भारत-बंगलादेश संबंध और दक्षिण एशिया कूटनीति
चीन की हमारी प़डोसियों पर गिद्ध दृष्टि जगजाहिर है। नेपाल, पाकिस्तान, म्यांमार आज पूरी तरह चीन के आगोश में हैं। भूटान हमारा सबसे अच्छा प़डोसी है, पर चीन से उसे बचाना हमारी कूटनीति के लिए एक अहम सवाल है। हमारे लिए सुखद यह है कि वर्तमान में बंगलादेश में उस शेख हसीना की सत्ता है, जिसकी विरासत भारत के साथ ज़ुडी हुई है। शेख हसीना को समर्थन और आर्थिक सहायता की जरूरत है। भारत ने शेख हसीना को लगभग पांच हजार कऱोड डॉलर की सहायता का वचन देकर सराहनीय कूटनीतिक प्रक्रिया चलायी है। आतंकवाद और मजहबी हिंसा का दमन कर गरीबी दूर करने में शेख हसीना अपना ध्यान लगा सकती है।
बंगलादेश की आबादी गरीबी और फटहाली के बीच जीवन गुजारती है। इसीलिए वह आजाद पाकिस्तान की प्रपंच वाली आतंकवादी और मजहबी नीति का मोहरा बन जाती है। हिंसा या मजहबी आक्रोश से कोई भी देश बेहतर भविष्य नहीं बना सकता है। बंगलादेश की आबादी को इस बात की सच्चाई माननी ही होगी और पाकिस्तान जैसे देशों की आतंकवादी गतिविधियों और नीतियों का कठोर जवाब देना ही होगा। बंगलादेश में भारत विरोधी अतिरंजनाएं को त़ोडना हमारी कूटनीति की चुनौतियां है। इसके लिए भारत की कूटनीति संवर्ग को शेख हसीना के साथमिलकर काम करना होगा और पाकिस्तानचीन जैसे अराजक देशों के षड्यंत्रों पर गंभीर नजर रखनी होगी। इसमें शेख हसीना की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
बंगलादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना जावेद का भारत यात्रा के दौरान हुए सम्मान और प्रसिद्ध इंदिरा गांधी सम्मान से उन्हें सम्मानित करना दक्षिण एशिया की राजनीति में एक प्रमुख राजनीतिक घटना के रूप में देखा जा रहा है। शेख हसीना को भारत द्वारा मिले सम्मान की चर्चा न केवल भारत में है, बल्कि पाकिस्तान, चीन और श्रीलंका के अखबारों की सुर्खियां बनी। भारत ने बंगलादेश को आजाद कराने में कैसी भूमिका निभायी थी, यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। बंगलादेश के निर्माण के साथ ही साथ विकास में भी भारत की भूमिका है। शेख हसीना के भारत दौरे के सबसे उल्लेखनीय बात दोनों देशों के बीच हुए तीन समझौतों की उपलब्धि है। इन तीन समझौतों के माध्यम से भारत और बंगलादेश आतंकवाद, संगठित अपराध और मादक द्रव्यों की तस्करी मिलकर रोकेंगे। बंगलादेश में इससे भारत विरोधी और पाकिस्तान प्रत्यारोपित आतंकवाद के दमन में सहायता मिलेगी। बंगलादेश में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने गंभीर समस्या उत्पन्न की है और इसके चपेट में भारत भी है। पूर्वोत्तर के आतंकवादी संगठनों पर कार्रवाई कर शेख हसीना भारत की चिंता कम कर चुकी है।
शेख हसीना भारत के साथ ज़ुडी अपनी विरासत को कैसे भूल सकती है। पाकिस्तान के अत्याचारउत्प़ीडन और भेदभाव ने बंगलादेश के निर्माण की नींव रखी थी। भारत के हस्तक्षेप से बंगलादेश का निर्माण हुआ। पर अल्पवधि में ही पाकिस्तान समर्थक ताकतों की फिर जीत हुई और बंग बंधु व शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर्रहमान सहित उनके १८ सदस्यों की हत्या कर दी गयी। उस समय शेख हसीना ब्रिटेन में थी। इसलिए पाकिस्तान समर्थकों द्वारा हुए कत्लेआम से बच गयी। दुर्भाग्य यह ज़ुडा की शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या के बाद बनी सरकार ने शेख हसीना को बंगलादेश वापसी के अधिकार को प्रतिबंधित कर दिया। उस समय निश्चित तौर पर शेख हसीना अनाथ थी और उसे एक अभिभावक की जरूरत थी। भारत ने अभिभावक की फिर भूमिका निभायी।
भारत दौरे पर भावुक होते हुए शेख हसीना ने कहा कि पिता की हत्या के बाद भारत ने एक अभिभावक की तरह हमें न केवल शरण दी, बल्कि समर्थन और अन्य सहायताएं दीं। शेख हसीना छह सालों तक भारत में रही थी। तानाशाही समाप्त होने के बाद शेख हसीना बंगलादेश लौटी थी और प्रधानमंत्री भी बनी थी। उनकी तकरार शेख जिया से है। शेख जिया घोर भारत विरोधी है और उनकी नीति में पाकिस्तान का आतंकवाद सर्वोपरि है। बंगलादेश का निर्माण करने वाली प़ीढी धीरेधीरे अवसान की ओर ब़ढ रही है। पाकिस्तान द्वारा ़ढाये गये जुल्म, अत्याचार, कत्लेआम विरोधी आग धीमी हो चुकी है।
