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सािहयकारों के बीच भी छाया रहा पाक िककेटरों का मसला

Swatantra Vaartha  Mon, 25 Jan 2010, IST

सािहयकारों के बीच भी छाया रहा पाक िककेटरों का मसला

आइपीएल३ के िलए िपछले सताह हइ िककेटरों की खरीद में िकसी पािकतानी िखलाडी को न लिए जाने के कारण ाय: पूरा पाकितान आकामक हो उठा है पाकितानी मीडिया ने तो इसे लेकर ऐसा तूफान खडा कर िदया है िक पािकतान के हर वग को भारत के िखलाफ कुछ न कुछ बोलने का माका मिल गया है । पाकितान के लेखक, पकार, सामाजिक कायकता सभी अपना क्षोभ य करने में लगेहै ।

भारत के जयपुर शहर में चल रहे साहियिक मेले में भी शनिवार को यही मुा छाया रहा। पाकितान सरकार ने तो भारत के सरकारी या गरसरकारी किसी भी आयोजन में शामिल न होने का फसला कर रखा ह। उसने सबसे पहले भारत की याा पर आने के लिए तयार सासदों की याा रदद किया, फिर अपनी कबडडी टीम भारत भेजने से मना कर दिया आर अब उसने अपने चुनाव आयोग के दल की भारत याा रदद कर दी ह। यह दल इस सोमवार से हो रहे भारतीय चुनाव आयोग के हीरक जयती समारोह में भाग लेने के लिए आने वाला था। पाकितानी सरकार का कहना ह कि वह अपना यह बहिकार कायकम तब तक जारी रखेगा, जब तक कि भारत अपनी गलती (?) सुधार नहीं लेता।

जयपुर के साहियिक मेले में शनिवार को एक सामूहिक चचा (पनेल डिकशन) के खुले स में यही मसला छाया रहा। पाकितानी लेखिका तथा मानवाधिकार कायकता अमा जहागीर ने पूरा मुखर विरोध किया। उनका कहना था कि ऐसा ही यदि हम लोग करते तो आपको कसा लगत। म आपकी जगह होती तो शमिदा महसूस करती। चचा में शामिल पाकितान के ही युवा लेखक अली सेठी ने भी सुर में सुर मिलाया। उनका कहना था कि भारत की इस कारवाइ से पाकितानी मीडिया को आर अवसर मिल गया। उसकी सामूहिक चचाआें में आइएसआइ के अधिकारियों तक को अवसर मिला, जिहोने देश की जनता को बताया िक हम तो कहते ही रहे ह भारत हमें अपमानित करने की फिराक में लगा रहता ह। अमा का तो भारत पर सीधा आक्षेप था कि वह एक गर िजमेदार पडोसी है । इस क्षे में एक सबसे बडे लोकत के प में हम जसा पडोसी की आशा करते ह, वह वसा नहीं ह। वह अपने बडे होने के गुर में भरा रहता है आर पडोसियों के साथ दादा की तरह यवहार करता ह। उहोंने भारत की इसके लिए भी खिचाइ की कि उसने नेपाल व यामार के साथ ठीक यवहार नहीं िकया।

आचय की बात यह है िक इस पनल में ऐसा कोइ नहीं था,जो अमा से यह पूछ सके कि वह कसे पडोसी की अपेक्षा करती ह। या भारत से भी अधिक उदारता दिखाने वाला कोइ पडोसी हो सकता ह। वह कहती ह कि यदि उनके देश ने वसा किया होता जसा कि आइपीएल ने पाकितानी खिलाडियों के साथ किया ह, तो वह शमिदा होती। या वह बता सकती ह कि अब तक भारत के खिलाफ की गइ पाकितान की कितनी करतूतों पर वह शामिदा हइ ह। या १९४८, १९६५ व १९७१ व कारगिल घुसपठ के लिए वह शमिदा ह। उहोंने पाकितानी अपसयकों की रक्षा के लिए अब तक या किया ह। या उहोंने कभी इस पर विचार किया ह कि भारत की तरफ से जब भी मी, सदभाव व सहयोग का हाथ आगे बढाया गया पाकितान ने धोखा व भीतरघात ारा इसका जवाब दिया ह। पनेल में भारत के पूव विदेश सचिव याम सरन में उपथित थे, लेकिन उहोंने भी इन पाकितानी तिनिधियों को कोइ जवाब देने की कोशिश नहीं की। अपनी कूटनीतिक सहिणुता की आदत का दशन करते हए उलटे उहोंने इस पर खेद य किया कि आइपीएल में पडोस के अछे किकेटर नहीं लिए जा सके।

