उत्तराखंड की स्थायी राजधानी का मसला अभी हल नहीं हुआ है, लेकिन जिस तरह अस्थायी राजधानी देहरादून में एक के बाद एक बड़े निर्माण कार्यो को हरी झंडी दी जा रही है, उसके संकेत साफ है। नीति-निर्धारकों ने कहीं न कहीं यह मान लिया है कि भविष्य में देहरादून ही राज्य की स्थायी राजधानी के रूप में तब्दील होगी। इसके चलते ही अस्थायी राजधानी के लिए जो मानक बनाए गए थे, उनको ताक पर रखकर इस तरह के निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं, जो स्थायी राजधानी में ही होने चाहिए। केवल विधानसभा भवन का मसला छोड़ दें तो अधिकतर अहम मामलों में सरकार तेजी से कदम बढ़ा रही है। दीक्षित आयोग की रिपोर्ट में हालांकि देहरादून की फिजिबिलिटी स्थायी राजधानी के अनुकूल बताई गई है लेकिन इस पर फिलहाल फैसला लंबित है। केवल रिपोर्ट को ही सार्वजनिक किया गया है। इस रिपोर्ट को कितना स्वीकार किया जाएगा, यह भविष्य के गर्त में है। यदि इस रिपोर्ट को आधार मान भी लिया जाए तो वर्तमान में राजधानी को सबसे बड़ी जरूरत नये विधानसभा भवन की है। जब नया सचिवालय, सीएम आवास, गवर्नर आवस, गेस्ट हाउस व सचिव आवास समेत अनेक कार्य हो रहे हों तो ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जरूरत के बावजूद नये विधानसभा भवन के प्रति किस आधार पर बेरुखी दिखाई जा रही है। इस आधार पर विधानसभा अध्यक्ष ने सरकार को जो पत्र भेजा है, उसे ठीक ही कहा जाएगा। वर्तमान में जो विधानसभा भवन है, उसमें विस्तार की कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसे में अनेक महत्वपूर्ण योजनाएं भी अधर में लटकी हैं। विधानसभा भवन में मंत्रियों के कार्यालय हैं, जबकि उनके सचिव पांच किलोमीटर दूर स्थित सचिवालय में बैठ रहे हैं। इससे मंत्रालयों को काम करने में व्यवहारिक कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। कई बार तो मंत्रियों के स्तर पर बुलाई गई बैठकों में अधिकारी भी नहीं पहुंचते हैं। ऐसा अस्थायी राजधानी के मानक के चलते हो रहा है और नये विधानसभा भवन के मामले में भी यही पेच है। जाहिर है कि सरकार को इस मामले में संतोषजनक पहल करनी चाहिए, ताकि राज्य की एक बड़ी जरूरत को पूरा किया जा सके।
