एक पूर्व कैथोलिक फादर की नई किताब
एक और पूर्व कैथोलिक पादरी की किताब आई है, जिसमें रोमन कैथोलिक पादरियों और ननों के यौन जीवन और आर्थिक घोटालों का पर्दाफाश किया गया है। केरल निवासी शिबू कलममरमबिल ११ वषा] तक पादरी रह चुके हैं।
इस समय वह पादरी की सेवा छ़ोडकर दोहा एक भारतीय स्कूल में प़ढाते हैं। शिबू की किताब ‘हियर इज द हार्ट ऑफ ए प्रीस्ट’ (प्रस्तुत है एक पादरी का दिल) ने रोमन कैथोलिक चर्च में तहलका मचा दिया है। उन्होंने लिखा है कि कैथोलिक पंथ के ६० प्रतिशत से अधिक पादरी ‘सेक्स’ करते हैंं। ‘कान्वेंट्स’ (ईसाई आश्रमों व शैक्षिक केंद्रों) में समलैंगिक संबंध आगे हैं। शिक्षा में पैसों को घोर अनैतिक खेल चलता है। पादरी व अपने को ब्रह्मचारी घोषित करने वाले तमाम साधु ननो, विधवाआें व समाज की अन्य स्त्रियों से नियमित यौन संबंध रखते हैं और धन की अनियमितताआें में शामिल हैं। बहुत से पुरुषस्त्री पादरी या नन केवल आराम के विलासी जीवन के लिए इस तरह के साधुसाध्वी का वेश धारण करते हैं। कैथोलिक चर्च के तमाम पदाधिकारियों ने शिबू को विश्वासघाती व धर्मद्रोही करार दिया है, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने एक क़डवे सच का बयान किया है।
अभी करीब एक वर्ष पहले केरल की एक नन (साध्वी) सिस्टर जेस्मी की एक किताब प्रकाशित हुई थी ‘आमीन’ एक नन की जीवनी, जिसमें चचा] में नन के यौन शोषण व प्रत़ाडना के किस्से पेश किये गये थे। इस पुस्तक पर भी भारी हंगामा ख़डा हुआ था और पूरा चर्च जेस्मी के खिलाफ उठ ख़डा हुआ था। धीरेधीरे वह मामला किसी तरह शांत हुआ, तो यह नई किताब सामने आ गयी। इसमें भी कमोबेश उन सारी बातों की पुष्टि की गयी है, जो जेस्मी की किताब में उजागर हुई थी, लेकिन शिबू की किताब में और बहुत कुछ है। ३९ वर्षीय शिबू करीब २४ वषा] तक चर्च से सीधे ज़ुडे रहे। १३ वर्ष उन्होंने ईसाई सेमीनरी में प़ढाई की, फिर ११ वषा] तक पादरी के पद पर रहे। इस जीवन में उन्होंने जो कुछ देखा, सुना व भोगा, उससे उन्हें इस अति पवित्र दिखायी देेने वाले जीवन से घृणा हो गयी और वह उसके बाहर आ गये। उन्होंने अपनी किताब में यह लिखने में कोई संकोच नहीं किया कि चर्च में बहुत से लोग केवल विलासिता व पैसे के लिए आते हैं। साध्वी का पवित्र जीवन जीने के लिए यीशु की शरण में आने वाली युवतियों का किस तरह यौन शोषण होता है, समलैंगिकता और ब्लू फिल्मों का कितना इस्तेमाल होता है, वह सब बहुत ही शर्मनाक है। शिबू ने लिखा है कि चर्च व मिशनरीज में बच्चों व महिलाआें की गरीबी का फायदा उठाकर किस तरह उनका शोषण किया जाता है।
