राज्य के भीतर राज्य का सुझाव
एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक के अनुसार आन्ध्र प्रदेश के कुछ विद्वान बुद्धिजीवियों ने पृथक तेलंगाना राज्य निर्माण की समस्या का अनूठा समाधान पेश किया है। यह समाधान है राज्य के भीतर राज्य निर्माण का। इस सुझाव के अनुसार तेलंगाना को आन्ध्र प्रदेश के अंतर्गत ही स्वायत्त राज्य का दर्जा दे दिया जाए।
उसकी विधानसभा, विधान परिषद सब अलग कर दिया जाए। उसकी अलग सरकार हो, अलग मंत्रिमंडल हो और अपने इलाके के बारे में कोई भी नया कानून बनाने या पुराने कानूनों को रद्द करने का अधिकार हो। हैदराबाद इस स्वायत्त क्षेत्र का अंग रहे, लेकिन पूरे प्रदेश की भी राजधानी होने का उसका दर्जा बना रहे।
इस योजना से तटीय आन्ध्र के लोग भी संतुष्ट हो सकते हैं, क्योंकि एक तो भाषा के नाम पर गठित राज्य का विभाजन नहीं होगा (जो आन्ध्र के लोगों की भावनाआें से ज़ुडा है) दूसरे पृथक राजधानी की समस्या हल हो जाएगी। जहां तक हैदराबाद व उसके आसपास बसे आन्ध्र के लोगों के आर्थिक हितों की बात है, तो उनकी सुरक्षा की कोई कानून व्यवस्था की जा सकती है।
यह सुझाव रोचक तो है, लेकिन यह एक तरह का ‘दृविण प्रणायाम’ ही है। तेलंगाना को पृथक राज्य बनाकर हैदराबाद को संयुक्त राजधानी बनाने का प्रस्ताव कुछ इसके जैसा ही तो है। यह सुझाव सिद्धांतत: निश्चय ही रोचक है, लेकिन व्यावहारिक कम है, क्योंकि इस व्यवस्था के अंतर्गत आन्ध्रा व तेलंगाना क्षेत्र के लोगों के आर्थिक हितों को लेकर लगातार टकराव की स्थिति बनी रहेगी, इसके लिए अव्वल तो कानूनी पेचीदगियों से निपटना होगा, फिर संविधान में संशोधन करना होगा और यदि उसके बाद भी टकराव की स्थिति जारी रही तो सारी कवायद व्यर्थ हो जाएगी। फिर भी केंद्र सरकार द्वारा गठित पांच सदस्यीय समिति के लिए यह भी एक विचारणीय विकल्प हो सकता है, जिस पर उसकी राय आ सकती है।
