सऊदी अरब में नमाज के समय ‘लाउडस्पीकर’ पर प्रतिबंध
विश्व के अधिकांश देशों में मस्जिदों पर ध्वनि प्रसारक यंत्र के दर्शन होते हैं। इसके समर्थन में तर्क यह है कि नमाज के समय की जानकारी देने के लिए अजान दिया जाना अनिवार्य है। अजान अरबी का शब्द है, जिसका अर्थ ही निमंत्रण होता है। किन्तु यह ध्वनि कितनी ऊंची और कितने जोर से हो इसके लिए भी कुछ नियम और कानून हैं। यदि ध्वनि ऐच्छिक रूप से मर्यादित हो, तब तो सवाल ही पैदा नहीं होता है, लेकिन यदि उसे कोई अपने मजहब के प्रचार का माध्यम मान ले तब तो अनेक सवाल ख़डे हो जाते हैं। सभी प्रकार के प्रदूषणों को लेकर इन दिनों विश्व स्तर पर पृथ्वी सम्मेलन आयोजित किये जा रहे हैं। जिसमें हर देश से यह अपील की जाती है कि वह इस दिशा में सख्त कानून बनाए और इसे लागू करे, लेकिन देखा यह गया है कि इसका पालन नहीं होता है। सरकार तो कानून बना देती है, लेकिन प्रशासन इस संबंध में उदासीन रहता है।
पिछले दिनों सऊदी अरब की सरकार ने इस दिशा में सख्ती से काम लिया है। उसने मक्का की मस्जिदों के सभी ‘लाउडस्पीकर’ बंद करवा दिये हैं। देखा यह गया कि छोटी से छोटी मस्जिद पर ‘लाउडस्पीकर’ का अंधाधुंध उपयोग किया जाता है। सऊदी अरब में कट्टरवादी इस्लामी सरकार का राज है, जिसे अधिकांश मुस्लिम देश आदर की दृष्टि से देखते हैं। कुछ पंथ तो सऊदी सरकार को अपना आदर्श मानते हैं। इसलिए उन्होंने ज्यों ही इस प्रकार के आदेश की बात सुनी उन्होंने अपनी मस्जिदों से ध्वनि प्रसारक यंत्रों को अलविदा कह दिया है, लेकिन जो सऊदी सरकार की इस्लामी विचारधारा में विश्वास नहीं करते हैं, उनके यहां सोचविचार जारी है। अब सभी मस्जिद के इमाम और उसमें नमाज प़ढने वालों के लिए यह चिंता का विषय बन गया है कि सऊदी अरब सरकार ने जिन कारणों से यह निर्णय लिया है, उनके यहां भी इस प्रकार की स्थिति पैदा हो सकती है।
सऊदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने सऊदी शाह को जब यह बतलाया कि ब़डे पैमाने पर होने वाली आवाज रोगियों के लिए ब़डी हानिकारक होती है। इससे रोगी के स्वास्थ्य लाभ की गति मंद होने लगती है। विशेेषतया बच्चे अधिक बेचैन हो जाते हैं। उनकी हृदय ध़डकने ब़ढ जाती हैं, जिससे रक्त का भ्रमण अव्यवस्थित हो जाता है। वातावरण में उठने वाली तरंगें मनुष्य के शरीर पर बुरा प्रभाव छ़ोडती हैं। इनसे बालक और महिलाएंं बहुत जल्द प्रभावित होते हैं। इस प्रकार का प्रयोग कोई नई बात नहीं है। इन तरंगों के विषय में विश्व स्तर पर लम्बी जांचप़डताल हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इन प्रयोगों की रपट अपने सदस्य देशों को बहुत पहले ही दे दी है। वे इस बात की अपेक्षा करते हैं कि यह ध्वनि प्रदूषण जल्द से जल्द रोका जाना चाहिए। तेज आवाज स्वास्थ्य के लिए कितनी हानिकारक है, इस संबंध में अनेक प्रयोग हो चुके हैं। सभी सरकारें जुलूसजलसों से होने वाली