अमेरिका का लदन एजेंडा कारगर होगा ?
अफगान यु समात करने के उपायों पर विचार के लिए आयोजित लदन बठक इस गुवार को शु हो गयी ह। इसमें ६० देशों के विदेश मी शामिल ह, जिनमें भारत व पाकितान के विदेश मी भी ह। अफगानितान के यु तथा उसके पुननिमाण अथवा वहा थिरता कायम करने के उेय से किसी भी तरह जो सब देश ह, उहें इस बठक में बुलाया गया ह। इसका आयोजन अफगान राटपति हामिद करजइ, अमेरिका तथा सयुत राट सघ ारा किया गया ह।
इस बठक का सबसे बडा एजेंडा अफगानितान में तालिबान व अलकायदा के मोर्चे को तोडना तथा तालिबान युवा सनिकों को नाकरिया व धन देकर खरीदना ह। अमेरिका को यह सूचना मिली ह कि तालिबान के साथ लड रहे अधिकाश अफगानी युवक पसे के लिए उसके साथ जुडे ह। समुचित रोजगार के अभाव में अफगान युवा तालिबान फाज का अग बन रहे ह आर उसके लिए लडाइ लड रहे ह। यदि उहें थाइ रोजगार, धन तथा अछी जिदगी का आवासन मिले, तो वे तालिबान का साथ छोडकर दूसरी तरफ आ सकते ह।
अमेरिकी रणनीतिकार समझते ह कि तालिबान को भी अलकायदा से अलग किया जा सकता ह। अभी अमेरिकी यनों से ही सयुत राट सघ ने अलकायदा के पाच वरिठ नेताआें से तिबध हटा लिया ह। तिबध हटाने का मतलब ह उनके बक खाते खुल गये ह तथा वे अब कहीं भी आजा सकते ह। आगे आर भी तालिबान नेताआें को तिबध मुत किया जा सकता ह। अमेरिका तिरक्षा विभाग के मुयालय ‘पेंटागन’ के एक वता के अनुसार हम अभी तुरत तालिबान नेताआें के साथ बातचीत नहीं करने जा रहे ह, लेकिन उनके साथ बातचीत के दरवाजे खुले ह। शत केवल एक ह कि उहें अलकायदा के साथ अपने सबधों को तोडना होगा। राटपति हामिद करजइ तालिबान नेताआें को साा में भागीदारी देने के लिए भी तयार ह, बशते वे हिंसा का राता छोडकर राजनीति की मुय धारा मे शामिल हो जाए।
अब सवाल यह ह कि या अमेरिका की यह रणनीति कामयाब होगी ? अमेरिकी विशेषज्ञ समझते ह कि अफगानितान में पिछले ९ वषा] से चल रहे यु में अमेरिकी सनिक ही नहीं थके ह, तालिबान लडाके भी थके ह। अमेरिका यदि समझने लगा ह कि अफगानों पर सीधे सनिक विजय नहीं ात की जा सकती, तो अब अफगान भी समझने लगे ह कि अमेरिकी व यूरोपीय फाजों को हथियारों के बल पर अफगानितान से नहीं भगाया जा सकता। इसलिए जिस तरह अमेरिका बातचीत ारा यु का कोइ समाधान निकालना चाहता ह, उसी तरह सभवत: तालिबान भी कोइ राता तलाशने की सोच रहे हों। अमेरिका ने अफगानितान से अपनी सय वापसी के कायकम की घोषणा करके यही सदेश देने की कोशिश की ह कि अमेरिकी सनिक वहा हमेशा के लिए नहीं ह। यदि अफगान यह चाहते ह कि वहा कोइ विदेशी सनिक न रहे, तो अमेरिका भी वहा अपने सनिक नहीं रखना चाहता, लेकिन अफगानितान की साा जिहादियों के हाथ नहीं सापी जा सकती।
अमेरिका की यह गणना तकनीकी टि से सही ह, किंतु वह तालिबान व अमेरिकी सनिकों की मनोवज्ञानिक भिनता को नहीं समझ रही ह। जिहाद की ेरणा व अमेरिकी सनिकों की ेरणा समान नहीं ह। तालिबान, अलकायदा से अलग जर ह, लेकिन उनका लय आर उनकी ेरणा दोनों समान ह। फिर जो तालिबान नेता अलकायदा मुख ओसामा बिन लादेन के बचाव में अपनी साा ही नहीं पूरी अफगान शति की बलि देने के लिए तयार रहा हो वह अमेरिकी लोभन पर अलकायदा का साथ छोडकर करजइ के साथ आ जाएगा, इसकी कपना भी करना कठिन ह। इसी तरह माना कि अफगान युवकों में बेरोजगारी की समया ह आर उनमें धन पाने की गहरी ललक ह, लेकिन उनके आमघाती दते केवल धन के लोभ में तयार नहीं हो सकते। उनके साथ सबसे बडी शति ह इलाम आर उसकी जिहादी परपरा में उनका विवास।
