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श्रमसघन उयगों को प्रसाहन दें

Swatantra Vaartha  Tue, 2 Feb 2010, IST

श्रमसघन उयगों को प्रसाहन दें

कुछ ही साह में वािमी णव मुखर्जी आने वाले वष का बजट ससद में पेश करेंगे। आज भारतीय अथयवथा वथ ह। नबे के दशक में देश को खुले यापार एव विदेशी निवेश के लिए पूरी तरह नहीं खोला जा सका था। भाजपा एव वामपथी दबाव में कागेस को अपने इस आगह से पीछे हटना पडा था। अत में कागेस ने भाजपा का ही म लागू किया था। भाजपा की माग थी कि घरेलू उदारीकरण पहले आर बाहरी उदारीकरण बाद में होना चाहिए। कागेस बाहरी उदारीकरण को भी तकाल लागू करना चाहती थी।

विपक्ष के विरोध के कारण कागेस अपने मसूबे को पूरा न कर सकी आर डा मनमोहन सिंह के ыढ नेतव में मुयत घरेलू उदारीकरण को लागू किया गया। परिणामवप घरेलू उमियों को वविक मानकों को अपनाने का समय मिल गया। आज भारतीय कपनियों की गणना विव की श्रे कपनियों में होने लगी ह, परतु आम आदमी उेलित ह। किसानों की आमहयाए जारी ह। शिक्षित युवाआें को रोजगार का अभाव ह आर वे क्षेवाद, नसलवाद आर आतकवाद की ओर आकषित हो रहे ह।

वािमी के सामने चुनाती ह कि आथिक गति को बनाये रखते हए विकास के लाभ को आमजन तक पहचाने की नीति बनायें।

देश की साठ तिशत जनता भी गाव में रहती ह। इनकी जीविका मुयत कषि से चलती ह, परतु वतमान समय में यह घाटे का सादा बनकर रह गयी ह। कषि मालय ारा थिति को सुधारने के लिए बुनियादी सरचना पर निवेश बढाने पर बल दिया जा रहा ह। सोच ह कि सडक बनने से उपज को बाजार तक पहचाना आसान हो जायेगा आर किसान को ऊचे दाम मिलेंगे। नहर बनाने से सिंचाइ का वितार होगा, उपादन मे व होगी आर तदनुसार किसानों के लाभ में भी व होगी, परतु ऐसा होता नहीं दिखता ह। वतता के समय अधिकाश सिंचाइ बलों तथा ऊटों के ारा होती थी।

आज पूरे देश में टयूबवेल का बोलबाला ह। फिर भी आलम यह ह कि वतता के समय किसान आमहया नहीं कर रहे थे, जबकि आज वे आमहया करने को मजबूर ह। बुनियादी सुविधाआें के विकास के साथसाथ किसान की आथिक परिथिति बिगडती जा रही ह। ऐसा ही बिटिश शासन के समय में हआ था। बिटिश सरकार ारा पूरे देश में रेल आर टेलीफोन लाइनों का जाल बिछा दिया गया था। साथसाथ विव आय में भारत का हिसा २५ तिशत से घटकर १ तिशत रह गया था। कारण यह कि बुनियादी सरचना में सुधार से उपादन में व अवय होती ह, परतु साथसाथ माल के दाम में कमी आने से लाभ का ास हो सकता ह। पूव में किसान सा किलो गेह का उपादन करता था आर १०० का लाभ कमाता था। आज किसान ५०० किलो उपादन कर रहा ह आर मा ५० कमा रहा ह। अत वािमी का यास होना चाहिए कि कषि उपादों के मूय ऊचे रखने की पालिसी बनायें।

पिछले दिनों कषि उपादों के मूय में सुखद व हइ ह। रोजगार गारटी कायकम के कारण खेत मजदूरों ने १५० दनिक मजदूरी से कम पर काम करना बद कर दिया ह। फलत कषि उपादों की लागतों में व हइ ह। मूयों में वतमान व को जनहितकारी समझना चाहिए। मेरे आकलन में यह मूय व आगे जारी नहीं रहेगी। रोजगार गारटी का भाव एक झटके में आया ह। यह भाव यहीं क जायेगा। अत कषि उपादों के मूय तोडने का यास नहीं करना चाहिए। इन ऊचे मूयों से देश को आमसात करने के लिए ेरित करना चाहिए।

