मुस्लिम आरक्षण असंवैधानिक
हैदराबाद। धर्म आधारित आरक्षण को अवैध करार देते हुए प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य में मुस्लिम समुदाय के १५ समूहों को शैक्षणिक संस्थानों एवं नौकरियों में चार फीसदी आरक्षण देने संबंधी कानून को आज रद्द कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश अनिल रमेश दवे की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय पीठ ने अधिवक्ता के कोंडल राव की याचिका पर यह फैसला सुनाते हुए इस आरक्षण को संविधान के विरुद्घ करार दिया। पीठ ने कहा कि शिक्षा व सामाजिक रूप से पिछ़डों की पहचान के लिए पिछ़डा वर्ग आयोग द्वारा किये गये सर्वेक्षण, एकत्रित आंक़डों के विवरण तथा इस संबंध में की गयी सिफारिशें त्रुटिपूर्ण हैं और उच्चतम न्यायालय के दिशानिर्देशों के अनुसार नहीं हैं। मुख्य न्यायाधीश अनिल रमेश दवे, न्यायाधीश एगोपाल रेड्डी, वी ईश्वरय्या, ग़ोडा रघुराम तथा न्यायाधीश मीना कुमारी ने आरक्षण के खिलाफ फैसला सुनाया, जबकि न्यायाधीश बीप्रकाश राव तथा डी एस आर वर्मा ने आरक्षण पर व्यापक विचारविमर्श का समर्थन किया।
अदालत के फैसले के तुरंत बाद मुख्यमंत्री केरोशय्या ने राज्य के महाधिवक्ता डीएसआरमूर्ति को इसके खिलाफ उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने का निर्देश दिया। उन्होंने एक बयान में कहा कि प्रदेश सरकार राज्य के पिछ़डे मुस्लिम समुदाय को चार फीसदी आरक्षण देने को प्रतिबद्ध है। अदालत ने अपने आदेश में राज्य के कानून और २००७ में सरकार के आदेश को खारिज कर दिया, जिसने शैक्षणिक संस्थानों और नौकरियों में मुस्लिम समूहों को चार फीसदी आरक्षण दिया था। हालांकि अदालत ने मुस्लिम अल्पसंख्यक आधार पर वर्ष २००७ से किये गये प्रवेशों को वैध ठहराया।
इससे पूर्व, सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ, जिसके प्रमुख मुख्य न्यायाधीश अनिल रमेश दवे थे, ने अधिवक्ता केकोंडल राव द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की। उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए मुस्लिम आरक्षण देने संबंधी कानून को रद्द कर दिया कि प्रजातंत्र में धर्म आधारित आरक्षण वैध नहीं है। पीठ ने कहा कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण तथ्यों के अनुसार नहीं है और सरकार ने केवल कृष्णन आयोग की रिपोर्ट पर ही भरोसा किया है, जो उचित नहीं है। पीठ ने कहा कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए कोटा स्थायी नहीं है और इसे आगे और अधिक समय तक लागू नहीं किया जा सकता। इसके अलावा मुस्लिम अल्पसंख्यकों की आर्थिक स्थिति के बारे में सर्वेक्षण केवल छह जिलों में किया गया था।
गौरतलब है कि यह तीसरा मौका है, जब उच्च न्यायालय ने मुस्लिम आरक्षण को अवैध ठहराया है। उच्च न्यायालय का यह फैसला रोशय्या सरकार के लिए तुषारापात से कम नहीं है। पहले ही रोशय्या सरकार प्रदेश के विभाजन को लेकर प्रदर्शनों का दंश झेल रही है।
