्रदरकते दाम्पत्य की सिसकन
सफल दाम्पत्य जीवन की आधारशिला हैपरस्पर समर्पण। नारी निसंदेह समर्पण और त्याग की प्रतिमा है। यह समर्पण उसकी दुर्बलता नहीं, गरिमा है। इसी के कारण उसे गृहव्यवस्थापिका और परिवार संचालिका की प्रतिष्ठा प्रदान की गयी।
नारी का समर्पण पातिव्रत धर्म, चारित्रिक श्रेष्ठता, प्रेम और सेवा भाव के आदशा] के प्रति होता है, समर्पण व्यक्तित्व की उत्कृष्टता है। नरनारी दोनों जीवनविकास के समान उत्तदायित्व लेकर धरती पर आते हैं, शील और सच्चा चरित्र दोनों के व्यक्तित्व विकास के लिए समान रूप से अनिवार्य है। जो कर्तव्य स्त्री के लिए है, वही पुरुष के लिए भी है। कर्तव्यनिष्ठा की मूल भावना तथा मर्यादाएं सभी के लिए समान है। प्रेम तभी स्थायी रह सकता है जब दोनों का अंतः करण शुद्ध हो। घर में सहिष्णुता पत्नी के लिए जितनी आवश्यक है, पति के लिए उससे भी अधिक आवश्यक है, क्योंकि नारी शारीरिक दृष्टि से उससे दुर्बल होती है और जो अधिक सक्षम है, उसे ही अधिक सहिष्णु होना चाहिए। पत्नी नम्रतापूर्वक बात करे, बाहर से पति के घर आने पर कुशलक्षेम पूछें तो पति को भी घर संबंधी उसकी कठिनाइयां इतनी ही विनम्रता से पूछनी चाहिए।
वैश्वीकरण के चलते भौतिकता व उपभोक्तावाद का काफी विस्तार हुआ है, जिसने मानवीय मूल्यों को काफी प्रभावित किया है। ‘‘मोरलिटी’’ (नैतिकता) इसकी सबसे ज्यादा शिकार हुई है। मनुष्य का आकर्षण स्व पर ज्यादा केन्द्रित हुआ है जिसने अहम को ब़ढावा दिया है। नारी सशक्तिकरण तथा ‘‘वीमन लीब’’ के दौर ने स्त्रियों में खुद्दारी को प्रोत्साहित किया है जिससे पारिवारिक मूल्यों को आघात पहुंचा है। तलाक पाश्चात्य जगत की तर्ज पर आम बात होती जा रही है। पुनर्विवाह भी सामान्य बनता जा रहा है। आधुनिकता के इस दौर में ‘‘सेकेंड मेरीज’’ ऑन लाईन सर्विसेस काफी लोकप्रिय होती जा रही है। वृद्धाश्रम भी इसी शैली की देन है। सामूहिक पारिवारिक व्यवस्था इस नयी जीवन शैली की बलि च़ढ गयी है। एकल परिवार ने नारी स्वच्छंदता को ब़ढावा दिया है जिसके चलते एक्स्ट्रा अफेयर आदि कई बिमारियों ने जगह बना ली है जिसके चलते दाम्पत्य जीवन दरकने लगे हैं। मीडिया ने अपनी विशेष शैली के तहत ‘‘इम्मोरेलीटी’’ को सामान्य बना दिया है जिसके चलते लोगों में इन बिमारियों के प्रति नफरत न होकर गलत करने का झुकाव ब़ढ रहा है। १० वर्ष के बच्चे मांबाप बनने लगे है। ४ वर्ष की बच्चियांं अत्याचार का शिकार होने लगी है। अनाचार व व्यभिचार ब़ढने लगे है।
दाम्पत्य जीवन में प्राचीन शैली‘‘विंध गये सो मोती’’ खत्म होती जा रही है। बदलती जीवन शैली व वैचारिकता के चलते दाम्पत्य जीवन दरकने लगे है जिसकी दरकन मासूम बच्चों को प्रभावित करती है।
विघटन, समाज को दी गई इस युग की एक दर्दनाक भेंट है। विघटन या टूटन अपने आप में दर्द का सैलाब लिए हुए है। यह अनेक रूपों में अपने चारों ओर आज हमें दिखाई देता है, परन्तु यह टूटन जब परिवार में हो तब इसका घनत्व और भी ब़ढ जाता है, क्योंकि इससे वे लोग प्रभावित होनेे लगते हैं जिनका अहित हम सपने में भी नहीं सोच सकते।
