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मुसलिम और इसाइयों के लिए अलग कानून कयों?

Swatantra Vaartha  Wed, 3 Feb 2010, IST

मुसलिम और इसाइयों के लिए अलग कानून कयों?

ससद का एक भी स ऐसा नहीं जाता है , जिसमें किसी न किसी प में समान नागरिक सहिता का मुा न उठता हो। चूकि यह कानून का विषय है , इसलिए यायालयों में यह मुा उस समय तुत होता है, जब विवाह अथवा तलाक सबधी कोइ मुकदमा आता है। जितने भी मामले आते है, उनमें भरणपोषण का मुा मुय होता है। भारत के सर्वो यायालय ने इस कार के मुकदमों की बढती तादाद को रोकने के लिए भारत सरकार से कइ बार आगह किया ह कि वह इसके लिए समान नागरिक सहिता बनाकर इस जटिल मसले को हल करने का यास करे, लेकिन देखा यह गया कि जब बहसयक समाज का कोइ मामला पेश होता ह, तब तो सरकार ऐसे कानून को बनाने की हिमायत करती ह, लेकिन इसाइयों आर मुसलमानों का मामला आने पर दाएबाए देखने लगती है

सर्वो यायालय ने जब शाहबानो के मुकदमे पर कडा ख अपनाया, उस समय तो तकालीन राजीव गाधी सरकार तयार हो गइ। आरिफ मोहमद खान के ारा राजीव गाधी ने यह भी सदेश देने का यास किया गया कि कानून के मामले मे सरकार अपने नागिरकों के बीच भेद नहीं कर सकती। जब फाजदारी कानूनी की धारा १२५ के तहत मुलिम महिला को भी भरणपोषण दिए जाने की बात वीकारी जाने लगी तो मुलिम समाज में इसकी कडी तिकिया हइ। मुसलमानों ने राजीव सरकार को दो टूक शदों में कह दिया कि यदि आप इस कार का कानून बनाएगे तो मुलिम इसे कभी बदात नहीं करेंगे, साथ ही मुलिम वोट भी कागेस को नहीं मिलेगा। इस दबाव आर वोट खोने के भय से सरकार पलट गइ आर रातोंरात मुलिम महिला सुरक्षा कानून बना दिया गया। तबसे कागेस के लिए सविधान में दिए गए समान नागरिक कानून की बात भूली बिसरी हो गइ आर फिर उस पर कभी चचा नहीं हइ। १९९६ में जब राजग की सरकार आइ तो गठबधन सरकार की बात कहकर मुय सााधारी दल भी इससे पीछे हट गया, लेकिन सरकार के आगेपीछे हो जाने से कोइ समया का समाधान नहीं हो जाता।

सविधान में समान नागरिक सहिता का विषय तीनों सूचियों में दिया गया ह। सघ, राय एव समवर्ती सूची में होने के कारण कोइ भी सरकार अथवा के आर राय, दोनों सरकारे इस पर कानून बनाने का अधिकार रखती ह। महारा में जब गठबधन सरकार थी, उस समय इसके लिए अयादेश तुत हआ था, लेकिन आज तक उसे कानून का प नहीं मिला ह। तकालीन राजग सरकार ने के में तो गठबधन सरकार की बात कहकर पा झाड लिया, लेकिन इस समय देश के आठ रायों में भाजपा की सरकारें ह। वहा यह अयादेश पारित कराया जा सकता ह। देवेगाडा सरकार के कायकाल में सर्वो यायालय ने जब सरकार से पूछा कि के समान नागरिक सहिता बनाने के लिए या कर रहा ह ? उस समय देवेगाडा सरकार बहत नाराज हइ आर उसने सर्वो यायालय से ही सवाल किया कि उहें सरकार से यह पूछने का या अधिकार ह ? तबसे मामला अधर में लटका हआ ह। यायपालिका जिस कानून को देश के लिए अनिवाय मानती है आर बारबार अपने निणय में उसकी माग करती ह, पर देश की चुनी हइ सरकारे उस पर कोइ यान नहीं देतीं तो यह भारत की जनता आर यायपालिका का अपमान है। यदि भारत सरकार एव मुलिम समाज समान नागरिक सहिता को इलाम के वि मानता ह, तो फिर भारत के ही एक राय गोवा में यह पुतगाली काल से यों लागू ह? वहा केे मुलिमों ने न तो कभी इसका विरोध किया आर न ही मुलिमों की चिंता करने वाली भारत सरकार ने गोवा विधानसभा को इस मामले में कभी कोइ हिदायत दी। इतना ठोस आर जायज सबूत होने के बावजूद भारत सरकार एक छोटे से वग की इतनी चिंता यों करती ह? भारत में जहा कहीं भी मुलिम सरकार विरोध करते ह, उनमें मुामालवियों के साथ मुलिम पुषों का एक खास वग रहता ह। यानी मुलिम जनसया की आधी आबादी यानी मुलिम महिलाए इसका विरोध नहीं करतीं, बकि अदालत में चल रहे मुकदमे आर उनके नतीजे यह दशाते ह कि वे शरीयत के कानून के थान पर समान नागरिक सहिता चाहती है।

