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कहा से कहा पहुचा लोकतंत्

Swatantra Vaartha  Tue, 26 Jan 2010, IST

कहा से कहा पहुचा लोकतंत्

भारतीय गणराय की साठवीं वषगाठ पर देश के ससदीय लोकत के भविय पर विचार करते समय कोइ आशाजनक तवीर नहीं दिखाइ देती ह। लबे समय से भारतीय गणत की कहानी वायदों आर सभावनाआें की दाता रही ह। आजादी के बाद जिन लोगों को साा मिली वे वाधीनता आदोलन से जुडे ऊचे आदशा] आर मूयों वाले नेता थे। उनके नेतव में देश के विकास के लिए कइ बुनियादी काय किये गये, लेकिन दूसरी पीढी के नेताआें के हाथ में साा आते ही मूयों आर आदशा] के पतन का जो सिलसिला शु हआ वह जारी ह। कहने को हम कह सकते ह कि भाषा, जाति, सकति की क्षेीय विविधताआें के बावजूद देश में लोकत बना हआ ह। पर पिछले साठ वष में हमारी लोकताकि राजनीति का इतना पतन हो गया कि अपराधी आर माफिया तव जिनके हाथ खून से रगे हए ह, विभि दलों में वेश करके माननीय बन गये ह।

राजनेता भी अब जनता से दूर कमाडों के घेरे में रहने लगे ह। बेइमान लोगों ने राय की शयाेिं को येन केन कारेण हतगत कर लिया ह आर वे अपने निजी वाथा] को पूरा करने में लगे ह। नतिकता आर सदयवहार को मायता नहीं दी जा रही ह आर इसके लिए शासन यवथा की तरफ से कोइ महव या पुरकार नहीं मिलता ह। इसके विपरीत बुरे यवहार को न तो रोका जाता ह आर न ऐसा करने वाले को दडित किया जाता ह। इसलिए अब आम आदमी यह सोचने लगा ह कि भ यवहार से ही इस यवथा में समान आर सफलता ा की जा सकती ह।

भारतीय सविधान में सभी को सामाजिक, आथिक एव राजनीतिक याय देने का वचन दिया गया ह। लेकिन राजनीतिक साा अब घटनाआें, कियाआें, ससाधनों आर अधिकारियों के यवहार को सावजनिक हित में भावित करने आर लोगों को याय देने का मायम नहीं रह गयी ह। इसकी जगह राजनीतिक साा का उेय निजी वाथा] की पूति आर सावजनिक धन के बेजा इतेमाल, विशेषाधिकार, सरक्षण, तानाशाही आर विरोधी विचारधारा के लोगों को परेशान करना या जनता को परेशान करना हो गया ह। साा का दुपयोग रोकने की अक्षमता के कारण जनता मे निराशा बढ रही ह। लगभग सभी राजनीतिक दल एक जसे हो गये ह, लेकिन यवािदी क्षेीय दलों ने राजनीति को पतन की पराकाा पर पहचा दिया ह। ऐसा लगता ह कि इस लोकत में सया के गणित को पूरा करने में जो देश आर देश को जितना अधिक डुबोयेगा वह उतना ही बडा नेता कहा जायेगा। इसलिए साासीन पार्टी को मताधिकार के जरिए हटा देने के बावजूद दूसरी पार्टी या पाटियों के आने के बाद भी जनता को राहत नहीं मिल रही ह। सबसे बडी खतरनाक थिति तो यह ह कि जो लोग कायदे कानून के हिसाब से अपनी बात शातिपूवक कहना चाहते ह, उनकी कहीं कोइ सुनवाइ नहीं होती ह। इसलिए लोग छोटीछोटी बातों पर भी हिसा पर उतर आते ह। इस बढते सामाजिक असतोष का फायदा नसली आर आतकवादी उठा रहे ह। हमारी राय यवथा अपनी जनता को पानी, बिजली के साथसाथ रोजी रोटी मुहया कराने में विफल हो रही ह।