तालिबान यह कहते जर ह कि वे पचिमी देशों के खिलाफ नहीं ह, लेकिन यह उनका रणनीतिक वय मा ह। उनका मुकाबला पचिमी देशों के खिलाफ भले न हो, लेकिन उहीं सारे सामाजिक व राजनीतिक मूयों के खिलाफ ह, पचिमी देश जिनका तिनिधिव करते ह। इसलिए इसकी सभावना बहत कम ह कि लदन में केीय चचा का विषय बनी अमेरिकी रणनीति अफगानितान मे कभी सफल हो पाएगी।
समाजवादी चेहरा वापस लाने की चिंता
समाजवादी पार्टी के अयक्ष मुलायम सिंह यादव अब लगता ह अमर सिंह वाली राजनीतिक सकति से भी छुटकारा पाने में लग गये ह। पार्टी पदों से ठाकुर अमर सिंह का इतीफा वीकार करने केेेेेेेेे बाद उहोंने सजय दा का भी इतीफा वीकार कर लिया आर साथ ही पार्टी को यह भी सकेत दे दिया कि अमर सिंह के जो समथक पार्टी से बाहर जाना हो वे भी जा सकते ह। उहोंने अमर सिंह के कटु आलोचक मोहन सिंह को पार्टी का महासचिव तथा मुय वा बनाकर भी उहोंने यह सकेत दिया ह कि अब पार्टी पूरी तरह अमर सिंह पूव युग में लाटना चाहती ह।
अमर सिंह की जगह नवनियु महासचिव मोहन सिंह ने अमर सिंह से साफ कहा ह कि अब उहें पूरी तरह पार्टी छोड देनी चाहिए आर रायसभा की सदयता से भी इतीफा दे देना चाहिए। वह पार्टी के सभी पद छोड चुके ह, तो पार्टी में बने रहने का कोइ आचिय नहीं ह। रायसभा के लिए भी वह पार्टी के ारा चुने गये थे, अब जब वह पार्टी से अलग हो गये ह, तो रायसभा का पद भी छोड देना चाहिए। पिछले दिनों अमर सिंह ने कहा था कि वह रायसभा की सदयता नहीं छोडेंगे। उहोंने पार्टी के पदों को छोडा ह, पार्टी नहीं छोडी ह। साधारण सदय के प में अभी भी वह पार्टी के अग ह।
मोहन सिंह ने पार्टी महासचिव का पद ा करते ही पहला लय यह रखा ह कि पार्टी की ‘कार्पोरेट क्षे की समथक’ छवि मिटायी जानी चाहिए आर उसे फिर से उसका समाजवादी चेहरा वापस लाना चाहिए। समाजवादी पार्टी पिछडों, गामीणों व अपसयकों की पार्टी ह। यह गरीब आर वचितों के हितों की लडाइ लडने वाली पार्टी ह न कि कार्पोरेट जगत के लीडरो की। अमर सिंह ने पार्टी को यापक लोकयिता तथा राीय आधार दान करने के लिए आाेगिक घरानों तथा फिम क्षे के लोकयि चेहरों से जोडने की कोशिश की थी। उहोंने अनिल अबानी, अमिताभ बन, जयदा, सजय दा आदि को पार्टी से जोडा, लेकिन इनसे पार्टी का कोइ भला नहीं हो सका। एक अनिल अबानी व दो चार फिमी चेहरों से तो पार्टी का कोइ भला होने वाला नहीं था। फिर अमर सिंह के बडबोलेपन तथा विवादगत आचरण का भी खामियाजा पार्टी को उठाना पड रहा था।
खर, अब अमर सिंह से तो पार्टी को मु मिल गइ ह, लेकिन वह फिर समाजवादी चेहरे के साथ वापस आ पाएगी या नहीं यह देखना ह। खोया विवास वापस लाना आसान नहीं होता, लेकिन मुलायम सिंह खुद एक जुझा नेता ह, इसलिए वह अपना जनाधार वापस ला सकते ह। इसमें यदि कोइ बाधा बन सकता ह, तो वह ह उनका परिवार। यदि वह परिवार पर पार्टी को तरजीह देने में सफल हो सकते ह, तो उनकी वापसी सभव ह, अयथा जो जमीन नीचे से खिसक गइ ह, उसे फिर पकड पाना बहत कठिन ह।