तलाक आर विवाह के साथसाथ पिछले कुछ समय से विवाह पजीकरण का मामला भी चिंता का विषय बना हआ ह। वातव मे देखा जाए तो विवाह में पजीकरण के पचात यायालय मे आने वाले इस कार के मुकदमों की बाढ थम जाएगी। लेकिन सोनिया गाधी आर मनमोहन सिंह के नेतव में बनी सग सरकार इस कानून से आख मिचाली खेल रही ह। अब तो यह कानून पूण प से सरकारी लेटलतीफी के जाल में फस गया ह। पिछले चार साल से विवाह पजीयन अनिवाय अधिनियम २००५ बनाए जाने का यास किया जा रहा ह, लेकिन कभी मजहब का मुा तो कभी दो मालयों की आपसी खींचतान ने इस विधेयक की राह में रोडे अटका दिए ह। अब तो इस बात से भरोसा उठता जा रहा ह कि यह विधेयक कभी कानून की शल ले सकेगा।

सर्वो यायालय ने सीमा बनाम अविनी कुमार (एआइआर ०६ एससी ११५८) के मामले में १४ फरवरी, २००६ को यह निणय दिया था कि सभी ययाेिं, जो भारत के नागरिक ह आर चाहे किसी भी मतपथ जुडे ह, के विवाह को अनिवाय प से पजीकत किया जाए। सर्वो यायालय के निर्देश के पचात सभी मतपथों के लिए विवाह पजीकरण अनिवाय बनाने के लिए राीय महिला आयोग से लेकर तमाम महिला सगठनों तक ने आवाज उठाइ। सरकार के महिला आर बाल कयाण मालय ने भी इसे तकाल लागू करने की माग की। आयोग ने सर्वो यायालय के निर्देश के तुरत बाद २६ फरवरी, २०६ को विवाह पजीयन अनिवाय अधिनियम २००५ विधेयक का मसादा भी तय करके महिला आर बाल विकास मालय को साप दिया। आयोग मानता ह कि विवाह पजीकरण नहीं होने का सबसे अधिक नुकसान महिलाआें को भुगतना पडता ह। विवाह केे बाद तलाक होने या पनी को सपा से बेदखल करने, बों के भरणपोषण का भार न उठाने, किसी किशोरी या महिला से जबरन विवाह करने जसी थिति में विवाह पजीकरण उपयोगी साबित होगा। इसके पक्ष में यह भी कहा गया था कि विदेश में जो धोखाधडी से विवाह होते ह, उन पर भी इससे रोक लग जाएगी। यह एक कानून अनेक कों आर जालसाजियों से समाज को बचाने आर सुरक्षित रखने में फालादी शिकजे जसा होगा, लेकिन जिहें इस दद का अहसास नहीं आर देश की आधी जनसया के लिए जो कभी चिंता नहीं करते उहें इसकी फिक यों हो? २६ नवबर २००९ को ससद को यह जानकारी दी गइ कि सभी मतपथों में विवाह के लिए पजीकरण को अनिवाय बनाने वाले विधेयक के सबध में सबधित मालय सावधानीपूवक समीक्षा कर रहे है। इस सबध में विशेषज्ञों से भी सलाहमशविरा किया जा रहा ह। इतना होने के बाद भी मालय ने इस सबध में यह जानकारी नहीं दी ह कि उ विधेयक कब तक लागू हो पाएगा ? सरकार इस मामले में कोइ प घोषणा करेगी या नहीं ?

