इस राजनीति में क्या ‘भारत’ जिंदा रहेगा ?
खंडित भारत ने ६४वां स्वाधीनता दिवस मना लिया। कठोर सुरक्षा घेरे में संगीनों के साये में लालकिले की प्राचीर पर ख़डे होकर प्रधानमंत्री ने अपना भाषण प़ढ दिया। अनुशासन से मजबूर, भूखेप्यासे, थकेमांदे स्कूली बच्चों की भ़ीड, दिल्ली स्थित विदेशी दूतावासों के प्रतिनिधियों की औपचारिक उपस्थिति, सत्ता केन्द्रों को अपना चेहरा दिखाने को लालायित मंत्रियों और राजनेताआें के समूह ने आंखें बंद कर निद्रालु स्थिति में उस भाषण को अपने एक कान से दूसरे कान में निकल जाने दिया।
एक अखबार ने शीर्षक दिया कि भाषण एक ही चला आ रहा है, केवल प्रधानमंत्री का नाम और वेष बदल जाता है। किसी ने रेखांकित किया कि मनमोहन सिंह कितने भाग्यशाली हैं कि लालकिले से सातवीं बार स्वाधीनता दिवस का भाषण देकर वे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद तीसरे क्रमांक के नेता बन गए हैं। ९४ वर्षीय खुशवंत सिंह ने तो उन्हें भारत का सर्वोत्तम प्रधानमंत्री घोषित कर दिया, जबकि अमेरिकी साप्ताहिक ‘न्यूजवीक’ ने विश्व के वर्तमान प्रधानमंत्रियों में प्रथम स्थान पर ख़डा कर दिया। इसे मनमोहन सिंह का भाग्य कहें या भारतीय लोकतंत्र की विफलता कि चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुुुंचे बिना ही, वे सात वर्ष से भारत के प्रधानमंत्री पद पर अभिषिक्त हैं। इसी अगस्त महीने के एक अंक में ‘मेलटुडे’ ने पूरे दो पृष्ठों पर मनमोहन सिंह को अस्ताचलगामी और सोनिया पुत्र राहुल को उदयमान प्रधानमंत्री के रूप में प्रक्षेपित किया। वैसे भी वंशवाद सत्ता के शिखर पर स्थिरता को पसंद करता है। इसीलिए पिछले हफ्ते के अखबारों में यह प़ढकर थ़ोडा अजीब लगा कि ‘कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सोनिया का चुना जाना सुनिश्चित। पूरे बारह साल तक अध्यक्ष रहकर सोनिया ने रिकार्ड बनाया।’ पर किसी भी अखबार ने यह नहीं बताया कि उनके मुकाबले में दूसरा उम्मीदवार है कौन ? सत्ताऱूढ पार्टी में सोनिया और राहुल के अलावा कोई तीसरा नेता है भी कौन ? मीडिया में भी किसी नेेेेे यह विश्लेषण करने की आवश्यकता नहीं समझी कि लोकतांत्रिक प्रणाली का दावा करने वाली राजनीति में सबसे ब़डे दल के भीतर कोई चुनाव क्यों नहीं होता। केवल नियुक्तियां ही क्यों होती हैं ? पर, शायद अब हमने सोचना बंद कर दिया है और हम केवल प्रवाहपतित के समान बहते जा रहे हैं।
कम से कम यह तो जान लें कि हम प्रगति की ओर ब़ढ रहे हैं या परागति के गढ्ढे में गहरे गिरते जा रहे हैं। अमेरिकी साप्ताहिक ‘न्यूजवीक’ के जिस ताजे अंक ने मनमोहन सिंह को विश्व का सर्वोत्तम प्रधानमंत्री बताया, उसी ने भारत को प्रगति के पायदान पर अन्य राष्ट्रों की तुलना में ७८वें पायदान पर धकेल दिया। हमें चीन सेे अपनी तुलना करने का ब़डा शौक है, पर चीन तो जापान को पीछे छ़ोडकर विश्व में दूसरी आर्थिक शक्ति बन गया। अपनी सामरिक शक्ति के कारण अमेरिका के लिए चिंता का विषय बन गया। विश्वविद्यालयी शिक्षा के क्षेत्र में भी यदि अमेरिका का हार्वर्ड विश्वविद्यालय आज भी नम्बर एक है, तो चीन के ३४ विश्वविद्यालय शिखर की ओर ब़ढ रहे हैं, जबकि भारत का स्थान इनमें कहीं नहीं है। भारत में जन्मी जो प्रतिभा भारत में मुरझा रही है, वही विदेश की धरती पर पल्लवित और सम्मानित हो रही है, अपनी सफलता का डंका बजा रही है।