इतना जर ह कि इन ऊचे मूयों का शहरी एव भूमिहीन गरीबों पर दुभाव पडता ह, चूकि ये गरीब लोग बाजार से खरीद कर अ खाते ह। इस समया के दूसरे समाधान पर यान देना चाहिए। न गरीब को भोजन मुहया कराने का ह। यह उेय दो तरह से पूरा हो सकता ह।

कषि उपादों के मूयों को यून रखा जा सकता ह अथवा गरीब की दनिक मजदूरी में व की जा सकती ह। मजदूरी व का दोहरा लाभ हासिल होता ह। खेत मजदूरों की आय में सीधी व होती ह आर इसके साथसाथ किसान की आय में भी व होती ह। कषि मूयों को यून रखने से गरीब को भोजन उपलध हो जाये तो भी किसान को घाटा लगता ह। अत कषि उपादों के दाम घटाने के थान पर वािमी को मजदूर की दिहाडी बढाने की नीति बनानी चाहिए।

समया ह कि कलकारखानों में श्रम की खपत कम होती जा रही ह। उदाहरणत ४० वष पूव २००० टन गा पेरने वाली चीनी मिल में २००० श्रमिक कायरत थे। आज ५००० टन गा पेरने वाली इकाइ में मा ५०० श्रमिक कायरत ह। उाेगों में रोजगार कम उप हो रहे ह। वाि मालय ारा काशित आथिक सवेक्षण में बताया गया ह कि निजी सगठित क्षे में १९९८ में ८७ लाख लोगों को रोजगार मिला हआ था। २००५ में यह घटकर ८४ लाख रह गया ह। इसी अवधि में देश की आथिक विकास दर ५ तिशत ति वष से बढकर ७ तिशत हो गयी ह। यानी आथिक विकास में तेजी के साथसाथ रोजगार हनन हो रहा ह। रोजगार कम बनने से यादा सया में बेरोजगार उपलध ह। सीमित सया में उपलध रोजगार को हासिल करने के लिये आवेदकों का सलाब उमड पडता ह। इससे श्रमिक की दिहाडी दबाव में ह।

पूजीसघन आाेगीकरण की वतमान पालिसी श्रमिक की दनिक मजदूरी में गिरावट की सहज वा बनाती ह। इस सहज वा को रोजगार गारटी कायकम के मायम से फिलहाल नियति किया गया ह। इस दबाव के टिकाऊ होने में सदेह ह। जसे नदी के पानी को यादा समय तक पप से उटा बहाया जा सकेगा। इसमें सदेह उप होता ह। वािमी के सामने चुनाती ह कि रोजगार गारटी के मायम से दनिक मजदूरी में जो कमि व हासिल की गयी ह, उसे थाइ बनाया जाये। निवेश एव टस की ऐसी पालिसी बनाइ जायें कि श्रम की माग वत बढ जाये, श्रमिक की दिहाडी बढे आर वह महगा अनाज खरीदने की थिति में सहज ही आ जाये। एसाइज टयूटी, सेल टस एव आयकर की दरें श्रमसघन एव पूजीसघन उपादन के लिए अलगअलग निधारित की जा सकती ह। वतमान में आटोमेटिक मशीन से बिकुट, अगरबाी, कपडे आदि के उपादन आर श्रमसघन उपकरणों से इहीं वतुआें के उपादन पर एक ही दर से टस वसूला जाता ह। वािमी यवथा कर सकते ह कि जिन कपनियों ारा पूजीसघन उपादन किया जाता ह, उन पर टस की दर बढा दी जाये आर जिन इकाइयों ारा श्रम सघन उपादन किया जाता ह, उन पर दर घटा दी जाये। ऐसे करने से अथयवथा टस की आसत दर पूववत बनी रहेगी, परतु उमियों के लिए श्रमसघन उपादन को अपनाना लाभद हो जायेगा। वतमान में कपनियों के लिए ऊजा आडिट करना अनिवाय बना दिया गया ह। इसी कार श्रम आडिट को अनिवाय बनाया जा सकता ह।

चाटड एकाउटेट को माणित करना होगा कि किन थानों पर कपनी ारा रोजगार बनाये जा सकते ह। जो उमी भारी सया में रोजगार देते ह, उनको पश्री समान देकर उनका गारव बढाया जा सकता ह। इस कार की नीतियों को बजट के मायम से लागू किया जाये तो दिहाडी में गिरावट की सहज वा उलट जायेगी। मजदूर की आय में व के साथसाथ किसान की आय में भी व होगी आर आम आदमी को सकून मिलेगा। देश का माहाल खुशहाल होगा।

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