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कृष्णचरित्र की उज्ज्वलता

Swatantra Vaartha  Mon, 22 Feb 2010, IST

कृष्णचरित्र की उज्ज्वलता

मैं श्रीगोपीजनों के साथ की हुई भगवान श्रीकृष्ण की लीलाआें को सर्वथा सत्य और परम पवित्र मानता हूं। मेरी समझ से उनमें व्यभिचार का जरा भी दोष नहीं है। वह तो साधन के ऊंचेसेऊंचे स्तर की परम पवित्र दिव्य अनुभूति हैं, जो परम दुर्लभ अत्यन्त कठिन गोपीरति की साधना में सिद्ध परम विरक्त, एकान्त भगवद्‌ रसिक महापुरुषों को ही उपलब्ध होती है।

श्रीराधारानी का नाम अवश्य ही श्रीमद्भागवत में नहीं है। इससे यह कहने का साहस नहीं करना चाहिये कि श्रीराधारानी की ‘कहानी’ कल्पित है। वह ‘कहानी’ नहीं, सत्य है। श्रीमद्भागवत में नाम नहीं है तो कहीं विरोध भी नहीं है। उसमें तो किसी भी गोपी का नाम नहीं है। अत्यन्त प्राचीन पद्मपुराण में, ब्रह्मवैवर्त में तथा गर्गसंहितादि सम्मान्य ग्रंथों में उनकी लीला लिखी है और इससे भी ब़ढकर उन महात्मा पुरुषों की अनुभूति प्रमाण है, जिन्होंने श्रीराधारानी का और उनकी कृपा का प्रत्यक्ष किया है।

कोई न माने तो उस पर न तो कोई जोर है न आग्रह है। परंतु किसी के माननेनमानने से सत्य का विनाश नहीं हो सकता। श्रीराधारानी का श्रीकृष्ण के साथ विवाह हुआ था या नहींइस खोज की आवश्यकता नहीं है, यद्यपि इसका भी वर्णन मिलता है। मेरा तो कहना यह है कि यदि केवल स्थूल दृष्टि से श्रीकृष्ण को साधारण मानव मानकर विचार करते हैं, तब तो श्रीकृष्ण जिस समय वृन्दावन छ़ोडकर मथुरा चले गये थे,उस समय उनकी उम्र ११ वर्ष की थी। रासलीलादि तो इससे भी बहुत पहले की घटनाएं हैं। इतनी छोटी अवस्था में कामक्ऱीडा हो नहीं सकती। और यदि उन्हें शर्वशक्तिमान्‌ सर्वान्तर्यामी, सबके एकमात्र आत्मा, सर्वलोकमहेश्वर, सच्चिदानन्दघन स्वयं भगवान मानते हैं, तब श्रीराधारानी बाहर से कोई भी क्यों न हों, वे साक्षात्‌ भगवती हैं, भगवान श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति हैं, उनके आनन्दस्वरूप का मूर्तरूप हैं, उनकी स्वरूपा शक्ति हैं। वे उनसे कदापि अलग नहीं हैं। आनन्द और प्रेमी की अति दिव्य लीला में उनका एक ही रूप का दो भावों में दिव्य नित्य प्रकाश है। श्रीराधारानी महाभावरूपा हैं और भगवान श्रीकृष्ण परम प्रेमस्वरूप हैं। प्रेम स्वरूप है प्रेमास्पद के सुख से सुखी होना। जहां निजेन्द्रियतृप्ति की वासना है, वहां तो प्रेम है ही नहीं, वहां तो कलुषित काम है। भगवान श्रीकृष्ण श्रीमती राधारानी के प्रेमास्पद हैं और श्रीराधारानी श्रीकृष्ण की प्रेमास्पदा हैं।

