प्रकथी और सभ्यता दय्दन
तकनालाजी के घोडे यानी राकेट पर सवार सयता स विजय के लिए ऊचीऊची छलागें मार रही ह, देश आर काल की दूरियों को पाटने के लिए नएनए योंउपकरणों का आविकार कर रही ह, तीवतम गति से चलने वाली रेलगाडियों, विमानों आर मोटरकारों का विकास कर रही ह, आसमान में छेद करने वाली गगनचुबी इमारतें खडी कर रही ह, मनुय के सकेत मा से उसकी सब आवयकताए पूरी करने वाले रोबोट का निमाण कर रही ह। बताया जा रहा ह कि इन रोबोट के पास भावनाए भी होंगी आर मतिक भी होगा। यानी एक कार से वे मनुय का विकप ही होंगे। यदि सचमुच ऐसा हआ तो वे मनुय का कहना यों मानेंगे, उसके दास यों बने रहेंगे ? वे मनुय को ही अपना दास यों नहीं बना लेंगे ? गर्वो की जा रही ह कि अब सतानोपा के लिए पुष आर ी को एक आने, रहने की आवयकता नहीं रहेगी, जिसका अथ ह कि विवाह सथा आसगिक हो जाएगी। तकनालाजी ने फिज, एसी आदि का आविकार करके मासम के कोप से मनुय को मु दिला दी ह।
टेलीफोन, वायरलस, सेटेलाइट, इटरनेट, कयूटर, मोबाइल आर टेलीविजन जसे उपकरणों का आविकार कर दूरियों को समा कर दिया ह। दुनिया के किसी भी कोने में घटने वाली घटना को हम तुरत अपने डाइगम में बठेबठे अपने आखों से देख आर कानों से सुन सकते ह। वज्ञानिक दावा कर रहे ह कि पयेक य के वभाववशिट का निमाण करने वाली जींस (कोशिकाआें) की उहोंने खोज कर ली ह। डीएनए परीक्षण के ारा य की सहीपूरी पहचान की जा सकती ह। यु के लिए चालकरहित डोन विमानों की सहायता से बिना यु क्षे में जाए, अपनी जान को जोखिम में डाले बिना हम शु के घर में घुसकर डोन से हमला कर सकते ह, शु की एकपक्षीय क्षति कर सकते ह। यह सब देखकर कभीकभी भम होता ह कि मनुय भगवान की थिति में पहचने से यादा दूर नहीं ह। तकनालाजी की गति की यही दिशा आर रतार रही तो वह दिन दूर नहीं ह जब ब, परमामा, गाड या आह भी वय को आसगिक पाएगा।
ऐषणात के साधन इस पूरी तकनालाजीकल गति का लय ह मनुय की ‘अथ’ आर ‘काम’ की ऐषणाआें की त के साधन खोजना, इन ऐषणाआें को आर अधिक उीपित करना; मनुय के लिए भमयु, पयावरण निरपेक्ष, विलासी जीवन की स करना; कति पर विजय पाकर उसका अधिक से अधिक दोहन करने का सामय अजित करना। अपनी ‘अथ’ आर ‘काम’ की ऐषणाआें की त के लिए मनुय अपनी सजनामक पतिभा से जिन कमि उपकरणों व रचनाआें का आविकार करता ह, उहें ही तकनालाजी कहा जाता ह आर तकनालाजी ही भातिक धरातल पर वह तानाबाना खडा करती ह, जिसे सयता कहा जाता ह। सयता के इस आकमण अथवा दोहन के ति पकति उदासीन या निकिय नहीं रहती। सयता के येक नए आघात की उस पर तिकिया होती ह, वह उसका मुकाबला करने की कोशिश करती ह। इस कार सयता आर कति के बीच एक निरतर ۧयु पारभ हो जाता ह, जिसके हम आज साक्षी ह। मानव की सुखसुविधा के लिए तकनालाजी उपभोग के जिन साधनों का आविकार करती ह, उनके उपादन आर चालन के लिए ऊजा व के माल की आवयकता होती ह।
उनकी उपादन किया भी कति या पयावरण पर आघात करती ह आर जब इन निरतर आघातों से पकति क्षतविक्षत हो जाती ह, तो पयावरण का सतुलन बिगड जाता ह, मनुय आर उसकी सयता पर अतिव का सकट मडराने लगता ह। वह उस सकट को टालने के राते खोजता ह, आकडेबाजी करता ह, एक रा दूसरे रा पर दोषारोपण करता ह, योंकि येक रा अपनी सुखसुविधा या जीवन तर में तनिक कमी न करते हए उस सकट को टालना चाहता ह। रियो डि जिनेरो, योटो आर अब कोपनहेगन में सप हए विव पयावरण समेलन इसी छटपटाहट को तिबिबित करते ह।
