संकेत देता लेह का जलप्रलय
जिस लद्दाख में तीनचार साल में मुश्किल से दोतीन इंच वर्षा होती है, वहां बादल फटने से जलप्रलय हो गया। याद रहे कि हिमालय की गोद में ह्लश्वयाले की शक्ल में बसे लेह नगर में जल निकासी की कोई व्यवस्था कभी नहीं रही ।
इससे भी गंभीर बात है कि इन पह़ाडी ढलानों का सफाचट यानी वनस्पतिविहीन होना। लद्दाख की जमीन नंगी होने के कारण वर्षाजल के साथ मिट्टी और मलबा तेजी से बहकर आया। जिस चेरापूंजी में विश्व की सर्वाधिक वर्षा होती है, वहां पेयजल का घोर अभाव है। अहमदाबाद और ब़डोदा में स़डकों पर नावें चलती है। भोपाल में आधा सावन बीत जाने के बाद भी वर्षा नहीं हो रही है। चीन और पाकिस्तान भीषण ब़ाढ से जूझ रहे हैं। रूस में इन दिनों भीषण गर्मी है। यद्यपि रूस विश्व भर का एकतिहाई गेहूं पैदा करता है, लेकिन अब सूखे के कारण वहां तीस मिलियन टन गेहूं कम पैदा हुआ है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय बाजार में गेहूं के भाव ब़ढ जाएंगे।
दुनिया भर में कुदरत का जो कहर बरपा हो रहा है, ये उसके कुछ उदाहरण हैं। हम भी इससे अछूते नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि विगत कुछ वषा] से वैज्ञानिक और पर्यावरणविद जिस ग्लोबल वार्मिंग तथा क्लाइमेंट चेंज की चेतावनी देते आ रहे हैं, अब यह उसी की भयावह विभीषिका है। पर्यावरण के दुष्प्रभाव देशों और महाद्वीपों की भौगोलिकराजनीतिक सीमाएं लांघकर विश्वव्यापी प्रभाव डालने लगे हैं। नेपाल में जब जंगल कटता है और भूमिक्षरण होता है, तो एक ओर जहां कोसी जैसी भारतीय नदियों में ब़ाढ आ जाती है, तो वहीं दूसरी ओर बंगाल की ख़ाडी में रातोंरात टापू बन जाते हैं। राजस्थान का रेगिस्तान जब मध्य प्रदेश की तरफ ब़ढता है, तो हमारा उत्तरपश्चिमी भाग प्रभावित हुए बगैर नहीं रहता। वहां भी मरुस्थलीकरण के लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं।
ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज को लेकर विगत दो दशकों से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंतहीन विचारविमर्श पहले ब्राजील के रियोडिजेनेरों में, फिर जापान के क्योटो में और कुछ महीने पहले ही डेनमार्क के कोपेनहेगन में हुआ था, लेकिन पर्यावरण के ऊपर भी राजनीति के काले बादल छा गए हैं। विकासशील देश, जिनमें भारत तथा चीन प्रमुख हैं, कहते हैं कि इसका कारण है, उद्योगीकृत विकसित देशों द्वारा विषैली गैसों का उत्सर्जन। विकसित देशों का कहना है कि इसका कारण है, विकासशील देशों में धान की खेती जैसे कृषि कार्य और ईंधन के प्रयोग। अब दोनों में सौदेबाजी हो रही है कि विकसित देश विकासशील देशों को न केवल पर्यावरणमित्र प्रौद्योगिकी ही दें, बल्कि अपने नैसर्गिक साधनों को बचाए रखने के लिए मुआवजा भी दें।
भारत के भी हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्य, जहां अब भी अपेक्षाकृत काफी वनक्षेत्र हैं, केंद्र सरकार से ग्रीन फंड मांग रहे हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि कार्बन डाईऑक्साइड और मीथेन जैसी गैसों के उत्सर्जन का सामना करने के लिए आखिर क्या करें ? औद्योगिकीकरण तो रूक नहीं सकता। आखिर, आबादी के हिसाब से वस्तुआें का निर्माण तो करना ही प़डेगा। फिर, बनी हुई वस्तुआें का निर्यात करके पैसा भी कमाना है। आधुनिक विकास का मानक औद्योगिकीकरण ही तो है, इसलिए उससे कोई देश बच नहीं सकता। स़डकों, बांधों और भवनों का निर्माण भी वक्त की जरूरत है। अतः पर्यावरण को बचाने का एकमात्र तरीका यही है कि अधिकाधिक वृक्षारोपण किया जाए, क्योंकि वृक्ष न केवल कार्बन डाईऑक्साइड को सोखते हैं, बल्कि ऑक्सीजन भी पैदा करते हैं। नगरीयकरण के चक्कर में वृक्षों को जो हानि पहुंचती है, उसका जीताजागता मॉडल भोपाल है, जहां स़डकें च़ौडी करने और बहुमंजिला इमारतें बनाने के लिए ध़डाध़ड प़ेड काटे जा रहे हैं।
लद्दाख में लेह का जलप्रलय मॉडल हमारे सामने है, वह हमारी आंखें खोलने के लिए काफी होना चाहिए। बादल फटने जैसी चक्रवाती बारिश को तो कोई रोक नहीं सकता है, लेकिन यदि जलागम क्षेत्र में जंगल का न सही, घास का ही आवरण हो, तो क्षति को कम किया जा सकता है। लेह में यह आवरण नहीं था, इसलिए क्षति भी भयानक हुई। प्रकृति के कोप के कारणों का निराकरण हमें करना ही होगा। वरना, शहरों में ब़ाढ आएगी, तो नदियां सूखी रहेंगी।
