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आम पहचान आर आधुिनकीकरण

Swatantra Vaartha  Thu, 14 Jan 2010, IST

आम पहचान आर आधुिनकीकरण

उीसवीं शती के उाराթ एव बीसवीं शती के ारभिक दशकों को बहधा भारतीय नव जागरण का युग माना जाता ह। जिसे नव जागरण कहा जाता ह,उसमें रावादिता, सामाजिक उयन एव साकतिक नवोथान का समवित वप देखा जा सकता ह। भारत में अगेजी शासन, शिक्षादीक्षा का पचिमीकरण एव नयी आथिक नीति के फलवप सामाजिक ढाचे में पया परिवतन हआ। विदेश से आ पहचे एक यापारी सघ के हाथ में भारत देश का सपूण अधिकार जा पहचा, यह बात भारतीय जनता को झकझोर करने वाली थी। फलत देश की राजनतिक वतता के लिए यास हआ, जो सन १८५७ के वतता सगाम में परिणत हआ। अगेज सरकार ने बडी नुिरतापूवक उसे कुचल डाला। भारत देश पर अपने अधिकार थापित करने तथा धमातरण के लिए कटिब दुर्मोही अगेज सामायवाद ने भारत को राजनतिक पराधीनता के साथसाथ साकतिक पराधीनता में भी डाल दिया। भारतीय सकति एव भारतीय भाषाआें को तहसनहस करने में उसने कुछ उठा नहीं रखा तो भारतीयानुरागी एव राीय भावना से उदबु जनता ने वतता की महिमा समझी।


सन १८८५ में थापित भारतीय राीय कागेस ने भारतीय मु यज्ञ का पतवार अपने हाथ में थाम लिया तो आगे चलकर महामा गाधी ने अगेज सामायवाद से जूझते भारतीय वततासेनानियों का नेतव वय उठा लिया आर मु यज्ञ को अतिम सफल परिणति तक पहचा िदया।

देश का आधुनिकीकरण नवजागरण का लय था। पुरानी सामाजिक ढि रीतियों का उाटन करके समता एव सदभावना पर अधिति एक नय समाज का गठन तथा विगत सकति की पुन ताि उसका येय था। इस येय से भावित ब समाज (१८२८), ाथनासमाज (१८६७), आय समाज (१८६७), थियोसफिकल सोसइटी (१८७५) आदि सुधारवादी तथा साकतिक सथाआें, श्रीराम कण, विवेकानद, रामतीथ, अरविंद जसे चितकों विचारकों ने जाति वण विहीन मानवसमाज की थापना एव मानवतावाद की तिठा का सदेश चारित किया।

सुधारवादी सथाआें एव साकतिक नेताआें के वनों को राजनतिक धरातल पर तिति करने का काय बालगगाधर तिलक तथा महामा गाधी ने किया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगेजी शिक्षा ने हमारे दकाेिण में परिवतन ला दिया, ज्ञानविज्ञान की ओर हमारे वातायन खोल दिये। उीसवीं शती के उाराթ तक आतेआते केंबिज, आसफाड, एडिनबरो जसे विववियात विववािलयों में शिक्षा पाने वाले भारतीय वािथियों की सया बढ गयी। उहीं के ारा भारतीय एव पाचाय सकतियों का परपर मिलन इस काल की एक मुख घटना रही। अगेजी ज्ञान ने हमारे साहियकारों में नवोमेष भर दिया। लेख, कहानी, उपयास, आलोचना आदि नयी साहियिक विधाआें ने भारतीय भाषाआें का कलेवर ही बदल डाला। हमारे ाचीन काया दशा], साितों का पुनरीक्षण करने तथा नयी सरणी खोजने की उकठा उनमें जाग उठी। एक ओर भारतीय नाटयशली के थान पर पाचाय नाटय शलियों का विकास हआ। यह धारण बलवती हइ कि साहिय मा प नहीं, ग का अपना वशिय ह। भारतीयपाचाय सकतियों विचारधाराआें के सामजय पर खडे रवीदनाथ ठाकुर, अरविंद, सरोजनी नायुडु, हरीनाथ चटोपायाय, बकिम च चटर्जी, सुबाणय भारती जसे साहियकार नवजागरण युग के अगदूत थे। इन सबकी यह मायता रही कि भारत को एक गरिमामयी सकति ा ह, जो अब मद पड गयी ह, तो उसे नवीन परिवेश पहनाना ह। जब कभी धमयुति होती ह, तब भगवान परािणाथ अवतार लेते ह, यह गीतावाय भारतीय नवजागरण का मूल म बना। यही कारण ह, पडित नेह को छोड लगभग सभी रा नायकों ने गीता की नयीनयी यायाए तुत की ह। तिलक ने माडले जेल में रहते हए अपनी वियात रचना ‘गीता रहय’ लिखी। महामा गाधी, महषि अरविंद, राजगोपालाचारी, डा राधाकणन भति नेताआें ारा तुत गीता की यायाए यहा मरणीय ह। गाधीवादी युग में साहिय जीवन सापेक्ष हआ। यह वाभाविक भी था। भाषा एव साहिय पर नवजागरण का भाव परिलक्षित हआ। ग तथा प में आम जनता की कठोर यातनाआें, सामाजिक वषय, वततासगाम, वाधीनता का मूय, साहस एव वीरता, सवाम याग, गाधीजी के सदेश आदि को वाणी मिली। गाधीजी साहियकारों के आराय बने आर उन पर श्रा सुमन अपित किये गये।