श्रीराधारानी जो कुछ करती हैं, श्रीकृष्ण के सुख के लिये करती हैं और श्रीकृष्ण को सुखी देखती हैं तो उनके सुख से सुखी होने का स्वभाव होने के कारण श्रीराधारानी को अपार सुख होता है। इधर श्रीराधारानी को सुखी देखकर श्रीकृष्ण का सुख ब़ढता है, क्योंकि श्रीराधारानी उनकी प्रेमास्पदा हैं और उनकी सुखी करने के लिये ही श्रीकृष्ण की प्रेमलीला होती है। इस प्रकार दोनों परस्पर एकदूसरे को सुखी करते हुए और एकदूसरे के सुख से अपने सुख की वृद्धि करते हुए लीला में संलग्न रहते हैं।

श्रीगोपीजन इन्हीं श्रीकृष्ण की स्वरूपाशक्ति ह्लादिनी की घनीभूत मूर्तियाँ हैं, जो दिनरात श्रीराधाकृष्ण के मिलनसुख में सुख का अनुभव करती हुई उनकी लीला में संयुक्त रहती हैं। यह लीला अत्यन्त दिव्य है। श्रीराधा और श्रीकृष्ण दोनों ही प्रेमी हैंदोनों ही प्रेमास्पद हैं, इसी से

भक्त कवि श्रीभगवतरसिकजी ने एक पद में कहा है

परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा।

दोउ चातक, दोउ स्वाती, दोउ घन, दोउ दामिनी अमंदा।।

परंतु इन्हीं भगवतरसिकजी ने ठीक ही कहा है

भगवतरसिक रसिक की बातें रसिक बिना कोउ समुझि सकै ना।।

यह सत्य है कि रासलीला आदि में श्रृङ्गार का खुला वर्णन है और नायकनायिकाआें की भांति चरित्र चित्रण है, परंतु उसके प़ढने से काम वासना जाग्रत होती है, यह बात ठीक नहीं। रासप#ााध्यायी का पाठ तो हृद्रोग काम का नाश करने वाला माना गया है और है भी यही बात। हां, उनकी बात दूसरी है जो भगवद्भावहीन हैं और उनके लिये रासलीला का प़ढना उचित भी नहीं है। यही तो अधिकारिभेद का रहस्य है। मेरी समझ से इस श्रृङ्गार और नायकनायिका की लीला में कुछ भी दोष नहीं है।

स्वयं समग्र ब्रह्म, पुरुषोत्तम, सर्वान्तर्यामी, सर्वलोकमहेश्वर, सर्वात्मा, सर्वाधिपति, अखिल विश्वब्रह्मांड के एकमात्र आधार, सम्पूर्ण विश्वसमष्टि को अपने एक अंशमात्र से धारण करने वाले, सच्चिदानन्दविग्रह श्रीभगवान तो गोपीनाथस्वरूप से इस रस के नायक हैं, और उपर्युक्त ह्लादिनी शक्ति की घनीभूत मूर्तियाँतत्वतः अभिन्नरूपा श्रीगोपीजन नायिका हैं। इनकी वह लीला भी सच्चिदानन्दमयी, अत्यन्त विलक्षण और हमलोगों के प्राकृत मनबुद्धि के सर्वथा अगोचर, दिव्य और अप्राकृत है। परंतु यदि थ़ोडी देर के लिये यह भी मान लें कि इस लीला में मिलन विलासदिरूप श्रृङ्गार का ही रसास्वादन हुआ था, तो भी इसमें तत्वतः कोई दोष नहीं आता।

अत्यन्त मधुर मिश्री की क़डवी तूंबी के शक्ल की कोई आकृति ग़ढी जाय, जो देखने में ठीक तूंबी सी मालूम होती हो, तो इससे वह तँूबी क्या क़डवी होती है? अथवा क्या उसमें मिश्री के स्वभावगुण का अभाव हो जाता है? बल्कि वह और भी लीलाचमत्कार की बात होती है। लाेेग उसे खारी तूंबी समझते हैं, होती है वह मीठी मिश्री।

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