ध्वनि के प्रसारण में मर्यादाएं तय कर चुकी हैं, लेकिन देखा यह गया है कि धार्मिक कार्यक्रमों में इस प्रकार की मर्यादाएं भंग हो जाती हैं। अजान भी इसी में एक है। सऊदी सरकार का यह अनुभव है कि रमजान के समय में यह ध्वनि ब़ढ जाती है और जोर की अजान देने की एक प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है। इसलिए अपने नागरिकों केे स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए सऊदी सरकार ने यह प्रशंसनीय कदम उठाया है। सवाल यह है कि क्या अन्य मुस्लिम राष्ट्र इससेे सबक लेंगे? सऊदी सरकार ने रमजान प्रारंभ होने से पहले यह निर्णय लिया, क्योंकि रमजान में मुस्लिम यात्रियों की भ़ीड ब़ढ जाती है। हज यात्रा तो एक विशेष तारीख पर ही होती है, लेकिन अन्य दिनों में भी मक्का की यात्रा करने और वहां रमजान व्यतीत करने में मुसलमान अधिक पुुन्याई और संतोष मानते हैं। इसे धार्मिक शब्दावली में उमरा की संज्ञा दी जाती है। रमजान के दिनों में सामान्यतः सभी मस्जिदों में ध्वनिवर्धक यंत्र की आवाज तेज हो जाती है। रात्रि की नमाज (इशा) के पश्चात तराबीह की नमाज विशेष रूप से प़ढी जाती है। यह पूरी नमाज जो लगभग एक घंटे से अधिक चलती है, उस समय तक ‘लाउडस्पीकर’ चालू रहते हैं।
सऊदी सरकार के इस निर्णय का जहां स्वागत हुआ है, वहां विरोध भी हो रहा है। १५ वर्ष पूर्व भी इस प्रकार का फतवा जारी हुआ था, लेकिन उसे मुल्लाआें ने और इमामों ने स्वीकार नहीं किया। रियाद से प्रकाशित दैनिक अल अरबिया ने लिखा है कि यह रोग हर प्रकार से ब़ढ गया है, तो उसका इलाज करना आवश्यक है। सरकार का कहना है कि स्वर्गीय शेख मोहम्मद बिन अशीमन से वह इस मामले में फतवा ले चुकी है। उनका कहना था कि ‘लाउडस्पीकर’ की आवाज केवल नमाज प़ढने वालों तक सीमित रहनी चाहिए। मस्जिद के बाहर उसका शोर हो इससे क्या लाभ है ? कुछ मुल्ला बहुत नाराज हैं, उनका मत है कि क्या अजान और नमाज की आवाज से किसी बीमारी पर असर प़ड सकता है? उससे तो उन पर अच्छा प्रभाव प़डेगा और वे जल्दी ठीक हो जाएंगे। सऊदी शासकों के कथन पर ब़डी बहस चल रही है। सऊदी अखबार अधिकतर इसके पक्ष में हैं, लेकिन बाहर से आने वाले नागरिक इसे अच्छा नहीं मान रहे हैं। फिलहाल लाउडस्पीकर जो बाहर लगाए गए थे, वे हटा लिए गए हैं। सरकार ने सख्ती शुरू कर दी है।
क्या भारत में मुंबई और दिल्ली जैसे नगरों में पुलिस सऊदी अरब का अनुसरण करेगी ? इस संबंध में अनेक बार विवाद हो चुका है, लेकिन पुलिस अत्यंत निष्क्रिय है। भारत में ज्यों ही कोई अधिकारी इस विषय में सख्ती बरतता है, तो मुस्लिम नेता पुलिस थानों में पहुंच जाते हैं और अपना दबदबा बतलाकर पुनः ध्वनिवर्धक यंत्रों का प्रयोग शुरू कर देते हैं। जो स्थिति सऊदी के ब़डे नगरों की है, वही हमारे देश की भी है। जब किसी बस्ती के आसपास कई मस्जिदें होंगी और वहां ध्वनि प्रसारक यंत्र की तरंगें एकदूसरे के साथ टकराएंगी तब वहां पर रहने वालों की स्थिति क्या होगी ? सवेरे की नमाज के समय जब सब कुछ शांत होता है, यह शोर बहुत ब़ढ जाता है।
