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बिग़डते ही क्यों हैं बच्चे

Swatantra Vaartha  Thu, 27 May 2010, IST

बिग़डते ही क्यों हैं बच्चे

एक बार दो कुत्ते आपस में बात कर रहे थे। पहले कुत्ते ने कहा कि मुझे ऐसा लगता है कि हमारे मालिक हमारे लिए भगवान के बराबर हैं। दूसरे कुत्ते ने तपाक से कहा कि क्या कह रहा है तू? पहले वाले कुत्ते ने उसे समझाना शुरू किया कि हमारे मालिक सुबहशाम हमें अच्छा खाना देने के साथसाथ हर समय हमारी सेवा और देखभाल करते हैं। जब कभी हम बीमार हो जाते हैं, तो हमें डॉक्टर के पास इलाज के लिए लेकर जाते हैं,तो यह सब क्या कम है? दूसरे कुत्ते ने कहाबेवकूफ हमारे मालिक तो यह सब कुछ इसलिए करते हैं, क्योंकि हम भगवान हैं।

हम सबका हर चीज को परखने का नजरिया अलगअलग हो सकता है। बच्चे बिग़डते ही क्यों है, इस बारे में कई अलगअलग मत हो सकते हैं, परन्तु हम सभी इस बात को नहीं झुटला सकते कि बगीचे में यदि कोई एक पौधा खराब हो जाता है, तो अच्छे फूलों की वाहवाही लूटने वाले माली को उस खराब पौधे की जिम्मेदारी भी लेनी प़डती है।

जीवन में सच्चाई और संतोष को भूलकर आज की मॉडर्न प़ीढी तेजी से बदल रहे समाज और दिलोदिमाग पर फिल्मों की छाप से प्रभावित होकर मौजमस्ती और दिखावे की जिंदगी को अधिक पसंद करने लगी है। वो यह भूल जाती है कि फिल्मों में सब कुछ दिखने वाला माहौल तो केवल एक कल्पना मात्र है, यह सब कुछ असल जिंदगी में पाना मुमकिन नहीं हो सकता। दोस्तों में सदा अपनी नाक ऊंची रखने की इच्छा, सीमित स्रोतों एवं आर्थिक मंदी के चलते हीरोहीरोइन के शाही स्टाइल को अपने जी वन में अपनाने की लालसा उन्हें शरीफ लोगों के साथ ठगी और हेराफेरी करने पर मजबूर कर देती है।

जिस प्रकार आजकल खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक अपराधी को भी हीरो की तरह पेश करता है, उससे प्रभावित होकर चमचमाती कारें और हवा से बातें करती मोटरसाइकिल पाने के लिए आज के युवा लूट, हत्या और शातिर अपराधियों की तरहसनसनीखेज वारदातों तक को अंजाम दे डालते हैं। आम आदमी बनकर जीना उन्हें एक गाली लगता है। अधिकांशः युवा आज अपने शाही खर्च को पूरा करने के लिए ही क्रिमिनल बन रहे हैं। तन और मन की खुशी पाने के लिए एक समय के बाद आज के बच्चे किसी को कुछ देने की बजाय दूसरों से उनका हक छीनने में अधिक विश्वास रखने लगते हैं। इस तरह के दुष्प्रभावों के कारण ही नई प़ीढी बिना मेहनत किए ही जीवन का हर सुख पाना चाहती है।

हम लोग अक्सर अपनी भावनाआें का खुलकर इजहार करने के बजाय अपने प्यार की नुमाईश बच्चों की उनके जिद करते ही उन्हें महंगे खिलौनेे, कप़डे आदि दिलवाकर करते हैं जबकि बच्चों को यह बताना भी जरूरी है कि कोई कितना भी धनवान क्यों न हो, बच्चों की हर मांग पूरी नहीं की जा सकती। यह जानते हुए भी कि अन्याय में सहयोग देना अन्याय के बराबर है, हम बच्चों को खुश करने और समाज में अपने रुतबे को बनाए रखने के लिए उनकी हर जायज और नाजायज मांग को पूरा करने के लिए बैंक से उनकी मनचाही शता] पर कर्ज उठा लेते हैं। फिर जब समय पर कर्ज की अदायगी नहीं हो पाती हो, तो सारे परिवार के लिए परेशानियां ब़ढने लगती हैं। कुछ लोग, जो इस प्रकार के झटके बर्दाश्त नहीं कर पाते, वो खुदकशी तक करने की सोचने लगते हैं। अतः जरूरत इस बात की है कि हम बचपन से ही बच्चों के कोमल हृदय में अच्छे संस्कारों के साथ यह बात बिठाने की भी कोशिश करें कि संतोष ब़डी से ब़डी दौलत से भी अच्छा होता है। बच्चों को यदि हम यह समझा पाएं कि कामयाबी का कभी कोई शॉटकर्ट नहीं होता तो आने वाले समझदार बच्चे कभी भी किसी गलत राह पर नहीं चलेंगे।

बच्चों के लिए यह जानना भी जरूरी है कि अच्छी और बुरी संगत का जीवन पर बहुत ब़डा प्रभाव प़डता है। इसलिए सदा बुरे लोगों से दूर रहते हुए अच्छे लोगों की संगत करना बेहतर रहता है। सच्चा इंसान वही है, जो बुराई का बदला भलाई से दे और खुद को सदा गुनाह करने से बचाए।

बच्चे को यदि यह मालूम हो जाए कि दूसरे का भला करते वक्त उसका अपना भी भला हो रहा है, तो वो जीवन में आने वाली हर खुशी को अपने तक सीमित न रखकर दूसरों में भी अवश्य बांटेंगे। सब कुछ जानते हुए भी हम बच्चों की हर गलती को नजरअंदाज करने के लिए कई बार अपनी आंखें मूंद लेते हैं। बच्चों के प्रति अनजान और लापरवाह होने के बजाय हमें जीवन में उच्च आदर्श स्थापित करते हुए रोजाना कुछ वक्त परिवार के साथ जरूर गुजारना चाहिए, जिससे बच्चों को प्यारदुलार के साथ अच्छे संस्कार और बेहतर तरीके से जिंदगी जीने की कला सीखने में मदद मिलेगी। यदि बच्चों को अपने प्यार के रंग में रंगते हुए हम उनके हर अच्छे काम की तारीफ करें और समयसमय पर उनका हौंसला ब़ढाते रहें तो कोई भी बच्चा कभी बिग़ड ही नहीं सकता।

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