भारत के विदेश नीति, आलोचना करने लायक न हो ऐसा नहीं ह, लेकिन उसकी कभी इस बात के लिए आलोचना नहीं की जा सकती कि उसने अपने किसी पडोसी देश के साथ कोइ दादागिरी की ह। उसका सबसे बडा दोष यही ह कि पडोसियों के ति उसकी नीति बेहद ढीली व लिजलिजी रही ह। उसने हर एक के ति उदारता का दशन किया,लेकिन जवाब हमेशा हिकारत का मिला। भारत के थम धानमी पडित नेह चीन के साथ दोती का जसा हाथ बढाया उसका उदाहरण मिलना कठिन ह। उहोंने ही ‘हिंदी चीनी भाइ भाइ’ का नारा दिया,लेकिन चीनी अधिकारी उहें खा व अभ (डिकटियस) मानते थे। याम सरन ने बडे मुलायम शदों में यह कहा कि भारतीय कूटनीति की यह बडी समया ह कि वह जिन देशों में लोकत को ाेसाहन देने का यास करता ह, वहा उसे विरोध का सामना करना पडता ह। पाकितान हो, यामार हो या आर कोइ देश।

आचय ह कि इस सीधी बात को समझने या कहने के लिए कोइ तयार नहीं ह कि इस क्षे यानी भारतीय उपमहाीप की सबसे बडी समया पाकितान या यों कहें कि इलामी अलगाववाद ह, जो इस पूरे क्षे में शाति का सबसे बडा दुमन ह। दक्षिण एशियाइ क्षेीय सहयोग सगठन (साक) केवल इसलिए विफल हो गया कि पाकितान किसी आपसी सहयोग की योजना को आगे नहीं बढने देता। उपयु चचा में ही बगलादेश की लेखिका शजिया उमर ने भारत को साकतिक महानता के अहकार की शिकायत की। अब यह उनसे कान कहे कि यदि भारत को अपने साकतिक गारव का अहकार ह, तो इसमें गलत या ह। साइ तो यह ह कि इस पूरे क्षे का जो भी साकतिक गारव ह, उस पर अहकार करने का सभी को समान अधिकार ह।

बगलादेश व पाकितान को भी उस पर गव करने का उतना ही अधिकार ह, जितना कि भारत को, योंकि यह पूरा क्षे एक ही साकतिक इकाइ का हिसा ह। मगर अफसोस की बात यह ह कि मजहबी अलगाव के कारण पाकितान व बगलादेश ने उस साकतिक गारव से अपने को काट कर अलग कर लिया ह। इतना ही नहीं उहोंने उस ाचीन गारव का विरोध भी शु कर दिया ह। अब वे चाहते ह कि भारत की केीय भूमि भी अपने उस पुराने गारव से नाता तोड ले आर उनकी तरह बन जाए। या यह उनकी भारत की मुय भूमि के साथ यादती नहीं ह।

ये लेखक, लेखिकाए व बुजीिवी वातव में भारत की साकतिक व राजनीतिक पराजय देखना चाहते ह। उहें इसके दीघकालिक साकतिक इतिहास से इया ह। आर इधर भारतीय बुजीिवी ह, जिनमें यह कहने का साहस नहीं ह कि भारत के साथ शुभाव उहोंने ठाना ह, जबकि भारत ने कभी उहें शु नहीं समझा। लेकिन यदि वे भारत की साकतिक जडों को ही न करने का यास करेंगे तो उसे भी आमरक्षा में कुछ तो करना ही पडेगा। उनकी शिकायत ह कि भारत उनकी सकति का समान नही करता। अब भला उनसे कोइ पूछे कि यदि वे भारत की सकति से ही सवाधिक शुता रखते हों, तो उनका समान कसे किया जा सकता ह।

ऐसे विचार जयपुर के साहियिक मेले में कोइ पहली बार नहीं आए, कितु ऐसे आयोजनों में शामिल होने वाले भारत की सरकारी धारा के बुजीिवी याम सरन की तरह अपने पर ही अफसोस य करके आ जाते ह, वे कभी न तो अपना पक्ष रख पाते ह आर न अपने ऊपर होने वाले आक्षेपों का तिवाद कर पाते ह।

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