बुदेलखड , विदभ आर कालाहाडी के गाव अकाल आर भुखमरी की चपेट में ह। नसली आर आतकवादी हिंसा तीन रायो से बढकर तेरह रायों में फल चुकी ह। कमीर, असम आर महारा में अलगाववादी ताकतें सिर उठा रही ह। चिंता की बात तो यह ह कि ऐसी हालत में भी हमारे राजनेता इन समयाआें को सुलझाने का कोइ गभीर यास करते हए दिखाइ नहीं दे रहे ह। महगाइ, भुखमरी हो या नसली हिंसा की समया हो, इन समयाआें से जनता को राहत देने की बजाय हमारे राजनेता सिफ एकदूसरे को कोस रहे ह।

कभीकभी तो ऐसा लगता ह कि राजनीतिक साा के लोग पतन की उस पराकाा पर पहच गये ह, जहा उहें अपना घर भरने एव वाथ के अलावा आर कुछ दिखायी नहीं देता ह। बगाल हो या उार देश, तमिलनाडु, राजथान हर जगह टकराव आर निजी वाथा] की राजनीति का बोलबाला ह, लेकिन तमाम राजनीतिक अवरोधों के बावजूद अथयवथा सात से ना फीसदी की रतार से आगे बढती रही। शेयर बाजार ने कइ ऊचाइयों को छुआ तो विदेशी मुा भडार भी बढा ह। उदारीकरण की सफलता हर तरफ छायी दिखती ह। चमकते नियोन साइन, दमकते माल, रगीन विज्ञापन आर टीआरपी बढाते विज्ञापनों को अथयवथा की उपलधियों का तीक कहा जा सकता ह। इसका मतलब साफ ह कि ववीकरण के इस दार में अथयवथा अपनी चाल से चलती ह, लेकिन उसका जो लाभ गरीबों आर वचितों को मिलना चाहिए, वह हमारे राजनेताआें की बेढगी चाल आर वाथ के कारण नहीं मिल रहा ह। राजनीतिक लोकत का तब तक कोइ मतलब नहीं ह, जब तक कि आथिक लोकत न हो।

गणराय के ६० वषा] में देश ने तरी की जिन बुलदियों को छुआ, हमारे नाकरशाहों व राजनेताआें ने उसके बराबर, बकि उनसे कहीं ऊची भाचार की मीनारें खडी की ह। लेकिन दुखद आचय यह ह कि भाचार में सलि लोग अब शमसार नहीं होते। ऐसे में यदि उससे जुडी खबरें हमारी सवेदना का महवपूण हिसा नहीं बन पाती ह, तो यकीनन यह समाज के क्षयगत होने का ही परिचायक ह। दरअसल भाचार की विषबेल राजनीतिज्ञों आर नाकरशाहों की छछाया में ही पवित हइ ह। दोनों ने इसकी जडों में खादपानी डाले ह। यही वजह ह कि दोनों एकदूसरे का सरक्षण करते रहे ह। वरना दागी अधिकारियों के शीष पदों पर पहचने की आर या वजह हो सकती ह ? राजनेताआें आर शासनिक अधिकारियों की इस गठजोड ने देश की यवथा आर उसके आमबल को खोखला किया ह। आजादी के साठ वषा] में हमारी ससदीय लोकताकि णाली पतन की उस पराकाा पर पहच गयी ह, जहा कइ रायों में राजनीतिक साा का मतलब सिफ वाथ की पूति हो गया ह। यह सच ह कि अगेज भारत का उार करने नहीं आये थे, लेकिन तो भी उहोंने राय यवथा के इकबाल को बनाये रखा था आर जनता को याय देने के लिए सुनवाइ की यवथा थी। बिटिश साा को चुनाती के मामले को छोडकर बाकी मामलों में जनता को याय मिलता था, लेकिन आज तो किसी भी मामले में याय मिलना मुकिल ह। सरकारी कमचारियों की तनाती आर तबादले रिवत के बल पर किये जा रहे ह। इससे पूरी शासनिक यवथा वत हो गयी ह। आम आदमी की कहीं कोइ सुनवाइ नहीं ह। इस वत यवथा को आतकवादी आर नसली जगहजगह चुनाती दे रहे ह। सरकार उनके सामने लाचार खडी हइ दिखायी दे रही ह।

