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वित्तीय छूट, विकास दर और निजी क्षेत्र

Swatantra Vaartha  Wed, 3 Feb 2010, IST

वित्तीय छूट, विकास दर और निजी क्षेत्र

सरकार और बाजार के बीच इस समय एक खास तरह की बहस चल रही है । सरकार का कहना है कि अथयवथा मदी के दार से निकल आइ है । आाेगिक उपादन बढ रहा है , उपभाेा नकदी लेकर बाजार में खरीदारी करने निकल पडे है , यहा तक कि नियात में भी बढाेारी हइ ह। दुनिया की दूसरी अथयवथाए भी करवट ले रही ह। ऐसी परिथिति में अगर उसने अथयवथा में नकदी पप करने की किया जारी रखी तो उसका वाय खतरे में पड सकता है । मुाफीति बढ जाएगी, जिससे राजकोषीय घाटे की पहले से ही खराब चल रही हालत आर बिगड जाएगी। बाजार यानी निजी क्षे सरकार से सहमत नहीं ह। उसकी दलील ह कि अभी मरीज पूरी तरह से ठीक नहीं हआ है , इसलिए दवाइ रोकना उचित नहीं होगा। उपादन आर उपभोग के चक ने हाल ही में गति पकडी है , इसलिए उसे अभी कुछ आर सहारे की आवयकता है ।

अगर अभी सरकार ने अपनी वाीिय रियायतें वापस ले लीं तो एक बार फिर उपादक उसी पुरानी हालत में पहच सकते ह। याज दर अगर बढने दी गइ तो एक बार फिर उपभाेाआें के उसाह पर पानी फिर जाएगा। खतरा यह ह कि इससे मुाफीति तो केगी नहीं, उटे उपादन में जडता आ जाएगी। यह परिय टगलेशन का होगा, जिसके कारण मदी से उबरने की किया को झटका लगेगा। सवाल यह ह कि या सरकार निजी क्षे के इस तक पर कान दे रही ह ? अगर हाल के घटनाकम पर जाए तो नहीं लगता कि निजी क्षे सरकार को भावित करने में सफल रहा ह। दरअसल, सरकार वाीिय रियायतों (टिमुलस पकेज) को वापस लेने के पहले चरण का एलान तक कर चुकी हहै ।

मदी का मुकाबला करने के लिए मनमोहन सिंह की पहली सरकार ने यह पकेज कइ कितों में दिया था। उस मदी की खास बात यह थी कि अथयवथा में नकदी की कमी थी, इसलिए सारी दुनिया में सरकारों ने खुले हाथ वाली वाीिय नीतियों पर अमल की योजना बनाइ थी। सरकार ने कम से कम चार ऐसे कदम उठाए ह, जिनसे पता चलता ह कि उसका इरादा या ह। एसएलआर (टेचुअरी लिडििटी रेयो) २४ से बढाकर २५ कर दिया गया ह, जिसके कारण वाीिय णाली से ४०,००० करोड पए खींच लेने में आसानी होगी। सरकार ने वह विशेष खिडकी बद कर दी ह, जिसे यापारिक बकों के वाीिय समथन के लिए खोला गया था ताकि वे युचुअल फडों, गरबकिंग वाीिय सथाआें आर गहनिमाण में निवेश को ाेसाहित करने वाली कपनियों को कज दे सकें।

नियात के लिए कज हेतु वाीिय सहायतासुविधा में भारी कटाती कर दी गइ ह। अब यह सहायता पचास फीसद की जगह मदी से पहले के अनुपात यानी १५ फीसद पर आ गइ ह। रिजव बक ने बाहर से लिए जाने वाले यापारिक उधार की कसाटियों को आर कडा बना दिया ह। अब याज के भुगतान के बारे में कहीं यादा सती बरती जाएगी। कइ शत] जो पहले खम कर दी गइ थीं, अब उन पर दोबारा अमल शु कर दिया गया ह। भारत के बडे पूजीपतियों को इस सुविधा से काफी आसानी हो रही थी, पर अब वे इसके सहारे बठे नहीं रह सकते।