का अवलब लेकर बाणों ने केरल तथा उसके बाहर अपना आधिपय बनाये रखने का सब कार से यास किया आर इस यास में इहोंने अपनी मनपसद यायाआें ारा श्रुति, मति, पुराण, इतिहास को अपने अनुकूल बनाया। चातुवणय पर अधिति सामाजिक यवथा थी। जनता जातियों, उपजातियों में बटी हइ थी। वािययन से वचित तथा राजमाग से आनेजाने तक के अधिकार से वचित निन जाति की यातनाए अकपित थी। वह छुआछूत के सामाजिक अनाचार एव अयाचार का शिकार बनकर अपनी अतिम सास ले रही थी। केरल के बाणों ने चातुवणय एव सवण आधिपय के दुग के प में नायर जाति के लोगों का उपयोग किया था। इस आधिपय एव यवथा में परिवतन हए बिना सामाय जनता के सभी वण एक साथ नहीं आ सकेंगे, इस बात से अवगत चटटपि वामी (१८५३१९२४) तथा श्री नारायण गु (१८५४१९२६) ने केरलीय पीडित जनता के उथान को में रखकर रग पवेश किया तथा सामाजिक कुरीतियों तथा अनाचारों के वि जनता को सगठित करने का यास किया। चटटपि का ऋषिकप जीवन था। उहोंने घरघर जाकर मानवएकता का सदेश दिया तथा जाति पथा के उमूलन के काया] में यान देेते हए निन जाति की जनता के साथ सहभोज तक किया। अपने आदशा] के यापक चाराथ वामीजी ने कलम का सहारा लिया। वग भेद एव जाति भेद का उाटन करके समवय एव समरसता पर आधारित वगहीन मानव समाज के पुनगठन के लिए यनशील श्री नारायण गु ने यह घोषित किया कि मनुय की एक ही जाति होती ह। चटटपि वामी के समान श्री नारायण गु ने भी कइ गथ लिखकर अपनी मायताआें को वाणी दी। श्री नारायण गु एव चटटपि वामी का मूयाकन करते हए पुाेषाु रामन मेनोज ने लिखा ह ‘इषवा जाति को एक सगठन में लाने वाले तथा उसमें आम चतय भरने वाले श्री नारायण गु में साक्षात परशुराम की योति थी, तो महाज्ञानी एव आम योति से आलावित चटटपि वामी में महान योगी शकराचाय का फुरण था।’

