खनिज निर्नायत के दाम बढाइये
देश में खनिजों के नियात करने वाली कपनियों का दबदबा ह। इन कपनियों आर वाणिय मालय की में खनिजों का अधिकाधिक नियात करना चाहिये। नियात से मिली रकम का उपयोग हम अपनी दूसरी जरतों के लिये कर सकते है, जसे फाइटर विमानों आर फाफेट फटिलाइजर के आयात के लिये। सही है कि आयात नियात से सभी देश लाभावित होते है। स के पास फाफेट का अपार भडार है। स वय इतनी माा में फाफेट का उपयोग नहीं कर सकता है। हमारे पास लाह खनिज है अत हमें आपसी यापार से फाफेट मिल जाता है। परतु यापार उन वतुआें का किया जाता है, जो अपनी जरत से अधिक हो। किसान पहले अपनी जरतों के अनाज का भडारण करता ह। अतिरि माा का विकय करता ह। इसी कार हमें पहले अपने लाह खनिज को सुरक्षित कर लेना चाहिये आर शेष बचे खनिज का नियात करना चाहिये। इस से हमें लाह खनिज का नियात नहीं करना चाहिये। उत किम का लाह खनिज हमाटाइट होता है। इसका देश में १२ अरब टन का भडार है, जो कि ३० वषा] की जरत के लिये पया होगा। इसके अलावा घटिया किम के मगनेटाइट खनिज को ११ अरब टन का भडार उपलध ह, परतु इसका उपयोग वदेशी टील मिलों ारा कम ही किया जाता ह। ३० वष की अवधि देश के ५००० वषा] के इतिहास में चद मिनटों के बराबर होती ह। अत दीघकालीन खनिज सुरक्षा बनाये रखने के लिये लाह खनिज के नियात पर तकाल तिबध लगा देना चाहिये। अमेरिका ने ऐसा ही किया ह। अमेरिका में ति य ५० टन लाह खनिज का भडार उपलध ह, जबकि भारत में केवल २१ टन। अमेरिका ने लाह खनिज के नियात पर तिबध लगा रखा ह। भारत में भडार कम होने के बावजूद उपादन का लगभग आधा हिसा नियात किया जा रहा ह। पिछले वष नियात में २० पतिशत व होने के खबर है। चूकि हमारे पास सिफ ३० वष के लिये जरी खनिज उपलध है, अत इसका नियात तकाल बद कर देना चाहिये। विषय का दूसरा पहलू दाम का है। न ह कि नियात की माा बढाइ जाये अथवा दाम ? नियात की माा बढाने से माल के दाम घटते है आर आयातक को लाभ होता ह। जबकि माल के दाम बढाने से नियातक को लाभ होता ह, परतु माल के दाम हम मनचाहा नहीं बढा सकते है, चूकि विव बाजार में दूसरे सलायर उपलध ह। यदि हम दाम बढाते है, तो विकेता हमसे माल नहीं खरीदेगा।
वतमान में चीन के लाह खनिज का पहचता मूय लगभग ५००० पये ति टन ह । उपादन खच लगभग ३०० पये ति टन ह। इसके अलावा टस ३०० पये, चीन को ढुलाइ ६०० पये एव खनिज कपनी का लाभ १०० पये काट दिया जाये तो ३७०० पये ति टन की रकम शेष बचती ह। इसे कति की देन मानना चाहिये। न उठता ह कि यह ३७०० की रकम किसे मिलनी चाहिये ? सहज बात ह कि कति हम सबकी सामलाती धरोहर है। इसलिये कति पये ारा दान किये गये इस उपहार पर देश के सभी नागरिकों का साझा अधिकार ह। अत यह रकम सरकार को मिलनी चाहिये, परतु सरकार की वतमान नीति में यह रकम खनिज कपनियों ारा हासिल की जा रही ह, जो कि सवथा अनुचित ह। इस विशाल रकम को हासिल करने के लिये खनिज माफिया उप हो रही ह। अत खनिज के नियात पर ३७०० पये ति टन का टस लगाना चाहिये।
