संधिवात से छुटकारा कैसे पाएं?
प्रमेरी उम्र ४८ वर्ष है। पिछले ८१० दिनों से छाती में भारीपन रहता है। कभीकभी हल्का दर्द भी रहता है। थ़ोडी सी मेहनत करने या थ़ोडी दूर चलने पर सांस फूलने लगती है। कृपया आयुर्वेदिक उपचार बताएं?
मोहनकृष्ण, हैदराबाद
उ छाती में भारीपन होने के लक्षणों को आसानी से न लें। वक्ष प्रदेश में हृदय और फुफ्फुस (फेफ़डे) होते हैं। भारीपन के साथ दर्द हृदय रोग के लक्षण भी हो सकते हैं। भारीपन के साथ थ़ोडा सा श्रम करने पर श्वास च़ढना, खून की कमी के कारण भी हो सकता है। पेट में आध्यमान (गैसेस) की स्थिति में भी महाप्राचीरा पेशी डायाफ्राम पर दबाव प़डने से छाती में दर्द व भारीपन हो सकता है। इसलिए इलाज शुरू करने से पहले आप अपने वैद्य/डॉक्टर से पहले सही निदान कराएं फिर इलाज करवाएं।
बचाव सर्वोत्तम इलाज है। इसलिए आप तब तक नागार्जुनाभ्र रस टिकियां व कार्डविन का प्रयोग कर सकते है। भोजन के बाद अर्जुनारिष्ट स्पेशल का प्रयोग किया जाना चाहिए। रक्ताल्पता की स्थिति में इनके संग ताप्यादि लौह नं १ टिकियां ज़ोडने से आयासजन्य श्वास में बहुत लाभ होगा।
प्र मेरी उम्र ५२ वर्ष है। उठनेबैठने, चलनेफिरने में घुटनों में बहुत दर्द रहता है। पिछले कुछ दिनों से उसमें सूजन भी आ गई है। कृपाकर इसका आयुर्वेदिक उपचार बतलाएं।
दिनेश शर्मा, विजयव़ाडा
उ आपके लक्षणों की समग्रता बताती है कि आपको ‘संधिवात’ रोग हो गया है। पाश्चात्य चिकित्सक इसे ही ‘आस्टियोआर्थ्राइटिस’ कहते है। इस रोग में संधियों में स्थित श्लेषक कफ सैनोवियल फ्लुईड कम हो जाता है। इसकी कमी के कारण उठतेबैठते, चलते फिरते समय हड्डियों में घर्षण (फ्रिक्शन) होने लगता है। यही घर्षण ओगे चलकर शोथ (सूजन) और दर्द का कारण बनता है। सर्दियों में यह दर्द कुछ ब़ढ जाता है। रूमार्थो टिकिया, पेनविन टिकिया, रिऑस्टो, वातगजांकुश रस का सेवन सुबह, दोपहर व शाम करें। भोजन के बाद महारास्नादि क़ाढा (२० मिली मात्रा) का प्रयोग करें। दर्दवाली संधियों पर रूमा आईल या महानारायण तेल को लगाएं। ज्यादा दर्द रहने की स्थिति में बालु (रेती) से सूखा स्वेद देवे याने सिकाई करें। गरिष्ठ भोजन, तैलीय भोजन व कंदमूल (आलू, अरवी, जमीकंद, मूली आदि) नहीं खाएं। रात्रि जागरण से बचे। ठंडी हवा का सेवन न करें। पंखे के ठीक नीचे न सोएं। औषध चिकित्सा के संग योगचिकित्सा करना/करवाना भी अच्छे नतीजे देता है।प्र मेरी उम्र २७ वर्ष है। दिन में ४५ बार मऱोड के साथ दस्त होता है। कई बार दस्त के साथ खून भी आता है। अंग्रेजी दवाआें से कुछ दिन ठीक होता है फिर से कुछ दिनों बाद पहले की हालत हो जाती है। परेशान हो गया हूं। आप कृपाकर उपाय सुझाएं।जक्करैय्या, जहीराबादउ पेट में मऱोड मार कर, आंवखूनयुक्त मल प्रवृत्ति होना अमिबियासिस का लक्षण है। इसी रोग में पुनरावृत्ति होते रहती है। खानपान में, साफसफाई में थ़ोडी असावधानी से एन्टामिबिका हिस्टोलिटिका नामक एककोषीय प्रोटोजोन के कारण यह रोग होता है। इसमें व्यक्ति का अग्नि बल मंद हो जाता है। आंत्रशोथ के लक्षण उभरने लगते है और कालान्तर में मल के साथ रक्त जाना शुरू हो जाता है।इस रोग में पथ्य बेहद जरूरी है। बकरी का दूध, गाय की ताजी छांछ, बकरी के दूध में पकाई गई शतावरी, पुराने चावल, अनारदाना आदि हितकारी है। तैलीय पदार्थ, मिठाईयां, गरिष्ठ पदार्थ, अचार, खट्टी वस्तुएं नहीं खानी चाहिए। गंगाधर रस टिकिया, कुटजघनवटी, अमिबिका टिकिया के संग बेलचूर्ण लेते रहने पर यह ज़डसमेत ठीक हो जाता है। भोजनोपरांत कुटजारिष्ट २० मि ली दवा को दोगुने पानी में मिलाकर पीने से लाभ होता है। पर्पटी योग खासकर पंचामृतपर्पटी इसमें अतीव उपयोगी है। अपने वैद्य की सलाह से, उनके संरक्षण में ही इलाज कराना बेहतर विकल्प है।