६३ वर्ष के बाद भी भारत की यह दुर्गति क्यों है ? उसका वातावरण नैराश्यपूर्ण क्यों हैं ? क्या भारतीय राजनेताआेंंंंंंं को यह प्रश्न परेशान कर रहा है, क्या यह प्रश्न उनके मन में उठ भी रहा है ? हम राजनेताआें से ही प्रश्न क्यों पूछते हैं? क्यों नहीं बुद्धिजीवियों से, समाजसेवियों, धार्मिक मठाधीशों और प्रवचनकारों से भी यही सवाल पूछते हैं? पूछने का मन तो करता है, पर पूछने का कोई लाभ नहीं दिखाई देता। कारण, स्वाधीनता प्राप्ति के बाद से भारत का पूरा सार्वजनिक जीवन राजनीति केन्द्रित हो गया है और राजनीति सत्ताभिमुखी हो गयी है, इसलिए मीडिया और हमारे मनोमस्तिष्क पर राजनीति व राजसत्ता ही पूरी तरह छा गयी है। हम हर बात के लिए राजनेताआें का मुंह ताकते हैं। उनके बिना किसी सार्वजनिक कार्यक्रम, किसी उत्सव यहां तक कि विज्ञान कांफ्रेंस या धार्मिक समारोह की भी कल्पना नहीं कर पाते। हमारी अपनी मानसिकता भी राजनीति केन्द्रित हो गयी है। इसलिए राजनेताआें से सवाल पूछना जरूरी हो गया है। यदि संसद को आप भारतीय लोकतंत्र का शिखर और दर्पण मानें तो संसद की चिंता के ताजे प्रश्न क्या हैं ? जाति आधारित जनगणना, सांसद निधि और सांसदों की वेतनवृद्धि या उत्तर प्रदेश की किसान उपद्रव की आग में राजनीतिक रोटियां सेंकने की प्रतिस्पर्धा और हंगामा। संसद राष्ट्र की समस्याआें पर ठंडे मस्तिष्क से तथ्यात्मक विचारमंथन का मंच न होकर नाटकीय विरोध प्रदर्शन करके दलीय प्रचार का मंच बन गया है।
अलीग़ढ के किसान प्रदर्शन को ही देखें। अधिग्रहीत भूमि के लिए समुचित मुआवजा पानेेे की मांग जायज हो सकती है,पर उसे त़ोडफ़ोड और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाने की राजनीति को क्या कहेंगे ? उसे जाट और जाटव के बीच किसने उलझाया ? अमेरिका से प़ढकर आए सीधे पिता चौ चरण सिंह के कंधों पर बैठकर राजनीति में उतरे चौ अजीत सिंह जो रातदिन मंत्री पद पाने का सपना देखते हैं, उस आंदोलन में क्यों कूद प़डे? टीवी चैनलों पर उन्होंने ‘महापंचायत, धरना व चक्का जाम’ का नारा लगाया। मुलायम सिंह तो ताक में बैठे ही थे। उनके लाल टोपीधारियों ने प्रदर्शनकारियों की अगुआई करने, उन्हें त़ोडफ़ोड के रास्ते पर धकेल दिया। छुटभैये कांग्रेसी कैसे पीछे रहते, उन्होंने रट लगाना शुरू कर दिया कि ‘डरो मत, आगे ब़ढो, सोनियाराहुल तुम्हारे साथ हैं।’ इस शोर शराबे में भाजपा नेता राजनाथ सिंह की इस आवाज को कौन सुनता है कि इस समस्या का एकमात्र हल है कि विकास काया] के लिए सरकार द्वारा अधिगृहीत भूमि के मुआवजे के बारे में कानून बनाकर समान नीति निर्धारित की जाए, पर राजनेताआें की रुचि समस्या के हल में नहीं, किसान आंदोलन में है, इसलिए वे आंदोलन को अलीग़ढ जिले से आगरा और आगरा से भी आगे गंगा क्षेत्र में ले जाने में जुट गये हैं। वे शांति नहीं अराजक, विघ्वंसक उग्र आंदोलन चाहते हैं। जनता के खून से वोटों की खेती उगाना चाहते हैं।
इसी प्रकार पंबंगाल में ममता की तृणमूल कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच सत्ता संघर्ष में वहां, की जनता लहूलुहान हो रही है। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस और सैंथिया स्टेशन की ट्रेन दुर्घटनाआें में सैक़डों लोग मारे गये और घायल हुए। इन दुर्घटनाआें के लिए माकपा ममता समर्थक माओवादियों को दोषी ठहरा रही है, जबकि ममता का आरोप है कि माकपा ने ही ये रेल दुर्घटनाएं उन्हें बदनाम करने के लिए रची हैं। माओवादी नेता किशन ने ममता की लालग़ढ रैली के लिए खुले समर्थन की घोषणा की। वे भारत सरकार के साथ वार्ता की मेज पर बैठने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कि भारत सरकार तीन माह के लिए एकपक्षीय युद्ध विराम करे और ममता को मध्यस्थ के रूप में स्वीकार करे। वे गृहमंत्री चिदंंबरम को हटाने और रेलमंत्री ममता को लाने की मांग कर रहे हैं। एक ही सरकार के दो कैबिनेट मंत्रियों में भेदभाव का अधिकार उन्हें वोट राजनीति नहीं तो किसने दिया?