इसलिए मजिस्दों में कितनी दूरी तक इस यंत्र का उपयोग करना चाहिए, उसे भी किसी न किसी प्रकार तय किया जाना चाहिए।
आज तो हर किसी त्योहार को मनाने का ढंग केवल तेज ध्वनि के यंत्रों और ढेर सारे बिजली झालर रह गए हैं। बिजली की झालरें होंं या अधिक वॉट के बल्ब, हर कोई सार्वजनिक खंभों से इनके ‘कनेक्शन’ लेकर अपनी गलियों और पंडालों को रोशन कर देता है। सरकारी धन से अथवा तो जनता की ग़ाढी कमाई के पैसों से अपने सामाजिक त्योहार और जुलूसों का आयोजन करना किस पंथ की सेवा है ? यह तो अपने पंथ के प्रति द्रोह और अन्याय है। इस संबंध में पुलिस तथा संबंधित नेताआे की सबसे ब़डी जवाबदारी है, लेकिन वोटराजनीति उन्हें इस मुद्दे पर अशक्त बना देती है। इस प्रकार के वातावरण में सऊदी सरकार का यह निर्णय प्रशंसनीय है। सऊदी सरकार के धार्मिक मामलों के मंत्री सालेह अलशेख की वहां के मीडिया ने प्रशंसा की है।
सऊदी सरकार ने अपने एक अन्य निर्णय में फतवा जारी करने वालों पर लगाम कसी है। पिछले कुछ समय से वहां फतवों की ब़ाढ आ गई है। हर मामले में मुल्ला और इमाम अपनी सकन को फतवों के नाम पर लागू कर देते हैं। इससेेेेे जनताजनार्दन दुःखी हो जाती है। सऊदी अरब केे शाह अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अजीज ने देश में ब़ढते हुए फतवों को नियंत्रित करने के लिए एक अध्यादेश जारी किया है। उन्होंने कहा है कि केवल उनके द्वारा नियुक्त उलेमा ही फतवा जारी कर सकेंगे। पिछले दिनों अनेक उलेमाआंे ने वर्तमान समस्याआे पर अपने फतवे जारी करके लोगों को परेशानी में डाल दिया। इससे जनता के बीच शंकाकुशंका का वातावरण बन गया। एक मसले पर जब अलगअलग राय होगी तो निश्चित ही लोगों में अनिश्चितता का वातावरण बनेगा। इस संबंध में मजहब से ज़ुडे मंत्रालय के मंत्री ने शाह से शिकायत की थी। उन्होंने इसे समाज का गंभीर मामला समझकर हस्तक्षेप किया और अपनी अंतिम राय से लोगों को सूचित कर दिया। किसी एक मामले पर जब अलगअलग राय होती है, तो केवल सामाजिक झग़डे ख़डे नहीं होते हैं, बल्कि मजहब का वास्तविक आदेश क्या है, इसे जानने से जनता वंचित रह जाती है। शाह अब्दुल्ला ने सऊदी अरब के ब़डे मुफ्ती को निर्देश दिया है कि इस्लामी कानूनों के क्रियान्वित किये जाने पर उनकी गिरफ्त होनी चाहिए। यह हमारा कानूनी दायित्व है, जिसे मनवाने के लिए उठ ख़डे हों। अपने इस आदेश की प्रति शाह ने कानून और गृह मंत्रालय को भी भेजी है। यह एक संयोग की बात है कि सऊदी अरब की दोनों समस्याएं भारत में भी मौजूद हैं। भारत का देवबंदी पंथ सऊदी अरब का अनुसरण करता है, इसलिए मस्जिद में लगे ध्वनि प्रसारक यंत्र और बातबात पर जारी किये जाने वाले फतवों पर सऊदी अरब की तरह विचार करेगा तो यहां के मुसलमानों का भी भला होगा।