पिछली शेख जिया सरकार ने जिस तरह से धार्मिक उन्माद और हिंसा की नीति अपनायी उससे शांति और सद्भाव बिग़डने के साथ ही साथ राजनीति का मजहबीकरण हुआ है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अमेरिकी हमलों से डरकर अलकायदा और तालिबान के आतंकवादी बंगलादेश में शरण ले रखे हैं। बंगलादेश में पिछली जिया सरकार के शह पर अलकायदातालिबान को अपना आतंकवादी नेटवर्क कायम करने में सहुलियतें हुई। मस्जिदें और मजहबी संस्थानों से आतंकवाद की प्रक्रिया संरक्षित होने के साथ ही साथ खूनी गतिविधियां भी तेज हुई। नीति थी मजहबीकरण कर अपनी सत्ता कायम रखना। शेख हसीना को उनके पिता की तरह ही कत्लेआम का शिकार बनाने की भी कई कोशिशें हुई। शेख हसीना ने अपनी द़ृढ राजनीतिक इच्छाशक्ति और कूटनीति से शेख जिया की रची हुई साजिश को न केवल विफल किया, बल्कि शेख जिया को सत्ता से बाहर भी कर दिया।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान की आतंकवाद की नीति से शेख हसीना ने सबक लिया है। उन्होंने महसूस किया कि उनके देश में जिस तरह की हिंसा और आतंकवाद का बीजारोपन किया गया है, उससे न तो भविष्य बेहतर हो सकता है और न विकास का रास्ता बन सकता है। दुबारा सत्ता में आने के बाद उन्होंने आतंकवादी संगठनों और शरीयत के समथकों पर कानून का डंडा चलाया। बंगलादेश निर्माण की अवधारणा को उन्होंने बल दिया। शेख मुजीबुर्रहमान के हत्यारों को सजा दी। न्यायपालिका ने यह भी साफ कर दिया कि बंगलादेश के असली निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान ही हैं। मस्जिदों और मजहबी संगठनों को आतंकवाद से दूर रहने या फिर कानून का डंडा भुगतने का फरमान दिया गया। इस कारण आईएसआई की भारत विरोधी इच्छाआें का दमन हुआ। हमारा पूर्वोत्तर का क्षेत्र उग्रवाद और राष्ट्रविरोधी शक्तियों का अख़ाडा बन गया है। पाकिस्तान और चीन से समर्थन, हथियार और आर्थिक सहायता उग्रवादी और राष्ट्रविरोधी शक्तियों को मिलती है। भारतीय सुरक्षा बल इन शक्तियों का दमन इस कारण नहीं कर पाते कि उग्रवादी भागकर चीन, म्यांमार और बंगलादेश में शरण ले लेते हैं। इधर म्यांमार और भूटान ने भारत की पहल पर भारतीय उग्रवादियों के खिलाफ अभियान चलाया। अब शेख हसीना की सत्ता बंगलादेश में भारतीय उग्रवादियों के खिलाफ अभियान चला रही है। बंगलादेश ने कई भारतीय उग्रवादियों को गिरफ्तार कर भारत को सौंपा भी है। शेख हसीना का प़डोसी धर्म पूर्वोत्तर में हमारी चिंता कम जरूर करती है।
भारत और बंगलादेश के बीच तीन समझौते हुए हैं। ये समझौते मील का पत्थर साबित होंगे। इन समझौतों में आतंकवाद और संगठित अपराध व मादक द्रव्यों की तस्करी के खिलाफ साथसाथ ल़डने की बात है। आतंकवाद से हम दग्ध हैं, जबकि बंगलादेश भी आतंकवाद और मजहबी हिंसाविचार से कम दग्ध नहीं है। दोनों देशों के लिए आतंकवाद और मजहबी आतंकवादविचार का दफन होना जरूरी है। भारत और बंगलादेश के बीच में अभी तक प्रत्यार्पण संधि नहीं है। फिर भी बंगलादेश ने कई पूर्वोत्तर के उग्रवादियों को भारत के हाथों सौंपा है। फिर भी प्रत्यार्पण की संधि का होना जरूरी है। शेख हसीना के भारत दौरे के बीच में प्रत्यार्पण संधि पर बातचीत आगे ब़ढी है,पर समझौते तक पहुंचना अभी कठिन ही माना जाना चाहिए। बंगलादेश की अंदरुनी राजनीति का प्रबंधन थ़ोडा कठिन है। इस सच्चाई को शेख हसीना से ज्यादा और कौन आत्मसात कर सकता है। तिमाईपुर बांध और तीस्ता नदी के जल बंटवारे जैसे गंभीर विवाद भी दोनों देशों के बीच है। इस गंभीर विवाद पर कूटनीतिक चर्चा की जरूरत होगी। भारत को देखना होगा कि पाकिस्तान की बदनाम गुप्तचर एजेंसी आईएसआई शेख हसीना के खिलाफ विद्रोह जैसी
