लिए उकसाती थी। इन मृत्युदंडों पर चीन के लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी व समाजशास्त्रियों ने खुशी जाहिर की है। जबकि हमारे यहां के बुद्धिजीवी और मानवाधिकार संगठन भ्रष्टाचार व राष्ट्रद्रोह जैसे कामों में लिप्त सजायाफ्ता कैदियों के प्रति भी उदारता बरतने की वकालत करते हैं। ये पैरवियां अनैतिकता को प्रोत्साहित करने का काम करती हैं।
कानूनी प्रावधानों पर सख्ती से अमल के डर चलते ही चीन संतुलित आर्थिक विकास के बूते ६० कऱोड लोगों को गरीबी से निजात दिलाने में कामयाब रहा। जबकि हमारे यहां आर्थिक विकास में भ्रष्टाचार बरते जाने के कारण गरीबों की संख्या में हर साल इजाफा हो रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में सुरेश तेंदुलकर की रिपोर्ट कहती है कि देश में ३७२ प्रतिशत लोग गरीब हैं। जबकि यही आंक़डा २००४०५ में किए गए आकलन के अनुसार २७५ प्रतिशत था। इस रिपोर्ट ने तय किया है कि देश में ४१ कऱोड लोग ऐसे हैं, जो जीने के अधिकार से वंचित रहते हुए भुखमरी के दायरे में जीने को अभिशप्त हैं।
इसके पहले अर्जुन सेन गुप्त की रिपोर्ट ने तय किया था कि देश की ७७ प्रतिशत आबादी, मसलन ८३६ कऱोड लोग २० रुपये से भी रोजाना कम आय पर गुजारा करने को लाचार हैं। ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ में दर्ज ११८ विकासशील देशों की सूची में भारत ९६ वें पायदान पर है। इस सूची में जिस देश का स्थान जितना नीचे होता है, वह उतना ही भूखग्रसित देश माना जाता है। ‘वैश्विक भूख सूचकांक’में भारत के सूडान और रवांडा से भी नीचे चले जाने की आशंका जताई जा रही है। देश के आठ राज्य तो इतने बदतर हाल में हैं कि उनमें अफ्रीका के २६ सबसे गरीब देशों से भी ज्यादा गरीब रहते हैं। जिनकी संख्या ४२ कऱोड है। ऐसे में भारत की चीन से ह़ोड और वैश्विक महाशक्ति बनने की कामना एक दिवास्वप्न के अलावा कुछ नहीं है।
चीन ने अपने देश की विशाल आबादी को संकट न मानते हुए उसे कृषि उत्पादन, प्रबंधन व रोजगार से ज़ोडा। नतीजतन चीन देखतेदेखते इतना ब़डा निर्यातक देश बन गया कि आज वह दुनिया के कुल उत्पादों का पचास फीसदी निर्माण खुद करता है। इसके साथ ही चीन ने अपने प्राकृतिक संसाधनों को भी कमोबेश स्वच्छ व सुरक्षित बनाए रखा। जबकि भारत ने इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दोहन के लिए खुला ही नहीं छ़ोडा, विकास नीतियां भी कंपनियों के हित कैसे सुरक्षित रहें इस दृष्टि से बनाई गई। ये नीतियां विकास दर ब़ढाने में भी सहायक रहेंगी यह भ्रम भी हम पाले रहे। नतीजा यह निकला कि आर्थिक विकास के दौरान हमारी प्राकृतिक संपदा से भरे भंडार लगातार रीत रहे हैं और क्षेत्रीय व आर्थिक विषमता ब़ढ रही है। इस हश्र के चलते देश की आर्थिक हैसियत जो २० साल पहले चीन की तुलना में ८० प्रतिशत थी, वह अब घटकर बमुश्किल २५ फीसदी रह गई है। जिस देश की युवा शक्ति बेहतरी की खोज में बाहरी मुल्कों में प़ढने व बसने की मनसिकता बना रही हो, वह देश कैसे आर्थिक महाशक्ति बन सकता है ? एक जानकारी के मुताबिक मलेशिया ने भारतीय सैलानियों को वीजा पहले ही हासिल करने की बजाय, मलेशिया में ही पहुंचकर वीजा प्राप्त कर लेने की सुविधा दी थी। फलस्वरूप ४० हजार भारतीय इस सुविधा का लाभ उठाकर मलेशिया में ही घुसपैठियों की तरह घुलमिल गए। नतीजतन मलेशिया ने भारतीयों के लिए यह सुविधा बंद कर दी। यह स्थिति भारत में बंगलादेशी घुसपैठियों की तरह है, जो अपने वजूद को अपने देश से बेहतर व सुरक्षित भारत में महसूस करते हैं। लेकिन जिस देश के नागरिकों में अपने देश को समर्थ, समृद्ध और शक्ति संपन्न बनाने की बजाय विदेशों में स्थायी रूप से बसने की ह़ोड लगी हो, उस देश के वैश्विक महाशक्ति बनने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ?
देश में प्रतिभा पलायन और सुरक्षित भ्रष्टाचार की समस्याएं नई नहीं हैं। भ्रष्टाचार ब़डी बाधा होने के कारण ही कल्पनाशील एवं नवाचारी देश में रहकर कुछ नया नहीं कर पा रहे हैं। इधर टीनूआनंद जोशी, केतन देसाई, योगीराज शर्मा और सुरेश शर्मा जैसे भ्रष्टाचारियों के घरों से कऱोडोंअरबों की दौलत बरामद हुई है। यह दौलत उनके आय के स्रोतों से कहीं अधिक है, इसके बावजूद उनका बाल भी बांका नहीं होना इस बात का संकेत है कि चीन की तरह भ्रष्टाचार से ल़डने की राजनीतिक इच्छा शक्ति हम में नहीं है। नौकरशाही सुरक्षित भ्रष्टाचार में लगी रहेगी तो हम गरीबी से चीन की तरह नहीं उबर सकते ? हालांकि हाल ही में केन्द्र सरकार ने एक विधेयक के जरिये केंद्रीय सर्तकता आयोग (सीवीसी) को सिविल अदालत की शक्तियां दी हैं, जिससे भ्रष्टाचार की सूचना देने वाले की गोपनीयता भंग करने वाले व्यक्ति को क़डी सजा दी जा सके। लेकिन इस विधेयक की विडंबना यह है कि जांच की जवाबदेही सीवीसी की बजाय सीबीआई और पुलिस को सौंपी गई है, जिनकी निष्पक्षता और ईमानदारी पर जन सामान्य भरोसा नहीं करता। दरअसल हमारे यहां अब समांनातर कानून अपराधियों को दंड दिलाने का आधार बनने की बजाय उन्हें आरोप से मुक्ति के वैकल्पिक उपाय बन रहे हैं। ऐसे कानून न्याय प्रणाली को लंबित तो करते ही हैं, भ्रष्टाचार से जुटाई राशि इन्हें दोष मुक्त बनाने के काम आती है। लिहाजा विधयेकों के जरिये कानूनों की संख्या ब़ढाने की बजाय, कानून कम करने की जरूरत तो है ही कानून नौकरशाही व लोक सेवकों के लिए भय का ठोस कारण भी बनने चाहिए।