कति का कोप हाल की घटनाआें ने हमें यह चेतावनी दे दी हकि कति का एक ही थपड सयता का चा जाम करने के लिए पया ह। कुछ वष पहले कति ने सुनामी का श चलाया तो अपने को सवशमािन समझने वाली सयता ने अपने को असहाय पाया। इस समय अमेरिका, यूरोप, चीन, भारत सब असामाय शीत लहर की चपेट में ह। टेलीविजन पर यूरोप, चीन आर अमेरिका के य देखते ह, जहा सब कुछ जम गया ह, मनुय बफ से जूझ रहा ह। अमेरिका के लोरिडा जसे भाग में, जो भारत के समानातर रेखा पर ह, पहली बार बफ जमी ह। कहा जा रहा ह कि तीस वष बाद तापमान इतना गिरा ह। भारत में शीत लहर कोहरा साथ लेकर आती ह। कोहरे से उप धुध के कारण रेलगाडिया र हो रही ह, विमान उड नहीं रहे ह, सडकों पर वाहनों के लबे जाम लग जाते ह। कोहरे में रेलें आपस में टकरा रही ह, याी मर रहे ह। अमेरिका जसा शमािन देश असमय अनपेक्षित चकवातों, बाढ, जगली आग आदि ाकतिक आघातों की न पूव कपना कर पा रहा ह आर न ही उनका तिकार कर पा रहा ह। वज्ञानिक लोग एक पुरानी बीमारी का अचूक निदान खोजने का दावा करते ह कि कोइ नयी बीमारी मदान में उतरकर उहें हतभ कर देती ह। बीमारियों आर वज्ञानिकों के बीच जो लुकाछिपी चल रही ह, उसे देखकर कइ बार लगता ह कि मछर सयता पर भारी पड रहा ह। एडस, वाइन लू जसी नयी बीमारियों ने पिछले कुछ वषा] में जितनी जानों को लीला ह, उतनी जानें शायद सादो सा वषा] में पुरानी बीमारियों से नहीं गयी होंगी। मनुय ने अपनी सुखसुविधा के लिए कति की सपदा का इतना अधिक आर इतनी तेजी से दोहन किया ह कि अब उसके सामने ाकतिक ससाधनों की पूति का भयानक सकट खडा हो गया ह। आरहवीं शतादी के उाराթ में उसने भाप श की खोज की, जिसके लिए पवी के गभ में छिपे कोयले की लूट शु हइ। भाप से आगे चलकर वुित श का आविकार हआ। बिजली की उपादन किया में कोयले आर पानी का आर अधिक माा में योग होने लगा। १९०१ में मनुय ने पवी के गभ में छिपे खनिज तेज या पेटोल को ढूढ निकाला आर अब उसका भडार समा के निकट ह। तब मनुय की आणविक श पर गयी आर अब येक देश आणविक श को पदा करने के लिए याकुल ह। जनसया निरतर बढती जा रही ह, पयेक य में सयता की नियामतों के उपभोग की सहज आकाक्षा जग रही ह। येक य भममु, मनोरजन यु आर सुविधापूण जीवन बिताना चाहता ह। वह उस पुराने युग में नहीं रहना चाहता, जब पचासों मील के घेरे में एकाध सामत विशाल कोठी में, उस युग में उपलध मनोरजन आर विलासिता के साधनों का वामी होता था आर बाकी जनसया अपनी गरीबी में सतु थी आर वय को उस सामत का दास समझती थी। सामत नाच या नाटकी का आयोजन करता था आर सकडों मील दूर से लोग पदाल चलकर उसके लिए इका हाेेते थे। अब येक य चाहता ह कि वह अपने घर में बठकर टेलीविजन पर नाचगाने का आनद उठाए। टेलीविजन के ारा विलासी जीवनशली की कपना आर आकाक्षा घरघर में पहच गयी ह। येक उसे पाने के लिए लालायित ह। वही विकास का आज का माडल ह। यह माडल एक ओर ययाेिं आर परिवारों के बीच पधा पदा कर रहा ह, तो दूसरी ओर रााें के बीच इसी माडल के आधार पर ससार भर के रााें का वर्गीकरण ‘विकसित’, ‘विकासशील’ आर ‘अविकसित’ श्रेणियों में किया गया ह। सबका सपना एक ह, दिशा एक ह, अविकसित आर विकासशील रा विकसित रााें के समकक्ष पहचने को आतुर ह। इसी को समाजवाद कहा जा रहा ह।