आाेगिक घरानों को डर ह कि सरकार कश रिजव रेयो बढाकर कज लेना आर महगा करने की किया में ह। वह बकों को ाेसाहित करने वाली ह कि वे अपना पसा पहले से यादा माा में रिजव बक के पास रखें। नए साल के बजट को ये तमाम घराने अदेशे के साथ देख रहे ह। उहें लग रहा ह कि नए बजट में उपाद शुक में दी गइ रियायतें भी वापस ले ली जाएगी । ऊपर से वतुआें आर सेवाआें पर लगाए जाने वाले टस (जीएसटी) को तावित किया ही जा चुका ह।

कपडा उाेग को याज दरों में दो फीसद की दी जाने वाली रियायत भी वापस ली जा सकती ह। यह रियायत इस उघोग की सेवा योजन की क्षमता के साथ जोड कर दी गइ थी। इसके तहत करीब साढे तीन करोड लोगों को यक्ष आर साढे चार करोड लोगों को अयक्ष नाकरिया मिलती ह। आाेगिक सगठनों को लग रहा ह कि अगर यह रियायत खम कर दी गइ तो कपडा उाेग में हाल में आए उछाल का भटठा बठ जाएगा। इसी तरह सरकार रायों ारा अपने कुल घरेलू उपाद से आधे फीसद अतिरि उधार लेने की इजाजत भी खम करने वाली है ।

निजी क्षे की तरफदारी करने वाले विशेषज्ञों की राय ह कि अगर अगला बजट वाीिय रियायतें वापस लेने के दूसरे चरण का तिनिधि साबित हआ तो आटोमोबाइल, एफएमजीसी, कपडा टील, एमुमिनियम जसे क्षेाें के विकास पर बुरा असर पडेगा। अथयवथा में माग भी घटेगी आर सलाइ भी। नियात की व दर पिछले १३ महीनों से नकारामक चल रही थी, पर नवबर में पहली बार वह सकारामक हइ ह। वहा भी परनाला फिर वहीं से निकलने लगेगा। राजकोषीय घाटा निति प से बहत यादा (कुल घरेलू उपाद का ६८ फीसद) ह, पर उसे बढने से रोकने आर घटाने के लिए हम व दर को दाव पर नहीं लगा सकते।

जहा तक मुाफीति का सवाल ह, इन विशेषज्ञों के पास इस तरह के अययन ह, जो दिखाते ह कि कडी माकि नीतिया बाजार में मुा फीति दर कम नहीं कर पातीं। निजी क्षे की तक पति के कें में विकास दर की दलील ह, जिसे आसानी से नजरअदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन, जो बात छिपा ली गइ ह, वह उसकी पुरानी वा ह, जिसके मुताबिक निजी क्षे किसी भी किम की रियायत को वापस लेने का हमेशा विरोध करता रहा ह। वसे तो सारी दुनिया के निजी क्षे के साथ ही यह समया ह, पर भारतीय निजी क्षे को इस मामले में महारत हासिल है ।

उाेगपतियों के परोकार मान कर चलते ह कि सरकार ारा उनके मुनाफा कमाने पर लगाइ गइ सारी बदिशें अथायी होनी चाहिए आर उसे ाेसाहन देने के लिए उठाए गए सारे कदम थायी होने चाहिए। जब सरकार ने वाीिय पकेज लागू किया था, उस समय निजी क्षे का मानना था कि यह नाकाफी ह। उसकी वह मायता गलत साबित हइ। णव मुखर्जी, चिदबरम आर मनमोहन सिंह की तिकडी का अदाजा यादा ठीक निकला। अब इन दोनों पक्षों के नीतिगत फामूलों की एक बार परीक्षा होने वाली ह। अगले तीन महीने बताएगे कि वाीिय रियायतों का पकेज वापस लेने का अथयवथा पर या असर पडने वाला ह। वसे अभी तक तो जो सरकार ने किया ह, वही कमोबेश लाभकारी साबित हुआ है ह।


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