जानते हैं पुरुषों के हार्माेेनल बदलाव
इस शीर्षक को प़ढकर आप चौंक गए क्या ? एक उदाहरण से आप यह बात समझ सकते हैं। अनिल को ही लीजिए। वह एक निजी कंपनी में सलाहकार है। कभी समय पर पहुंचना, मन लगाकर काम करना और सबके साथ घुलमिल कर रहना उसकी पहचान थी, लेकिन अब कुछ समय से वह पूरी तरह बदल गया है। बातबात पर गुस्सा करना और च़िडच़िडाना जैसे उसकी आदत बन गई हैं। काम में तो उसका मन ही नहीं लगता।
उसने एक मैग्जीन में मेल मेनोपाज के बारे में प़ढा था जिसके लक्षण उससे मेल खा रहे थे। अपनी यह हालत देखकर उसके दिमाग में बारबार यही खयाल आता था कि कहीं वह मेनोपाज का शिकार तो नहीं ? बाद में डॉक्टर से बात करने पर उसे पता चला कि यह मेनोपाज नहीं, हामा]स में बदलाव होता है जिस पर ध्यान देने और एहतियात रखने से सामान्य जिया जा सकता है।
मेल मेनोपाज नहीं है यह
पुरुषों के शरीर में प्राकृतिक रूप से हामा]स में कमी होनी शुरू हो जाती है। इसे मेल मेनोपाज नहीं कहा जा सकता। वास्तविकता यह है कि मेनोपाज जैसा कुछ भी पुरुषों में नहीं होता। हार्मोन रोग विशेषज्ञ डॉ शैलेश लोढा का कहना है कि जहां महिलाआें में मेनोपाज स्पष्ट रूप से पहचाना जाता है, वहीं पुरुषों के शरीर में टेस्टोस्टेरोन नामक हामा]स होते हैं जो हर वर्ष लगभग एक प्रतिशत तक कम होते जाते हैं।
टेस्टोस्टेरोन, मुख्यतः टेस्टीज द्वारा स्रावित होता है पर मामूली मात्रा एड्रिनल ग्लैंड्स द्वारा भी निर्मित होती है इसलिए टेस्टोस्टेरोन की कमी के लक्षण आसानी से दिखाई नहीं देते। पुरुषों में एंड्रोजेंस के घटतेपन को एंड्रोपाज या मेल मेनोपाज कहना सही नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार इसे पार्शियल एंड्रोजेन डेफिशियंसी (पीएडीएएम) के नाम से जाना जाता है।
यह एक निरंतर प्रक्रिया है जिसकी मेनोपाज से तुलना नहीं की जा सकती । ६० वर्ष की आयु के बाद प्रति १० पुरुषों में से २ में टेस्टोस्टेरोन की कमी आती है। यह ब़ढती उम्र का एक सामान्य हिस्सा है।
टेस्टोस्टेरोन का महत्व
टेस्टोस्टेरोन प्रोटीन बनाने में मददगार होता है और दांपत्य जीवन में भी फायदेमंद होता है। यह कई तरह की मैटाबालिक गतिविधियों को भी प्रभावित करता है जैसे बोन मैरो में ब्लड सेल्स का बनना, हड्डियों का बनना, लिपिड मैटाबॉलिज्म, कार्बोहाइड्रेट मैटाबॉलिज्म, लिवर फंक्शन, प्रोस्टेट ग्लैंड्स का ब़ढना आदि।
लक्षण ः ये बदलाव देखकर आप समझ सकते हैं कि आपमें टेस्टोस्टेरोन की कमी हो रही है।
* भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक स्तर पर परिवर्तन।
* मांसपेशियों में कमजोरी।
* हड्डियों में कमजोरी और पीठ दर्द।
* दांपत्य जीवन में निराशा।
* खराब मूड।
* नर्वसनेस ।
* च़िडच़डापन।
* अवसाद ।
* याददाश्त में कमी।
* ऊर्जा की कमी ।
* अनिद्रा का शिकार होना।
* हीमोग्लोबिन का स्तर कम होना।
* बॉडी फैट में इजाफा।
* शरीर के बाल कम होना।
* शरीर में पानी जमा होना।
* सोते समय सांस में रूकावट महसूस होना।
* प्रोस्टेट ग्रंथि का आकार ब़ढना।
* पूर्व में मौजूद कैंसर ब़ढ सकता है।
* स्तन का आकार ब़ढना।
* जरूरत से ज्यादा रक्त बनना।
* वृषण के आकार में कमी ।
ऐसा करें :
* सही मात्रा में संतुलित भोजन खाएं। हरी सब्जियां और ताजे फलों का सेवन करें। सोयाबीन के बने प्रोडक्ट्स अधिक खाएं।
* स्वस्थ जीवनशैली बनाए रखने के लिए खुद को व्यस्त रखें।
* हर रोज कुछ समय मेडिटेशन करें। फिट रहने के लिए व्यायाम करें। व्यायाम ऐसा हो, जिससे मांसपेशियों को मजबूती मिले और लचीलापन भी रहे।
* विटामिन लेते रहें।
* हेल्थ चैकअप लगातार करवाते रहें।