किसी भी लोकताकि सरकार की सफलता आर असफलता का मापदड तो आम आदमी के लिए पानी, बिजली, यातायात आर वाय यवथा की उपलधता ही होगी। इस पमाने पर हमारी हालत बद से बदतर होती जा रही ह। सरकार यारहवीं पचवर्षीय योजना में बुनियादी सुविधाआें में सुधार करने का दावा कर रही ह। लेकिन कोइ नहीं जानता कि ३६ लाख करोड पये के बजट वाली यारहवीं योजना की कितनी धनराशि वातव में लाभार्थी तक पहचेगी ? जब पी चिदबरम केीय वािमी थे, तो उहोंने खुद कहा था कि ‘लोगों तक एक पया पहचाने के लिए चार पये खच हो जाते ह आर राशन का ५८ फीसदी गेह लुटेरे डकार जाते ह’, तो या किया जा सकता ह ? यह समझ में नहीं आता ह कि मनमोहन सिह की सरकार कर या रही ह। यदि भाचार होता ह, तो भाचारियों को सजा यों नहीं दी जाती ह? यदि विपक्षी दल की सरकारें रायों में योजनाए लागू नहीं कर पाती ह, तो कागेस शासित रायों में योजनाआें के अमल का कोइ बेहतर उदाहरण यों नहीं पेश किया जाता ह। सरकार की सावजनिक वितरण णाली का उेय हर निधन परिवार को सती दरों पर खा वतुए उपलध कराना ह, लेकिन आज यह सबसे भ सरकारी योजनाआें में तदील हो चुकी ह। हालत यह ह कि किसीकिसी राय में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालो के लिए आर अयोदय अ योजना के तहत भेजे जाने वाले गेह आर चावल का लगभग सा फीसदी हिसा खुले बाजार में पहच जाता ह। खुद सरकारी तर पर कराये गये अययनो की रपटें खुलासा करती ह कि भाचार की वजह से निधन वग के यादातर लोग इस योजना से वचित रह जाते ह।

सर्वो यायालय आर सरकार की ओर से गठित आयोगों की कइ रपटें यह बता चुकी ह कि गहरे तक पठ चुके भाचार की वजह से जनवितरण णाली किस तरह समाज के सबसे गरीब तबकों के लिए महज दिखावे का एक त बनकर रह गयी ह। यही हाल रोजगार गारटी योजना का भी ह। जिनके लिए यह योजना शु की गइ, उनमें से यादातर लोग आज भी इसके फायदे से वचित ह। इलाहाबाद विववािलय की ओर से कराये गये अययन में शामिल शाेेधकताआें का भी कहना ह कि राय भर में दनिक रजिटरों में मजदूरों के अगूठे के निशान दिखा कर अधिकारियों ने बडे पमाने पर पसों का वारा यारा किया। किसी भी योजना के अमल पर नजर डालिए तो हरानी होती ह कि आखिरकार हमारा शासन आर शासन कर या रहा ह। विव बक की सहायता से चलाइ जा रही वाय सबधी पाच परियोजनाआें में धाधली उजागर होना उस यवथा के सडगल जाने का एक आर सबूत ह, जिसके तहत भातिभाति की योजनाए सचालित हो रही ह। जब विव बक की सहायता वाली परियोजनाआें में धाधली हो सकती ह, तो इस पर यकीन करना खुद को भुलावे में रखना होगा कि अय कोइ योजना सही तरह से कियावित हो रही होगी। इसके ढेरो सबूत भी ह।

भारत सरकार ‘यूनाइटेड नेशन कनवेशन अगेट करशन’ के उस समझाते पर हताक्षर करने का साहस नहीं जुटा पा रही ह, जिसके तहत राजनेताआें के विदेशी बकों में जमा धन को भारत में वापस भेजने की यवथा ह। हमारी तमाम कयाणकारी योजनाए भाचार की शिकार हो जा रही ह। अब तो के आर राय सरकारों के राज चलाने पर ही सवाल उठने लगे ह। यदि ऐसा नहीं ह, तो यों निधन लोगों को अपने यूनतम बुनियादी अधिकारों की रक्षा के लिए दीि कूच करने की जरत पडती ह ? इसलिए अब यह सवाल ह कि या तमाम ससाधनों के होते हए भी या यह देश इसी तरह से अराजकता के साथ चलता रहेगा ? या बिखर जायेगा अथवा विदेशी पूजी का वचव इतना अधिक बढ जायेगा कि हमारी अपनी पूरी यवथा तहसनहस हो जायेगी ? इन सवालों का जवाब हमें आज नहीं तो कल देना ही होगा, योंकि इस पर ही हमारे देश की लोकताकि यवथा का भविय निभर करता ह।

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