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अलगथलग पडी शिवसेना

Swatantra Vaartha  Wed, 3 Feb 2010, IST

अलगथलग पडी शिवसेना

भारतीय जनता पार्टी के अयक्ष नितिन गडकरी ने ‘मुबइ मराठियों’ की बात करने वालों की तुलना कमीर की धारा ३७० का समथन करने वालों से की है। उहोंने शिवसेना तथा महाराट नवनिमाण सेना की दलीलों का पट विरोध करते हए इस बात पर आचय यत किया कि सेना वय भी कमीर के मामले में सविधान के अनुछेद ३७० के उसी तरह खिलाफ ह, जिस तरह भाजपा, लेकिन मुबइ के बारे में वह दूसरा मानदड अपना रही ह। हम एक देश में दो तरह के मानदड नहीं अपना सकते। उहोंने पट शदों में ‘मुबइ महाराटियों की’ विचारधारा का विरोध किया।

अब शिवसेना के पास शायद ही गडकरी के इस तक का कोइ जवाब हो। शायद उसने कभी यह सोचा भी न हो कि उसके ‘मुबइ महाराीयों की’ के नारे की तुलना अनुछेद ३७० से की जा सकती ह,लेकिन अब उसके सामने इसका जवाब देने की समया तो ह ही। राटीय वय सेवक सघ के सरसघ चालक मोहन भागवत ारा उार भारतीयों की रक्षा के लिए सघ कायकताआें को तनात करने के निर्देश के बाद अब कागेस को भी अधिक मुखर प में उार भारतीयों के पक्ष में उतरना पड रहा ह। गहमी पी चिदबरम ने ‘मुबइ मराठियों की’ के साित को ‘घातक’ बताते हए कहा ह कि देश की यह आथिक राजधानी देश के येक नागरिक की ह। कागेस महासचिव राहल गाधी ने अपनी बिहार याा के दारान कहा कि २६/११ के समय मुबइ की रक्षा करने वाले कमाडो उार देश व बिहार के ही थे। मुबइ की रक्षा के लिए बिहारियों को वहा रखना पडेगा।

कागेस के साथ सघ आर भाजपा के भी इस तरह वि हो जाने के बाद ‘शिवसेना’ निचय ही पूरी तरह अलगथलग पड गयी ह। निचय ही देश के लिए यह एक शुभ थिति ह, लेकिन अछा होता यदि कें सरकार कमीर के बारे में भी वही ख अपनाती, जो वह मुबइ के बारे में अपना रही ह। यदि मुबइ सबकी ह, तो कमीर केवल कमीरियों का कसे हो सकता ह। कमीर को धरती का वग कहा जाता ह। फारसी की यह सि कहावत ह ‘अगर फिरदास बरए जमीनत, अभीनत, अभीनत, अभीनत’ (अगर धरती पर कहीं वग ह, तो यहीं ह, यहीं ह, यहीं ह)। कमीर ाचीन भारतीय सकति, दशन, त विज्ञान, साहिय एव याकरण का एक मुय कें रहा ह। शव दशन की तो वह धान पीठ रहा ह। कागेस के लिए भले ही कमीर के इस महव का कोइ विशिट मूय न हो, लेकिन देश के गारवपूण इतिहास के लिए यह अयत महवपूण है।

गडकरी ने जिसकी याद शिवसेना को दिलायी ह, उसे वय अपने लिए भी मरणीय बनाना चाहिए आर कागेस को भी उसकी याद दिलानी चाहिए। साा के लोभवश भाजपा ने भी कभी ३७० को ताक पर रख दिया था, यानी ‘कमीर केवल कमीरियों का’ साित को मूक मायता दान की थी। कमीर समया के लगातार उग से उगतर होते जाने के पीछे एक बडा कारण यह भी ह कि देश के तमाम बडे राजनीतिक दल लगातार उसके अलगाव का समथन करते आ रहे ह। यदि अनुछेद ३७० को हटाकर कमीर के भारत के साथ एकीकरण को पूण करने का कदम उठाया गया होता, तो आज की बदतर थिति कभी न पदा होती।

खर, अब से सही। मुबइ के बारे में जिस तरह सघ के साथ भाजपा व कागेस ने एकमत का दशन किया ह, उसी तरह उहें कमीर के बारे में भी करना चाहिए।