इस वोट राजनीति के कारण देश एक बहुत ही संकटपूर्ण स्थिति में फंस गया है। कश्मीर से केरल तक पूरा देश पृथकतावादी मजहबी हिंसा के जब़डे में फंसा हुआ पा रहा है। भारत को जीवित रहना है, तो सभी राजनीतिक दलों को इस संकट के विरुद्ध एकजुट होना चाहिए,पर स्थिति उलटी है इस मजहबी पृथकतावाद के वोट बैंक को रिझाने के लिए सभी दलों के बीच ह़ोड सी लग गयी है, प्रत्येक दल अपने को उसका सबसे ब़डा हमदर्द दिखाने की कोशिश कर रहा है। छोटेछोटे जातिवादी क्षेत्रीय दल अपनी अस्तित्व रक्षा के लिए पूरी तरह उस वोट बैंक पर ही निर्भर हैं। यही कारण है कि जब दो अखिल भारतीय दलोंभाजपा और सोनिया पार्टी ने मिलकर अमेरिका के साथ आणविक संधि के विधेयक को राष्ट्रहित के अनुुकूल संशोधनों के साथ पारित करने का विचार किया तो लालू और मुलायम ने मुस्लिम वोटों को रिझाने के लोभ में बेसिरपैर का आरोप लगा दिया कि सीबीआई के शिकंजे से नरेन्द्र मोदी को बचाने के लिए भाजपा और सोनिया पार्टी के बीच गुप्त सौदेबाजी हो गयी है। इसके आगे वे सोच नहीं सकते।
राजनेताआें की व्यक्तिगत सत्ताकांक्षा में से उपजे अनेक छोटेछोटे जातिवादी क्षेत्रीय दलों की कुकुरमुत्ता ब़ाढ ने भारतीय राजनीति को उनका बंदी बना दिया। दोनों अखिल भारतीय दल उनके समर्थन पर आश्रित हो गये हैं। उनकी स्पर्धा का लाभ ये दल पूरी तरह उठा रहे हैं। इन दलों की दृष्टि से राष्ट्र पूरी तरह ओझल हो चुका है। राष्ट्रीय एकता की बात ही उनके लिए बेमानी है। वेे निर्लज्जता के साथ आरक्षण की जातिवादी राजनीति की धुरी से राष्ट्रीय एकता को खंडखंड करने पर तुले हुए हैं। इसका सबसे ब़डा उदाहरण है जाति आधारित जनगणना की मांग। स्वतंत्रता आंदोलन की भट्टी में तप कर निकले राष्ट्रीय नेतृत्व ने १९५१ की जनगणना में जाति का कालम हटाने का निर्णय बहुत सोचविचारकर लिया था। वे स्वतंत्रता आंदोलन के एकात्म राष्ट्रवाद और जाति विहीन समाज के सपने से प्रतिबद्ध थे। अनुसूचित जाति और जनजातियों की अलग से गणना का कालम भी उन्होंने केवल दस साल के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया था, किन्तु पिछले ६० वर्ष के अनुभव से स्पष्ट हो गया है कि १९३२ के पूना पैक्ट में अपनाया गया आरक्षण का सिद्धांत भस्मासुर बन गया है। सामाजिक एकता को त़ोडने के ब्रिटिश षड्यंत्र को विफल करने के लिए ही गांधीजी को अपने विवेक के विरुद्ध आरक्षण का सिद्धांत स्वीकार करना प़डा था। वे उसके दूरगामी परिणामों को स्पष्ट देख रहे थे। उन्होंने तभी चेतावनी दी थी कि जाति के आधार पर आरक्षण जन्मना जाति व्यवस्था को मिटाने के बजाय स्थायी बना देगा और वही हो रहा है। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा निर्मित अग़डेपिछ़डे, अनुसूचित जाति और जनजाति की कृत्रिम विभाजन रेखाएं अब वोट बैंक राजनीति का स्थायी आधार बनती जा रही हैं। यदि भारत के राजनेता वर्ग के पास राष्ट्रीय एकता की त़डप होती तो वे स्वाधीन भारत के ६० वर्ष लम्बे अनुभव के आधार पर इन कृत्रिम विभाजन रेखाआें और उन पर आश्रित आरक्षण नीति को समाप्त करने का साहसी निर्णय लेते। सामाजिकआर्थिक समानता के लक्ष्य को पाने के लिए आपस में बैठकर नये उपाय खोजते, एक नया राष्ट्रीय संकल्प लेते, पर उनसे यह आशा करना ही व्यर्थ है। वे व्यक्ति और दल से ऊपर उठकर सोच ही नहीं सकते। अगले चुनाव से आगे की दूरगामी नीति बना ही नहीं सकते।
