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बेटी की कमाई पाप नहीं

Swatantra Vaartha  Thu, 27 May 2010, IST

बेटी की कमाई पाप नहीं

पुरानी सभी मान्यताएं धीरेधीरे टूटती जा रही हैं। इन्हीं मान्यताआें में से एक है कि बेटी की कमाई मातापिता के लिए हराम है जबकि बेटे की कमाई वे अधिकार से ले सकते हैं। आज बेटियां भी प़ढ लिख कर काबिल बन रही हैं। माता पिता उनकी परवरिश भी बेटों की तरह ही करते हैं। कई बार गरीबी के कारण उन्हें बेटियों की परवरिश और प़ढाई के लिए न जाने कितने त्याग करने प़डते हैं । ऐसे में ब़डे होकर अगर वे मां बाप के लिए कुछ करना चाहती हैं तो यह उनका फर्ज है। उन्हें उनका फर्ज निभाने दें। उनसे कुछ लेना गलत कैसे माना जा सकता है बल्कि उन्हें कुछ न करने देना गलत होगा।

उदिता अभी छोटी ही है। अपने मातापिता की लाडली है। वो उनकी ब़ुढापे की संतान है। प़ढने में तेज उदिता ने इस बार बारहवीं की परीक्षा दी है। उसने मन में ठान रखा है ब़डी होकर डॉक्टर बनूंगी और अपने मातापिता सेवा में जीवन गुजार दूंगी। उन्हें मैं ब़ुढापे में अकेला नहीं छ़ोडूंगी। उसके इस जज्बे को गलत कैसे ठहराया जा सकता है। बेटियों को आज इसलिए भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है ताकि दहेज की समस्या न आये। यह बात अलग है कि दिनोंदिन ब़ढते लालच के कारण कमाऊ ल़डकियों से भी भारी दहेज की मांग की जाती है।

मायरा भसीन की ससुराल वाले अमीर हैं। वो स्वयं एक बेहद निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से है जहां उसके अलावा एक भाई और था जो छोटी उम्र में ही दुबई जाकर एकदम पराया हो गया। मायरा ने एम बीए किया हुआ था सो उसे एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई थी। बावजूद इसके पति के कठोर अनुशासन और ससुराल वाले के डर से वो मायके नहीं जाती थी।

उसके मातापिता ब़ुढापे में बीमारी और देखरेख तथा आर्थिक तंगी के कारण बेहद लाचारी में जी रहे थे। मां की कैंसर में और पिता की अल्जीमर में बेहद दर्दनाक मौत हो गई। बाद में मायरा हर समय पछताते हुए रोती रहती काश मैं इतनी कमजोर साबित न होती, हिम्मत करके मां बाप के पास जाकर या उन्हें अपने पास रखकर उनकी देखभाल कर पाती। मातापिता कई बार अपने आत्म सम्मान की रक्षा करते हुए बेटी से आर्थिक मदद लेने से कतराते हैं लेकिन यह सरासर उनकी भूल है । उनका भी बेटी की कमाई पर पूरा हक है। ऐसा करना अधर्म नहीं है। बेटी के घर का पानी तक न पीना जैसे रिवाज कारण विशेष से बने थे लेकिन समय के साथ सभी को बदलते हुए तालमेल बिठा लेना चाहिए। जो बेटी मां बाप के जरूरत के समय उनके काम न आ सके, वो अपनी ही नजरों में गिर जाएगी। नैतिक पतन उसे कभी सर उठाकर चलने लायक नहीं रहने देगा। बेटियों का पैसा कब इस्तेमाल करें, कब नहीं, यह भिन्न भिन्न स्थितियों पर निर्भर करता है। अगर ससुराल वाले गरीब हैं, उन पर बहुत सी जिम्मेदारियाँ हैं और ल़डकी के पीहर वाले आर्थिक रूप से सक्षम हैं तो जाहिर है ल़डकी का फर्ज पहले अपने ससुराल के दायित्वों को निभाना और उनकी हर तरह से मदद करना है। ल़डकी के स्वयं के ऊपर बहुत कुछ निर्भर होता है। अपने को शोषित वो किसी हाल में न होने दे। जरूरत और लालच में भेद कर सके, यह जरूरी है।

कोई विरले ही मां बाप होते हैं जो बेटी का शोषण करने जैसी घटिया मानसिकता रखते हों वर्ना सभी मातापिता उसकी खुशहाली चाहते हैं। ल़डकियां जरूरतमंद मातापिता की आर्थिक सहायता करें भी तो ऐसे करें ताकि उनकी खुद्‌दारी को ठेस नहीं पहुंचे। कोई एहसान न समझकर अपना फर्ज समझकर करें। यह कभी न भूलें कि उन्होंने उसके लिए क्या किया है।

अंत में जो अहम बात है वो है आपसी लगाव और प्यार। सारी बातें एक तरफ और यह जज्बा एक तरफ। जब आपसी प्यार होगा तो गलत कुछ नहीं होगा। सच्चा प्यार हमेशा सही राह दिखाता है। सुसंस्कार जीने का सही ढंग सिखाते हैं।

आत्मसम्मान रखना बहुत अच्छी बात है लेकिन साथ ही ल़डकी के बाद मां बाप में अब इतनी जागरूकता भी आ जानी चाहिए कि किसी भी मान्यता या रिवाज को वर्तमान की कसौटी पर तौलकर आगे ब़ढे। जरूरत होने पर बेटी की कमाई से परहेज न करें। अपनी ही जायी संतान को पराया न मानें। कोई भी अच्छी बेटी ऐसा परायापन नहीं चाहेगी।

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