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अब लिवर कैंसर का शल्यरहित इलाज

Swatantra Vaartha  Tue, 9 Mar 2010, IST

अब लिवर कैंसर का शल्यरहित इलाज

लिवर कैंसर विश्व में पांचवा सबसे आम और कैंसर द्वारा मौत का तीसरा कारण बनता जा रहा है। दरअसल, इस बीमारी से ग्रस्त बहुत से मरीजों का निदान उस अवस्था में ही होता है जब वे ऑपरेशन कराने की स्थिति में नहीं रहते यानी ऑपरेशन कराना उनके लिए खतरनाक हो सकता है।

लेकिन , अब नई तकनीक मिनिमली इंवेसिव इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिकल थेरेपी को प्रारंभिक और मेटास्टेटिक ट्‌यूमर के उपचार में बेहद प्रभावशाली पाया जा रहा है । ऐसी संभावना है कि आने वाले भविष्य में यह थेेरेपी शल्य प्रक्रियाआें को मात देकर उसका स्थान ले लेगी।

ट्रांसआर्टीरियल केमो एंबोलाइजेशन (टेस) थेरेपी से हाल ही में इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट ने लिवर कैंसर के मरीज का उपचार किया और उसमें यह पाया गया कि इससे मरीजों के जीवन की संभावना ब़ढी है। इसलिए ऐसा माना जा रहा है कि भविष्य में इस थेरेपी से उपचार आम हो जाएगा।

नई दिल्ली स्थित बत्रा और फोर्टिस हास्पिटल के इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट डॉ प्रदीप मुले के अनुसार इस प्रक्रिया के दौरान त्वचा में एक सूक्ष्म सा छेद किया जाता है। इसमें मरीज को लोकल एनीस्थिसिया दिया जाता है। यह प्रक्रिया दर्द रहित होती है और मरीज को हास्पिटल में भी ज्यादा समय तक नहीं रूकना प़डता है।

इस प्रक्रिया के दौरान इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट सबसे पहले पेट के निचले हिस्से की त्वचा में सूक्ष्म सा छेद करके उसमें एक कैथेटर डालता है। उसी के सहारे धमनियों में कीमोथेरेपी ड्रग को इंजेक्शन की मदद से डाला जाता है जिससे ये धमनियां अवरोधित कर दी जाती हैं। इस अवरोध से ट्‌यूमर तक रक्त नहीं पहुंचता है और ट्‌यूमर तक अधिक मात्रा में दवा पहुंचाई जाती है।

इस प्रक्रिया के कई फायदे हैं जैसे इसकी मदद से साधारण इंफ्यूजन की तुलना में ट्‌यूमर तक अधिक मात्रा में कीमोथेरेपी दवा पहुंचाई जा सकती है। कीमो एंबोलाइजेशन से इस थेरेपी के प्रभाव की अवधि ब़ढाई जा सकती है। नार्मल लिवर के सेलों को पोर्टल सर्कुलेशन के द्वारा रक्त में पहुंचाया जाता है और विकारग्रस्त सेलों को हेपेटिक आर्टरी द्वारा रक्त पहुंचाया जाता है। इस तरह ट्‌यूमर तक आसानी से दवा पहुंचाई जा सकती है। जिससे ट्‌यूमर को आसानी से नष्ट किया जा सकता है।

इस सर्जरी के लिए उपयुक्त मरीज हैंठीक न होने वाले लिवर कैंसर से ग्रस्त मरीज जिसका ३ एमजी से कम बिलिरुबिन हो, जिसका पोर्टल परफ्यूजन ५० प्रतिशत तक हो और हीपेटिक अवस्था बेहतर हो, इसे अलग या फिर दूसरे उपचारों जैसे कीमोथेरेपी या कीमो एंबोलाइजेशन और सर्जरी के साथ भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जिस केस में सर्जरी कारगर नहीं होती या फिर सर्जरी करना जटिल हो जाता है, उस केस में इस प्रक्रिया से उपचार का बेहतर परिणाम आता है।

रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशनआर एफ ए

यह प्रक्रिया ट्‌यूमर को घटाकर उस आकार में ले आती है जिसे बाद में सर्जरी करके आसानी से निकाला जा सके। इससे दर्द से आराम मिलता है और अन्य दुष्प्रभावों को भी कम किया जा सकता है। कैंसर से ग्रस्त मरीजों के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है। आर एफ ए से केवल ४ सेमी के ट्‌यूमर का उपचार किया जा सकता है। ब़डे ट्‌यूमरों के उपचार के लिए केमो एंबोलाइजेशन करने के बाद में आर एफ ए किया जा सकता है। ये दोनों ही प्रक्रियाएं शल्य रहित हैं और इनमे मरीज को केवल एक दिन के लिए ही हास्पिटल में रुकना प़डता है। इस प्रक्रिया के दौरान एबों लाइजेशन से ट्‌यूमर का आकार घटाया जा सकता है जबकि आर एफ ए से कैंसर के सेलों को नष्ट किया जा सकता है।

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