विवाह एव तलाक पजीकरण अनिवाय किये जाने की जरत

खबर ह कि केींय विधि एव याय मालय ने गह मालय को लिखा ह कि देश के विवाह पजीकरण कानून में सशोधन करके उसमें निहित ३० दिन के ‘नोटिस पीरियड’ का ावधान हटा दिया जाए। उधर वाय मी ने कहा ह कि वे ऐसी यवथा करने जा रहे ह, जिससे येक गभवती ी एव शिशु जम का पजीकरण किया जा सके। ये अछे कदम कहे जा सकते ह। लेकिन सामाजिक टि से सवाधिक आवयक विवाह, तलाक तथा शिशु जम का पजीकरण अनिवाय बनाना ह। विधि मी वीरपा मोइली ने कहा ह कि वह गह मी से कहेंगे कि विवाह पजीकरण के लिए निधारित ३० दिन का ‘नोटिस पीरियड’ (विवाह का आवेदन करने आर पजीकरण के बीच की अवधि) या तो समात कर दें या उसे अयधिक कम कर दें। मोइली साहब यह यवथा विवाहेछु युवाआें को परिवार, जाति व समुदाय ारा पहचायी जाने वाली बाधाआें से बचाने के लिए करना चाहते है यानी वह परिवार की इछाआें के वि अतजातीय व अतधामिक विवाहों को ाेसाहन देना चाहते ह। बालिग युवाआें को वेछया अपना जीवनसाथी चुनने के अधिकारों की रक्षा के लिए यह यवथा जरी हो सकती ह, लेकिन युवाआें के अधिकारों की रक्षा के साथ यदि यापक सामाजिक सुरक्षा सुनिचित करनीहै , तो मोइली साहब को हर तरह के विवाह व तलाक के पजीकरण की अनिवाय यवथा करनी चाहिए। विवाह चाहे परिवारों ारा धामिक रीतिरिवाजों के अनुकूल हो या मदिर, चच, गुारों या आय समाज की यवथाआें के अनुसार हों अथवा विवाह अधिकारी की अदालत में यह रम पूरी की जाए, इन सबका पजीकरण अनिवाय किया जाना चाहिए। इसी तरह यदि कोइ तलाक लेने या देने का इरादा करता हो, तो उसे भी निधारित यायिक अधिकारी के समक्ष इसकी सूचना देना अनिवाय किया जाना चाहिए। विवाह के साथ तलाक की किया का भी सरलीकरण किया जाना चाहिए। आपसी सहमति के तलाक को तकाल वीकति दे देनी चाहिए। जिसमें विवाद हो, उसमें भी सबधित पक्षों के आथिक हितों की चिंता पहले की जानी चाहिए आर उनकी जीवन सुरक्षा तथा निवाह सुविधा सुनिचित की जानी चाहिए।

वाय की टि से गभवती याेिं तथा नवजात के पजीकरण की यवथा भी एक सराहनीय कदम ह, किंतु इसमें जहा गभवती ी का पजीकरण वछित होना चाहिए, वहीं शिशु के जम का पजीकरण अनिवाय होना चाहिए। किसी गभवती ी को अपने गभ का चार करने के लिए बाय नहीं किया जा सकता, किंतु नवजात शिशु देश का नवजात नागरिक होताहै , जिसका पजीकरण आवयक ह। इसके साथ सरकार को यह भी सुनिचित करना चाहिए कि कमजोर वग की सभी गभवती याेिं व उनके शिशुआें की सुरक्षा का पूरा दायिव राय ारा वहन किया जाए। यह एक बडा काय है । देश में तिवष करीब २ करोड ७० लाख याि गभवती होती ह। इनमें अधिकाश कमजोर वग की होती ह, जिनके ति सरकार को अपने दायिव का निवाह करना है ।

सरकार विवाह व तलाक के अनिवाय पजीकरण की यवथा से बचना चाहती ह, योंकि अपसयक समुदाय के लोग इन मामलों में सरकार का कोइ हतक्षेप नहीं चाहते। सरकार को निचय ही उनके विवाह व तलाक के नियमों, तरीकों व परपराआें में हतक्षेप नहीं करना चाहिए, लेकिन उनका पजीकरण अवय अनिवाय कर देना चाहिए। योंकि इतना भी यदि कर दिया जाए, तो बहत सी पारिवारिक समयाआें का समगत: नहीं तो अशत: समाधान अवय हो


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