ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या तेलंगाना मामला केन्द्र सरकार के गले की हड्‍डी बन गया है?

  • हाँ
  • नहीं
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

यह समिति क्या कोई सार्थक योगदान कर सकेगी

Swatantra Vaartha  Fri, 5 Feb 2010, IST

यह समिति क्या कोई सार्थक योगदान कर सकेगी

केंद्र सरकार ने आखिरकार बहुप्रतीक्षित तेलंगाना समिति की घोषणा कर दी। मुंबई दंगों की जांच के लिए प्रसिद्धि प्राप्त न्यायाधीश बेलुर नारायण स्वामी श्रीकृष्णा के नेतृत्व में गठित इस पांच सदस्यीय समिति की सेवा शत] अभी तैयार नहीं हो सकी हैं, लेकिन इसकी घोषणा में ब़डी सावधानी से ‘तेलंगाना’ शब्द को बचाया गया है।

गृहमंत्रालय द्वारा जारी बयान में इसे ‘आंध्र प्रदेश की स्थिति’ (सिचुएशन इन आंध्र प्रदेश) पर विचार के लिए गठित किया गया है। यह विभिन्न राजनीतिक दलों व समूहों से व्यापक बातचीत के बाद अपनी रिपोर्ट देगी। अभी इस रिपोर्ट की अवधि के बारे में भी फैसला नहीं किया गया है। पहले यह कहा जा रहा था कि समिति दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट दे देगी, किंतु अब ऐसी कोई कल्पना नहीं की जानी चाहिए। न्यायमूर्ति श्रीकृष्णा यद्यपि समय के पाबंद हैं, किंतु इस समिति के संदर्भ में उन्हें कोई जल्दी है न सरकार को।

मीडिया खबरों के अनुसार न्यायमूर्ति अभी काम शुरू करने की ही स्थिति में नहीं हैं। उनके परिवार में कोई शादी है, जिसमें वह करीब एक महीने व्यस्त हैं। इससे फुरसत होगी, तो उनकी गृहमंत्रालय के अधिकारियों के साथ समिति की सेवा शता] के बारे में बातचीत होगी। यह अपने में ही ट़ेढा काम है। इसमें कितना समय लगेगा, यह भी नहीं कहा जा सकता। शता] की घोषणा के बाद फिर समिति का कार्य व्यापार शुरू होगा।

इस संदर्भ में यह रोचक है कि इस समिति के पांच सदस्यों में से कोई भी आंध्र प्रदेश की स्थितियों से वाकिफ नहीं है। मीडिया खबरों की उ़डती जानकारी के अलावा इसकी जमीनी संवेदना तथा समस्याआ से किसी का कभी कोई लेनादेना नहीं रहा है। इसे समिति के लिए अच्छा भी कहा जा सकता है, बुरा भी। जस्टिस कृष्णा का स्वयं भी यह कहना है कि हैदराबाद की कुछ यात्राआें के अतिरिक्त उनका आंध्र प्रदेश से कभी कोई लेनादेना नहीं रहा। हां, कुछ तेलुगु शब्दों के अर्थ जरूर मालूम हैं। बाकी के चार सदस्यों में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो डॉ रणवीर सिंह अवश्य कुछ दिन नलसार में रह चुके हैं, लेकिन बाकी उनका भी आंध्र से कोई संबंध नहीं रहा है।

केंद्र सरकार ने यह समिति गठित करके कुछ राहत की सांस ली है। कम से कम अब तेलंगाना पर फैसले की जिम्मेदारी केंद्र सरकार से हटकर इस समिति पर आ गयी है। अब जब तक यह समिति अपनी रिपोर्ट नहीं देती, तब तक तो वह झंझट से मुक्त रहेगी ही। इस बीच सांस टंगी रहेगी तेलंगानावादियों की, क्योंकि उन्हें तब तक लगातार अपना आंदोलन जीवंत बनाए रखना होगा। तेलंगाना के लिए आंदोलन चला रही ‘संयुक्त कार्रवाई समिति’ (जेएसी) का कहना है कि समिति की सेवा शता] की घोषणा के बाद ही वह इस पर अपनी प्रतिक्रिया देगी, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उनका आंदोलन तब तक लगातार जारी रहेगा, जब तक पृथक तेलंगाना के गठन की विधिवत घोषणा नहीं हो जाती। भारतीय जनता पार्टी की नजर में समिति का गठन तेलंगाना संबंधि निर्णय को लटकाए रखने का मात्र एक बहाना है, तो तेलुुगु देशम पार्टी इसे केंद्र सरकार का षड्‌यंत्र मानती है। कांग्रेस और तेलुगु देशम पार्टी दोनों की सबसे ब़डी समस्या है कि उनका दोनों नावों में पैर है। वे पृथक तेलंगाना के भी साथ हैं और संयुक्त आंध्रा के भी।