विषय का तीसरा पहलू कति की देन ह। वतमान में चीन को पहचता लाह खनिज का मूय लगभग ५००० पये ति टन ह। नियातक देशों को चाहिये कि विव बाजार में लाह खनिज के मूय में व का यन करें। लाह खनिज के मुय नियातक देश बाजील, आटेलिया आर भारत है। खबर है कि बाजील की मुख नियातक कपनी वले ने २००८ में चीन के आयातकों से मूय व की माग की थी । चीन के आयातकों ने इसे अवीकार किया। बाजील के थान पर उहोंने भारत से चालू ठेकों अथवा ‘पाट मार्केट’ पर आयात किये। जिस कार हडताल को टेड यूनियन का एक घटक तोडने का काय करता है, उसी कार भारत ने बाजील की मूय व को तोडने का काम किया। उचित होता यदि भारत भी बाजील के साथ हाथ मिलाकर चीन से मूय व की माग करता।
उपरो विवेचन से वतमान खनिज नीति के तीन बिंदु सामने आते ह। पहला यह कि खनिज पर रायटी में भारी व की जानी चाहिये। अतराीय मूय में उपादन आर ढुलाइ खच काटकर शेष रकम को रायटी के प में वसूल करना चाहिये। यह रकम घरेलू टील कपनियों एव नियातकों दोनों से वसूल करनी चाहिये। वतमान में लाह खनिज पर लगभग २० पये ति टन की रायटी देय होती है। इसे बढाकर ३७०० पये ति टन कर देना चाहिये। इस रकम को सरकार को वसूल करना चाहिये आर जनता को वितरित कर देना चाहिये। ऐसा करने से घरेलू खनिज का दोहन धीमा पडेगा आर दीघकाल में हमारी खनिज सुरक्षा थापित होगी। जनहित हासिल होगा सो बोनस में।
दूसरा बिंदु ह कि घटिया किम के मगनेटाइट खनिज के उपयोग को ाेसाहन देना चाहिये। मगनेटाइट पर रायटी की दरें यून रखी जा सकती है, जिससे कपनियों के लिये इसका उपयोग लाभद हो जाये। तीसरा बिंदु है कि भारत को बाजील एव आटेलिया के साथ मिलकर नियात कार्टेल बनाना चाहिये आर नियात पर भारी टस लगा देना चाहिये। भारत, बाजील एव आटेलियातीनों देश यदि एक साथ नियात टस में व करें तो चीन जसे आयातक देश एक नियातक को दूसरे नियातक के सामने खडा करके इस यूनियन को तोड नहीं सकेंगे।
उपरो सुझाव के विरोध में पहला तक ह कि खनिजों के नियात को हमें विकास का इजन बनाना चाहिये। यह तक उन देशों के लिये लागू होता है, जिनके पास खनिज के भडार घरेलू जरतों से बहत अधिक ह। मसलन आटेलिया के पास २००० टन ति य का विशाल लाह भडार माजूद ह। घरेलू जरतों से यह बहत अधिक है। भारत की थिति बिकुल भि है। हमारी जरतों के लिये खनिज पया माा में उपलध न होने से हमें इस राते को नहीं अपनाना चाहिये। किसान अपनी जरत के अ का भडारण करने के बाद शेष माल बिकी करता ह। ऐसा ही हमें खनिजों के साथ करना चाहिये। दूसरा तक ह नियात बद करने से उपादित खनिज का उपयोग करने की घरेलू उाेगों की क्षमता नहीं ह। रायटी अथवा नियात टस में व से हमारा खनिज उाेग भावित होगा आर उसमें कायरत लाखों लोग बेरोजगार हो जायेंगे। यह तक सही ह, परतु अपकाल में। तीस वष पूव के चमडे के नियात पर तिबध लगा दिया गया था। कुछ समय बाद देश से चमडे से बने माल का भारी माा में नियात शु हो गया।