उन दिनों केरल में शारीरिक एव मानसिक जो शिक्षा पतियों चलित थी, वे आयोधन वाली कलरियों तथा अक्षरायास कराने वाली आशान पाठशालाआें तक सीमित थी। सकत शिक्षा बाणों की बपाती मानी जाती थी। मलयालम भाषाययन को हेय से देखा जाता था। अत मलयालम भाषाशिक्षण के लिए समुचित सुविधाए नहीं थी तथा पाठय पुतकों का अभाव था। मा अक्षरज्ञान बढाने वाली शिक्षा पति थी। इसमें सुधार के लक्षण तब देखने में आये जब तिविताकूर के दीवान सर टी माधव राय (१८५८१९७२) बने। यह शिक्षा के क्षे में नवोथान का समय था। दीवान ने मलयालम तथा अगेजी पाठशालाए थापित की। समुचित पुतक निमाण के लिए पुतक समिति का गठन किया। जातिधम रहित शिक्षा पति के चार में आते ही हमारे साकतिक नवोथान की नींव पडी। सामाजिक राजनतिक वाधीनता तथा समता को ा करने की बेचनी के फलवप यु बोध का जमाना आ गया। मलयालम भाषा एव साहिय ने साकतिक नवजागरण में अपना विशि योगदान दिया। मलयालम भाषा के चारसार के साथ उसके क्षेीय पों में समानता लाने की भी जरत थी। यहा तक कि क्षेीय पों में वतनी तक की एकपता का अभाव था। इस कमी से अवगत तिविताकूर सरकार ने शिक्षा को अपने हाथ में ले लिया (१९०५)। पाठय पुतक समिति को केरल वमा वलिय कोइापुरान का नेतव मिला, जो एक महवपूण घटना अवय थी। पर कोइापुरान सकत ेमी थे, उहोंने पाठय, पुतकों में सकतशदों को ाबय दान किया, जिसके कारण साधारण जनता की यावहारिक भाषा मद पड गयी। दोनों भाषापों में समवय लाने का यास केरल की पपकािआें ने किया। इन पकािआें ने मलयालम भाषा एव साहिय के नवोथान, उति एव विकास तथा भाषा का प निधारित करने में अमूय योगदान किया। क्षे भेद पर आधारित भाषा पों की समया के निराकरण में इनका यान गया। १८७९ में वेङयिल कुजिरामन नायनार के सपादकव में केरल चकाि का काशन हआ तो उससे भी पहले सन १८६७ में कडाल वर्गीस माघिला ने कोची से ‘केरल मिम’ निकाला था। चेंकुलाु वलिय कुजुरामन नायर ने १८८४ में मलबार से ‘केरल पकाि’ काशित की। वेडयिल कुजुरामन नायर ारा सपादित ‘केरल सचारी’ (१८८६), तिमधुरपेटा इ रामन पि की ‘मलयाली’ (१८८६तिवनतपुरम से) का भी इस क्षे में उेखनीय योगदान रहा। पर कडाल वर्गीस माघिला की मलयालम पकारिता को देन अभूतपूव रही। उहोंने ‘मलयाल मनोरमा’ (१८९०) तथा ‘भाषा पोषिणी’ (१८९२) पकािआें का सफल सपादन किया। मलयालम भाषा एव साहिय की उति एव विकास को में रखकर इन पकािआें ने ारभ से भाषाप का निधारण किया; लेख, कहानी, उपयास (धारावाहिक) एव समीक्षा जसी साहियिक विधाआें को श्रय दिया तो दूसरी ओर भारतीय नवोथान तथा वतताआदोलन के समाचार घरघर में पहचाने में भी सदा सकिय रहीं। तशूर से सी अयुत मेनोन ारा काशित ‘वाि विनोदिनी’ (१८८९) तथा वदेशाभिमानी के रामकण पि ारा सपादित ‘केरल दपणम’ (१८९९, तिवनतपुरम से) भी मलयालम पकारिता के इतिहास में मील के पथर थापित हए। रामकण पि निभय होकर सरकार की नीतियों की कडी आलोचना करते रहे तो वे देश से निकासित भी हए। इन पकािआें ने मलयालम भाषा एव साहिय की जो सेवा की, उसकी शसा किये बिना नहीं रहा जाता। भाषा एव साहिय के नवोथान, भाषा के प निधारण आदि में अमूय योगदान किया तो जनत की पुकार जनता तक पहचा भी दी।

उीसवीं शती का उाराթ भाषा एव साहिय में पतियों के निधारण एव नियोजन का समय रहा। भाषा सुधार को में रखकर भाषा पोषिणी सभा की थापना की गयी। याकरण से अनुशासित भाषा को महव देते हए पाठयकम में ‘केरल पाणिनीय’ एव ‘शद शोधिनी’ को समिलित किया गया। पपकािआें के मायम से विकसित साहिय शाखा ह समीक्षा जिसकी गति में ‘मलयाल मनोरमा’ तथा ‘भाषा पोषिणी’ आत पयासरत रहीं। मलयालम में तीियाक्षर ासवाद का आरभ भी पपकािआें के मायम से हआ। मुणालयों की थापना एव चार के फलवप ाचीन गथों एव पाडुलिपियों के काशन में तगति आयी। इस नवोथान ने कइ साहियकारों को जम दिया। गुडट, बयिली, जाज मााज, केरल वमा, सीपी अयुत मेनोन, एआर राज राज वमा, आइचतुमेनोन, अपु नेटुङडाटी, सीवी रामन पि, वेङङ यिल कुजिरामन नायर, मूर्कोतु कुमारन सीअतपाइ, अपन तपुरान आदि लेखक इसी काल सीमा की सतान ह। इहें ेरणा देने वाले सी फेंच, अगेजी जसी भाषाआें के लेखक रहे।