यह सब अब कोई चौंकाने वाली या नई बात नहीं रह गयी है। पिछले दिनों यूरोप और अमेरिका के कैथोलिक चचा] में किशोर बच्चेबच्चियों के शोषण और पादरियों के यौनाचार को लेकर भारी हंगामा ख़डा हो गया था। वर्तमान पोप बेनेडिक्ट१६वें से इस्तीफे की मांग की जा रही थी। उन्होंने बारबार इसके लिए क्षमायाचना की। भारी राजनीतिक व सामाजिक दबाव डालकर किसी तरह पूरे मसले को दबाया गया। वास्तव में पूर्ण ब्रह्मचर्य के पालन का उपदेश करने वाले जितने भी धर्म व पंथ हैं, उनमें इस तरह के यौनापराध बहुत गहरायी से व्याप्त है। बहुत से संगठित धमा] तथा मठों में विलासिता के जो साधन उपलब्ध हैं और उनका मठाधीशों द्वारा जिस तरह उपभोग किया जाता है, उसमें पूर्ण ब्रह्मचर्य का निर्वाह असंभव प्राय: है। विरले ही कोई उस वातावरण में अपने तन और मन की शुद्धता बनाये रख सकता है। प्रकृति केे विरुद्ध किसी भी साधना की यात्रा जल्दी ही विफल हो जाती है। अच्छा होता यदि इन संगठित धमा] के कर्णधार इस सच्चाई को स्वीकार करते तथा अपने सिद्धांत व आचार के नियमों में तदनुकूल संशोधन करके उसे अधिक व्यावहारिक बनाने का प्रयास करते।
अयोध्या के रामलला की गरीबी
अयोध्या के रामजन्म भूमि की विवादित स्थली पर निर्मित अस्थाई मंदिर में विराजमान रामलला को भारी गरीबी में जीवन काटना प़ड रहा है। उनके पुजारी और सेवक भी आर्थिक संकट के शिकार है। कैसी विडंबना है कि इस मंदिर तथा वहां उपस्थित रामलला की प्रतिमा की रक्षा के लिए कऱोडों क्या अरबों रुपये खर्च किये जा रहे हैंंं, उनकी सेवापूजा, भोगराग तथा रखरखाव के लिए केवल ४३,६०० रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया गया है। इसमें पुजारियों व सेवकों के वेतन भी शामिल हैं। ब़डे पुजारी सत्येन्द्र दास ने सरकार से मांग की है कि मंदिर के सेवापूजा के खर्चे की राशि ब़ढायी जाए। जितना धन अभी मिल रहा है, उसमें आरती पूजा करना भी मुश्किल हो रहा है।
मंदिर में पांच बार आरती होती है, प़ेडे का भोग लगता है और फूलमाला से श्रृंगार किया जाता है। इस समय देशी घी (जिसकी बत्तियों से आरती होती है), प़ेडा तथा फूल आदि सब महंगे हो गये हैं। जो ४३,६०० रुपये मिलते हैं, उसमें २३,००० करीब वेतन में निकल जाते हैं, बाकी २० हजार रुपये में महीने का खर्च नहीं निकल पाता। पुजारियों का वेतन भी बहुत मामूली है। ब़डे पुजारी को पांच हजार और छोटे पुजारियों को तीनस़ाढे तीन हजार रुपये महीने के मिलते हैं। इसमें उनका अपना गुजारा करना भी मुश्किल है।
पुजारी सत्येंद्र दास के अनुसार मंदिर में रखे गुल्लक (हुंडी) में हर महीने करीब ड़ेढ लाख रुपये च़ढावे के आते हैं, जो सरकारी खजाने में चले जाते हैं। सरकार यदि च़ढावे का धन ही पूजाअर्चना के खर्र्र्च के लिए दे दे, तो मंदिर की कठिनाई दूर हो जाए। पुजारी सत्येंद्र दास वषा] से खर्चा ब़ढाने की गुहार कर रहे हैं, लेकिन सुनवाई अब तक नहीं हो सकी है। अब उन्होंने मीडिया के माध्यम से इसकी गुहार लगायी है, देखना है कि क्या स्थानीय प्रशासन व राज्य सरकार इसे सुधारने की दिशा में अब कोई कदम उठाती हैै या नहीं। यदि नहीं, तो राम भक्त समाज को ही कुछ करना चाहिए।
