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के के राय मंत्रियों का दद

Swatantra Vaartha  Tue, 2 Feb 2010, IST

के के राय मंत्रियों का दद

हाल ही में धानमी के साथ एक भेंट में मपिरिषद के कुछ राय मयाेिं ने शिकायत की कि उहें तवााे नहीं मिलती ह आर कबिनेट मी भाव नहीं देते ह। इन राय मयाेिं का दद उभर कर सामने आया। उनका कहना था कि वह लगभग बेरोजगार ह आर उनके पास फाइलें ही नहीं आती ह। यह एक सगीन मामला ह आर दशाता ह कि जब राय मयाेिं का यह हाल ह, तब एक आम सासद की या थिति होगी।

जाहिर ह इस अयि थिति के लिए वय धानमी आर उनकेे कबिनेट सहयोगी दोषी ह। लेकिन यह तवीर का एकपक्षीय पहलू ही ह आर उस चमे से देखा गया अधसय ह, जिस पर राय मयाेिं के शीशे चढे हए ह। तवीर का दूसरा पहलू भी ह आर यह पहलू इन राय मयाेिं की दलील को अगर झुठलाता नहीं ह, तो कम से कम इस दलील पर सवाल तो उठाता ही ह।

पहला सवाल यही ह कि या केवल फाइल निपटाने से ही मी जी का काम हो जाता ह? फाइलें निपटाने के अलावा मयाेिं के पास आर कोइ काम नहीं होता ? फिर तो बहत से ऐसे कबिनेट मी भी ह, जिनके पास फाइलें कम ही होती ह। या इसका तापय यह ह कि उन मयाेिं के पास काम नहीं ह ? जबकि कइ मी ऐसे भी ह, जिनके पास फाइलें तो कम ही होती ह, लेकिन महीनों वह फाइलें देख ही नहीं पाते। आखिर काम होने का पमाना या ह?

अभी यादा समय नहीं बीता होगा, जब गहमी पी चिदबरम ने कहा था कि उनके ऊपर काम का इतना बोझ ह कि उनके विभाग को दो हिसों मे बाट देना चाहिए। ऐसे में या देश का आम आदमी यह जानता ह कि चिदबरम के अलावा गह विभाग में राय मी भी ह ? फिर इस थिति के लिए कान दोषी ह ? इसी तरह बहत से सासद ऐसे ह, जो मी तो नहीं ह, लेकिन उनकी बात गभीरता से सुनी जाती ह आर सरकार तथा नाकरशाही को उनकी बात पर गार करने की मजबूरी होती ह। यह उन सासदों की योयता की वजह से ह। सरकार की बात छोड भी दीजिए तो विपक्ष में ही कइ ऐसे सासद ऐसे ह, जिनकी अपनी एक पहचान आर आवाज ह, जबकि वह कभी मी नहीं रहे।

नीलोपल बसु, वदा करात, गुरदास गुा, कलराज मिश्रा, दिविजय सिंह ऐसे ही सासद ह। वय कागेस में मनीष तिवारी, मीनाक्षी नटराजन आर अशोक तवर कुछ ऐसे नाम ह, जिनकी अपनी एक पहचान ह आर उनके पास काम की भी कोइ कमी नहीं ह, योंकि वह अपने क्षे में काम करते ह आर जनता ह बीच रहते ह। इसी तरह राय मयाेिं में सीपी जोशी, जितिन साद को काम न होने के लिए रोना नहीं पडता।

इस बात को दो तीन उदाहरणों से समझा जा सकता ह। मरहम राजेश पायलट आतरिक सुरक्षा राय मी थे। लेकिन शायद अपने समकालीन कबिनेट मयाेिं से यादा यत भी थे आर उनकी देश में एक वाइस भी थी। पिछली यूपीएवन सरकार में भी श्रीकाश जायसवाल भी राय मी ही थे, लेकिन उहोंने भी अपनी पहचान बनाइ। जबकि लालकण आडवाणी के साथ आइडी वामी राय मी थे, उहोंने अपनी पहचान बनाइ। इन सभी के पास काम होने में उनके कबिनेट मयाेिं का कोइ रोल नहीं था।

अब अगर इन राय मयाेिं का ‘काम’ से तापय ठेकेपरमिट, कोटा लाइसेंस देने से ह, तब तो उनका दुखडा जायज हो सकता ह कि कबिनेट मी सारी मलाइ खुद मार लेते ह आर उहें (राय मयाेिं) कोइ नहीं पूछता। तब तो वाकइ धानमी को मलाइ का सही अनुपात में बटवारा करने की यवथा करनी चाहिए।

इन राय मयाेिं के एक दद से बिना किसी कितु परतु के सहमत हआ जा सकता ह कि राय मयाेिं की बात को अधिकारी नहीं सुनते, लेकिन यह समया भी केवल राय मयाेिं के साथ नहीं ह, बकि इस मुक में अफसरशाही बहत ताकतवर आर बेलगाम ह। अफसर केवल उस कबिनेट मी की ही बात सुनते ह, जो या तो वय तेज हो आर सा फीसदी राजनीतिज्ञ हो या फिर धानमी का नजदीकी हो आर उनका कुछ बिगाडने की हसियत रखता हो। वरना मी जी खुद अपनी फाइलें ढूढते रह जाता ह आर फाइलें सरकारी चाल से ही चलती ह। इस थिति के लिए भी केवल अधिकारियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कारण बहत साफ ह। जब ससद में तीन सा करोडपति सासद पहच गए तो जाहिर ह कि यह तीन सा सासदों आर ऐसे मयाेिं की बात सुनेंगे ? इसलिए बेहतर होगा कि यह राय मगिण अपना दुखडा रोने के बजाए अपनी बात में असर पदा करें आर यह असर तभी पदा होगा, जब वह सा फीसदी राजनीतिज्ञ बनेंगे। वरना चाहे राय मी बन जाए या कबिनेट यह दुख दूर नहीं होगा।

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