सुविधाआें की चाह लेकिन कति ने जो चुनाती खडी की ह, उसका सामना कसे करें ? कोयले आर तेल को इधन के प में जलाने से काबन डाइआसाइड गस बनती ह, जिससे पवी का तापमान ऊपर जा रहा ह। इसे ‘लोबल वामिग’ कहते ह। वायुमडल का तापमान बढने से पहाडों पर जमे बफ के लेशियर पिघल रहे ह। उससे समु का जल तर ऊपर उठ रहा ह। काबन डाइआसाइड से वायुमडल में ओजोन गस के कवच में छेद हो गया ह, जिसके कारण सूय की हानिकारक किरणें धरती पर पड रही ह। फलत नइनइ बीमारिया पदा हो रही ह, तूफान आदि ाकतिक कोप बढ रहे ह। भातिक सुखों की इस अधाधुध दाड के कारण कति के ससाधनों का भडार खाली हो रहा ह। कोयला, पेेेटोल, पानी, अ, भूमि की उपादन क्षमता, खनिज पदाथ आदि सबके अकाल की थिति पदा हो रही ह। लोग पानी यु की बात करने लगे ह। उपभोग धान सयता के कारण पानी आर वायु पूरी तरह दूषित हो गये ह, नदिया सूख रही ह, उनका जल पीने तो या, नान करने योय नहीं बचा ह। लोग नदियों की सफाइ के लिए बहत चिंता कट कर रहे ह, पर वे इस ओर यान नहीं दे रहे ह। श्रम विहीन सुखी जीवन का लोभ गामीणों को श्रम साय कषि से हटाकर शहरों की ओर खींच रहा ह। गाव युवक विहीन हो गये ह। शहरीकरण के वितार के कारण जगल कट रहे ह, कषि योय भूमि सिकुडती जा रही ह, खेतों के मशीनीकरण के कारण पशुधन तेजी से घट रहा ह। कभी गाधीजी ने कहा था कि असली भारत गाव में ह, भारत शहरों में नहीं, गावों में रहेगा। पर हो रहा ह उटा। गामवासी चाहते ह कि टेलीविजन, फिज, सीवर, एसी, टेटर, मोटर साइकिल, कार जसी सभी आधुनिक नियामतें उहें भी ा हों। अब गावों की ओर जाने के बजाय, गावों में ही शहरी विकास की माग हो रही ह। येक गाव, पयेक मकान, बिजली, सडक आर पानी की माग कर रहा ह। भारत के पाच लाख गामों की इस माग को पूरा करने का पयावरण पर या परिणाम होगा, इसकी कोइ चिंता कहीं नहीं दिखाइ देती। येक राजनीतिक दल का विकास का एजेंडा एक ही ह।
गति का पमाना सयता की गति का एजेंडा इस पकार समझें। अभी दूरदशन ने अपनी पचासवीं वषगाठ मनाइ, जिसका अथ हआ कि पचास साल पहले भारत में टेलीविजन जनसुलभ नहीं था। कयूटर का भारत में चलन २५ साल से पुराना नहीं ह। मोबाइल फोन दस साल पहले नहीं था, पर अब इनके तेज गति से वितार को विकास आर गति का पमाना माना जा रहा ह। येक माह आकडे छपते ह कि पिछले माह भारत में मोबाइलों की सया इतने करोड पहच गयी, अगले माह तक कितने गावों तक वह पहच जाएगा। सरकार की नयी घोषणा के अनुसार, कयूटर की शिक्षा पाइमरी कूलों तक पहचायी जाएगी, उस पर अरबो पये आबटित किए गये ह। शहरों की जनसया बढ रही ह। पे मकानों में मलविसजन के लिए सीवर णाली का वितार किया जा रहा ह। सीवर का गदा पानी नदियों में गिरता ह। येक घर में बिजली पहचाने के लिए बिजली उपादन हेतु नदियों पर बडेबडे बाध बनाए जा रहे ह। बाधों के कारण नदियों का जल वाह सिकुड रहा ह। सीवर आर कारखानों का मलयु कचरा इस सिकुडते जल वाह को दूषित कर रहा ह। एक ओर हम मला उठाने की पुरानी था को समा करने को लालायित ह। उसके लिए सीवर णाली का वितार आवयक ह। कयूटर, टेलीविजन आर मोबाइल की उपादन किया पयावरण पोषक न होकर पयावरण वसक ह। पर या अब हम टेलीविजन, सीवर,कयूटर, फिज आर मोबाइल रहित जीवन की कपना कर सकते ह ?