यह दृष्टि संकुचन केवल जातिवादी क्षेेत्रीय दलों तक ही सीमित नहीं है। तथाकथित अखिल भारतीय दल भी उस व्याधि से मुक्त नहीं हैं। पूरा राजनीतिक वर्ग राष्ट्रीय प्रश्नों पर चाहे जितना ल़डे पर अपने हितों और सुविधाआें के प्रश्न पर एकजुट हो जाता है। संकुचित स्वार्थ ही अब हमारी राजनीतिक एकता का एकमात्र आधार रह गया है। इसका ज्वलंत उदाहरण संसद के इसी सत्र में सांसद निधि और सांसदों के वेतन व भत्तों की वृद्धि की मांग को लेकर सामने आया। अधिक वेतन के लोभ में उन्होंने स्वयं को जनसेवक और जन प्रतिनिधि के उच्च आसन से गिराकर सरकार के वेतन भोगी कर्मचारियों के समकक्ष रखना स्वीकार कर लिया। उनका वेतन के मुकाबले हमें मिलने वाला मानधन कम क्योंंं? यह कहते उन्हें तनिक लज्जा नहीं आयी। गांधीजी का ‘स्वयं वरण की हुई गरीबी’ का आदर्श उन्हें एक बार भी स्मरण नहीं आया। मंत्रिमंडल में एकदो मंत्रियों ने मतभेद जताया तो केवल इसलिए कि इस समय जब देश सूखे, ब़ाढ, भुखमरी और गरीबी से जूझ रहा है, सांसदों का वेतन भत्ता ब़ढाने से गलत संदेश जाएगा। पिछले लोकसभा निर्वाचन के बाद बताया गया था कि इस लोकसभा में पहले से अधिक सदस्य कऱोडपति हैं। कोईकोई सांसद तो २००२५० कऱोड रु के स्वामी हैं। यदि राज्यसभा और लोकसभा के सब सांसदों को मिलने वाले मानधन और भत्तों की एक वर्ष की राशि की गणना की जाए तो वह अरबों में पहुंचेगी। जन प्रतिनिधियों के लिए इस देश की गरीब जनता के खून पसीने से प्राप्त इस विशाल राशि का उपयोग क्या भारत को एक भौतिक, स्वावलम्बी, स्वाभिमानी सशक्त राष्ट्र बनाने के लिए हो रहा है या भ्रष्टाचार से आकंठ डूबे, आतंक से भयभीत, स्वाभिमानशून्य विखंडित अराजक समाज जीवन ख़डा करने में हो रहा है। चुनाव राजनीति पूरी तरह धनशक्ति और डंडा शक्ति पर निर्भर है। उसमें आदर्शवादी और सिद्धांतवादिता के लिए कोई जगह नहीं रह गयी है।
भारत को यदि जीवित रहना है, तो उसे इस पतनकारी, भ्रष्ट राजनीति का स्वस्थ लोकतांत्रिक विकल्प खोजना ही होगा। साथ ही, इस राजनीति से बाहर निकलने का उपाय भी शीघ्रातिशीघ्र ढ़ूंढना होगा। अब मात्र शब्दाचार से काम नहीं चलेगा। लोकतंत्र का सिद्धांत है कि जैसा समाज होगा, वैसा नेतृत्व लोकतांत्रिक प्रणाली से ऊपर आयेगा। और दूसरा सिद्धांत है कि प्रत्येक प्रणाली अपने सांचे में ढले हुए नेतृत्व को ही ऊपर फेंकेगी। इसलिए पूरा दोष राजनीतिक नेतृत्व का नहीं है, उस आयातित ब्रिटिश प्रणाली का है, जिसको स्वाधीन भारत पर जाने या अनजाने लाद दिया गया। दुःख इस बात का है कि हम केवल अरूयरोदन कर रहे हैं, वर्तमान राजनीति के दोषों की चर्चा कर रहे हैं, प्रत्येक दल दूसरे दल पर दोषारोपण कर रहा है, हम राजनेताआें की व्यक्तिगत आलोचना में रस ले रहे हैं। उनकी विवशता और सीमाआें पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि जागरूक लोकशक्ति का सृजन हो, जो स्वतंत्रता आंदोलन की मूल प्रेरणाआें के आलोक में स्वाधीन भारत की ६३ वर्ष लम्बी यात्रा का अध्ययन विवेचन करके एक नयी नैतिकबौद्धिक क्रांति का सूत्रपात करें। भारत को भारत के रूप में जिंदा रखने का यही एक मार्ग हमारी समझ में आता है।