इस संदर्भ में यदि पूरे प्रदेश का जनमत लिया जाए, तो पता चलेगा कि आंध्र और तेलंगाना के बीच असली संघर्ष हैदराबाद को लेकर है। हैदराबाद कोई क्षेत्र छ़ोडना नहीं चाहता। इसलिए असली ल़डाई हैदराबाद को लेकर अटकी हुई है। यदि राज्य एकजुट रहता है, तब तो कोई समस्या है ही नहीं, लेकिन यदि विभाजन होता है, तो हैदराबाद के बारे में फैसला अहम होगा। यदि समिति इसका सम्यक समाधान निकालने में मदद कर सकती है, तब तो उसकी सार्थकता सिद्ध हो सकती है, अन्यथा वह निश्चय ही समस्या के विलंबन का एक उपाय ही सिद्ध होगी।

पाक के लिए अमेरिकी सहायता में भारी वृद्धि

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कांग्रेस के समक्ष पेश किये गये अपने वार्षिक राष्ट्रीय बजट में पाकिस्तान की आर्थिक सहायता और ब़ढाने का प्रस्ताव किया है। वर्ष २०१० में पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशि १८८ अरब डॉलर है, लेकिन २०११ में इसे ३२ अरब डॉलर कर दिया जाएगा। प्रबंधन एवं संसाधन के उपविदेश मंत्री जैकब ल्यू ने ओबामा सरकार की तरफ से कहा है कि आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान अमेरिकी सरकार का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है। यह बजटीय सहायता इस इलाके में स्थिरता लाने में अहम है तथा इससे आतंकवाद के खिलाफ जंग के अभियान को ब़ढावा मिलेगा। ह्वाइट हाउस की तरफ से भी सहायता में इस भारी वृद्धि का समर्थन करते हुए कहा गया है कि ‘पाकिस्तान के लिए इस बजट से सुरक्षा सहायता में मदद मिलेगी और नई ऊर्जा परियोजनाआें को ब़ढावा मिलेगा। यही नहीं ओबामा सरकार ने पाकिस्तान की आतंकवाद निरोधक क्षमता ब़ढाने के लिए दिए जाने वाले कोश में भी ३२ कऱोड डॉलर की वृद्धि का प्रस्ताव किया है। २००९ में यह ७० कऱोड डॉलर था, जिसे अब १२ अरब डॉलर किया जा रहा है।’

ह्वाइट हाउस के अनुसार ‘अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान की सहायता ब़ढाने का उद्देश्य वहां आर्थिक विकास तथा उनकी तालिबान के खिलाफ संघर्ष की क्षमता ब़ढाना है।’ ओबामा प्रशासन के एक अधिकारी के अनुसार ‘वर्ष २०११ के वित्तीय वर्ष के बजट में अफगानिस्तान को ५३ अरब डॉलर और पाकिस्तान को ३३ अरब डॉलर की सहायता दी जाएगी। २०११ का बजट इन दोनों देशों में चले अमेरिकी अभियान को मदद देने वाला है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा निर्धारित रणनीति को वहां कार्यान्वित कराने के लिए इन दोनों देशों में अमेरिकी अधिकारियों की संख्या भी ब़ढायी जाएगी। अफगानिस्तान में ५०० तथा पाकिस्तान में ३० और अमेरिकी अधिकारी नियुक्त किये जाएंगे। ये सभी असैन्य अधिकारी होंगे। इनके लिए भी अतिरिक्त कोश उपलब्ध कराया जाएगा। यह सब उस सहायता के अतिरिक्त है, जो अफगानी सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण और उनके लिए आवश्यक उपकरण जुटाने के अलावा पाकिस्तान के सुरक्षा बलों की क्षमता ब़ढाने के लिए दी जाने वाली है। एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार अफगानिस्तान के सुरक्षा बलों के लिए ११६ अरब डॉलर तथा पाकिस्तान के सुरक्षा बलों के लिए १५ अरब डॉलर निर्धारित किया गया है।

अमेरिकी बजट में निर्धारित इन सहायता राशियों से अनुमान लगाया जा सकता है कि अफगान तथा पाकिस्तान की तालिबान समस्या के समाधान की अमेरिकी रणनीति क्या है। राष्ट्रपति ओबामा को अभी भी अमेरिकी शासन और सेना पर भरोसा है कि वह तालिबान का सफाया कर सकती है। एक तरफ वह नरम तालिबान नेताआें को खरीदना चाहते हैं, दूसरी तरफ पाकिस्तानी एवं अफगान सेना की क्षमता ब़ढाकर कट्‌टर तालिबान का सफाया करना चाहते हैं। यह सारा कुछ वह २०११ के पहले निपटा लेना चाहते हैं। भारत भी यह चाहेगा कि वह अपनी रणनीति में सफल हो, लेकिन यथार्थ यही है कि उनकी यह सैन्य रणनीति तालिबान समस्या का समाधान नहीं कर सकती।

आपकी राय