इस गतिशील आर अनिवाय विधेयक की यह शोकातिका ह कि यह ारभ से ही विवादों में उलझा दिया गया है। सरकार की इस मामले में न तो प नीति रही ह आर न ही नीयत नेक रही ह। इसे दो मालयों के बीच इतना झुलाया गया ह कि उसका असली प कान तय करेगा, यह अब तक प नहीं हआ ह। जब एक मालय कोइ ख तय करता ह, तो दूसरा उसे नकार देता ह। ऐसा लग रहा ह कि उ विधेयक को ठडे बते में डालने के लिए इन दो मालयों में पधा हो रही ह। जब सरकार को किसी मामले में देर करनी होती ह, तो उसके लिए उसके पास अनेक है थकडे है। जो समयसमय पर दोहराए जाते ह। इसमें सबसे महव की बात यह है कि महिला आयोग आर बाल विकास मालय इस बात पर अडे हए ह कि सभी मतपथों के लोगों के लिए विवाह पजीकरण अनिवाय बनाया जाए। सूाें के अनुसार, विधि आर याय मालय चाहते ह कि यह अनिवायता केवल हिदू धम से जुडे लोगों के लिए हो। यानी विवाह पजीकरण बहसयक वग के लिए आवयक हो। जिहें सविधान ने अपसयक घोषित किया हआ ह, उनके लिए यह बिकुल लागू न किया जाए। कानून मालय को भय है कि अगर इसे मुसलमानों आर इसाइयों पर लागू किया जाएगा तो देश में बवडर मच जाएगा। इस समय तो जो समाचार मिल रहे ह, उनसे यह लगता है कि वतमान सरकार मुसलमानों आर इसाइयों को नाराज करके अपना वोट बक खतरे में नहीं डालना चाहती है।

उपरो सोच का आधार या है, यह प नहीं किया गया है। इस समय जो इसाइ आर मुलिम विवाह कानून लागू ह, उनमें कहा ऐसा निर्देश दिया गया ह कि सरकार उहें पजीकत नहीं कर सकती ? यदि वातव में यह मजहब के मामले में दखलदाजी ह, तो फिर मुलिम पतिपनी जब विदेश याा करते ह, तो उनकेे लिए पजीकरण आवयक यों ह ? मजहब की खातिर तो उहें अपनी विदेश याा टाल देनी चाहिए। घर में यह हतक्षेप आर विदेश में इसके लिए कोइ बदिश नहीं, यह दोहरा मापदड या दशाता ह ? यही कि अपने निजी कानून की धमक भारत में बनी रहे आर वे राीय वाह से अलगथलग रहें। भारत सरकार यह फसला करे कि वह देश में राीय एकता आर समानता चाहती ह या फिर मजबह के आधार पर किसी एक वग को विशेष दजा दान करना चाहती है ? जिस देश के सााढ गठबधन की अयक्ष महिला हो, लोकसभा अयक्ष महिला हो आर विपक्षी दल की नेता भी महिला हो, उस देश में विवाह पजीकरण का कानून न बन सके, तो इससे बढकर भारतीय समाज की शोकातिका आर या हो सकती ह?

सपक : ०९८१९१८६८६६


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