जब दाम्पत्य दरकता है तब जो सबसे ज्यादा प्रभावित होता है वह है मासूम बचपन जिसका अपना कोई दोष नहीं होता। इन निर्दोषों का दोष सिर्फ इतना होता है कि ये ऐसे दम्पति की संतति है जो एकदूसरे को निभा नहीं पा रहे आपस में तालमेल नहीं बैठा पा रहे है। घर की कलह, रोज का ल़डाईझग़डा, मासूम बच्चों के अपरिपक्व मन पर विपरीत प्रभाव डालते हैं, जो बहुत गहरा होता है, इतना गहरा कि बच्चों के पूरे वजूद को ही बदल देता है। इन बच्चों को यह उलझा हुआ व्यक्तित्व देने के दोषी हम स्वयं है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
समाज के लिए जीना मानव की फितरत में रहा है। परिवर्तन के इस दौर में इंसान की सोच में परिवर्तन आया और वह अहम् केन्द्रित हो गया। दूसरों के लिए जीने वाला इंसान अपने लिए जीने लगा है। पुरुष जो पूरे परिवार के लिए खुशियां बटोरता था, बीबीबच्चों व परिजनों के चेहरे पर प्रसन्नता देख संतुष्ट होता था आज सिर्फ अपनी इच्छाआें और महत्वकांक्षाआें के पीछे भाग रहा है और नारी, परिवार के लिए मर मिटना जिसकी पहचान थी आज अचानक सिर्फ अपने लिए जीने लगी है। पति और बच्चे, जिनके चेहरे पर छाई खुशियां देख वह आत्म तृप्ति से विभोर हो जाती थी वह पति एवं नारी की अपनी महत्वकांक्षा के आगे गौण होकर रह गए हैं।
विवाह केवल एक रस्म नहीं, यह एक संस्कार है। केवल नर और नारी का मिलन नहीं वरन् एक स्त्रीपुरुष का कर्तव्य पथ पर रखा गया पहला कदम है। विवाह करके स्त्री और पुरुष केवल पतिपत्नी नहीं बनते वरन् रिश्तों की एक सुन्दर माला में कीमती नगीने की तरह विंध जाते हैं। हर रिश्ते के साथ कुछ जिम्मेदारियां ज़ुड जाती है। इन्हें निभाने में ही आनंद है। तलाक और तलाकशुदा दम्पति आज आम बात हो गए है, जो किसी भी समस्या का मात्र हल नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि जीवन नरक बन जाए और तलाक लिया ही न जाए। जैसे शरीर के किसी अंग के स़ड जाने या लाईलाज हो जाने पर ही डॉक्टर उसे काटने की सलाह देते है उसी तरह जब प्यार का यह सुन्दर नाता एकदम ही अझेल हो जाए और समझौते के प्रयास निष्फल हो जाएं तब ही तलाक का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। छोटीछोटी बातों पर तलाक लेकर अपने व अपने प्रियजनों के लिए मुसीबतों के पह़ाड को न्योता नहीं देना चाहिए।
दाम्पत्य जब दरकने लगे हमें चेत जाना चाहिए। दरार प़डने से पहले हमें अपनीअपनी गलतियों का सुधार लेना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि विवाह सबसे ब़डे समझाैेते का नाम है। विवाह द्वारा दो पूरी तरह से भिन्न परिस्थितियों के बीच जन्में, पले, ब़ढे इंसान जीवन भर के लिए, एकदूसरे से ज़ुड जाते हैं। अतः दोनों में मतभेद होना स्वाभाविक है, परन्तु दोनों यदि एकदूसरे को उसकी सम्पूर्ण अच्छाई एवं सम्पूर्ण बुराई के साथ अपना लें तो आधी से ज्यादा समस्या अपने आप हल हो जाती है, साथ ही दम्पतियों को अपने बच्चों के सुखी भविष्य के लिए यह याद रखना होगा कि पतिपत्नी के बीच अहम का कोई स्थान नहीं होता।