वतताआदोलन भारतीय इतिहासकारों ने सन १८५७ के सघष को थम वतताआदोलन माना ह, जबकि वतुथिति उससे कोसों दूर ह। भारत के सुदूर दक्षिणी छोर पर बसे इसी केरल देश में ‘केरल सिंहम’ के अपर नाम से यात पषशि राजा केरल वमा हए जिहोंने १७९३ से १८०५ तक विशाल अगेज सेना का सामना करते हए अत में देश के लिए अपना ाणोसग किया था। वसे ही तिविताकूर के महाराजा बालराम वमा (१७९८१८१०) केे दीवान देशेमी वेलुापी ने अगेजों के वेछा चार के वि सश सघष की रगभूमि तयार की आर शु सेना का धीरतापूवक सामना करते हए अपनी आमाहति दो। यदि इन दो वीर नायकों के सघष को उार भारत में सप वतता सगाम का पूवाभास मान लिया जाए तो सहया के दक्षिण मे बसे इस भूभाग में उार भारत को विकपित करने वाली राीय चेतना की लहर जरा विलब से पहच पायी थी। इसलिए कि यहा की ब जनता उन दिनों सामाजिक साकतिक नवोथान में अधिक तपर थी। राजनतिक से यहा वततासगाम की दिशा में पहला काम श्रीमती एनी बेसेट के होम ल लीग की शाखा का सन १९१६ में उदघाटन था। उसके पचात १९२०२१ में भारतीय वतता सगाम तथा खिलाफत आदोलन के सिलसिले में गाधीजी की केरल याा ने यहा के वतता ेमियों तथा सुधारवादी नेताआें में राजनतिक चेतना जगाने का काय किया आर कालातर के गाधीजी के सभी काया] में केरलीय जनता की भागीदारी रही।

नवोथान या नवजागरण का मलयालम साहिय पर भाव यह नवजागरण उार भारत को सभी वरों पर जगाने वाला आदोलन या जिसे वाणी देने का काम हिंदी के साहियकारों ने किया था, तो मलयालम के साहियकारों ने भी अपना दायिव निभाने में बडी उसुकता दशायी। वतता सगाम ने भारतीय कवियों को राीय कविताए लिखकर जनता के दय में देशेम की भावना उदबु करने की ेरणा दी। देशेम, देश के लिए सवव याग, देश की कति सुषमा पर अनुराग, ऐतिहासिक एव साकतिक वभव पर गव, सुधारवादी काेिण आदि राीयता के अग ह। मलयालम में अनेक मूधय कवि हए जिहोंने मातभूमि की मु के लिए कतसकप हो ेरणादायिनी कविताआें ारा वतता की शख वनि मुखरित की। ऐसे कवियों में कुमारन आशान वलााेलू नारायण मेनोन, उलूर एस परमेवर अयर, इडपलि राघवन पि, चगुपुषा कण पि, जी शकर कुप, वलोघिलि श्रीधर मेनोन वेणुिलम गोपाल कुप, पी भाकरन आदि का योगदान अविमरणीय ह इन कवियों ने जाति भेद एव अधम पर आधारित सामाजिक कुरीतियों का विरोध करते हए मानवएकता पर बल दिया।

अपने विचारों में कातिकारी एव जनवादी कवि कुमारन आशान ने ढिगत जाति था का घोर विरोध किया। उनके काय दुरवथा, चडाल भिक्षुकि, कणा, माणिमाला तथा वनमाला में जातिगत एव सादायिक परतता से वदेश को मु करने में यग कवि की ाी की झकार सुनायी देती ह। उहोंने वतता की उवल कपना करते हए लिखा ह

वे मुरुिक काल चङङल विभो!

पोेरिकयी कविलङङुम

गङङलेपाेुल, कूरिनि को

येङडु चवि नाुिवानुम

तङङलिल ककाेाु मोक्ष सुखाधियिल

मुङि ुलुि पुलटकु वानु ।

(वातय गाथा)

अथात हे पभु हमारी हाथ बेडी काट दे तथा हथकडी तोड दे। गहरे अधकार का दुग तोडने हेतु हमे ऊपर उठा दे। परपर हाथ मिलाकर मोक्ष पी सुख सागर में आलावित हो पुलकित हो उठें। जातिथा, वेयावा जसे सामाजिक अनाचारों का पदाफाश करके वे जातिधम रहित अखड राीयता की कपना करते ह। वे आष सकति से अनुाणित ह आर विगत सकति को पुन देखने को उसुक ह। गाधी, खादी, चरखा आदि पर केति उनकी कविताए ह। वे अपने आराय गाधीजी में गाधिसुत की तपचया, मिथिलेश का कम योग, देववत का धमावह शाय, विदुर की हितो, बुदेव का अहिंसा साित, शकर की कमनिठा, रतिदेव की कणा दया भावना, इसा का याग आर भगवान कण का ज्ञानोपदेश सब की समवित योति का दशन करते ह आर बडी ыढता के वर में घोषित करते ह कि गगा की पावन जलधारा से अभिषि तथा गीतामाता की जननी भारत भूमि में ही ऐसे मगलमय कपम का अवतार सभव ह

गगयारोषुकुच नाटिले शरि

मगल कारकु कप पादप मुटाय व।

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