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एक मानसिक बीमारी है मल्टीपल पर्सनलिटी

Swatantra Vaartha  Tue, 6 Jul 2010, IST

एक मानसिक बीमारी है मल्टीपल पर्सनलिटी

कॉलेज में अत्यंत स्मार्ट एवं कुशाग्र बुद्धि से संपन्न समझी जाने वाली मोनिका को एक दिन बैठेबैठे न जाने क्या हुआ कि वह अचानक अजीबोगरीब हरकतें करने लगी। घरवाले बहुत चिंतित हो गए। प़डोस में मनोचिकित्सक डॉक्टर भंडारी रहते थे। उन्हें बुलाया गया। मोनिका उन्हें न तो पहचान रही थी और न ही उनसे बात करने को राजी थी।

खैर, उस समय उसे कुछ नींद की गोलियां देकर सुला दिया गया। जब वह सोकर उठी तो एकदम नॉर्मल थी। उसे कुछ याद भी न था कि डॉक्टर अंकल आए थे और उन्होंने उससेे बात करने की कोशिश की थी।

दो दिन बाद मोनिका फिर उसी रूप में थी। इस बार वह पुरुषों जैसी आवाज में बात कर रही थी और बातें भी असंबद्ध सी थी। उसे तुरंत मानसिक चिकित्सालय ले जाया गया, जहां मनोविशेषज्ञ डॉ घोष ने बताया कि मरीज ‘मल्टीपल पर्सनलिटी’ की मरीज है और इसका इलाज मनोवैज्ञानिक तरीके से ही किया जा सकता है। दवा तो केवल कुछ समय के लिए ही कारगर साबित होगी।

सुभाष भी इसी मानसिक रोग का शिकार था लेकिन चूंकि वह एक छोटे के कस्बे में रहता था, इसलिए वहां अधिकांश लोगों ने इसे भूतप्रेत का प्रकोप मानकर झ़ाडफूंक के जरिये ही इलाज करवाने की राय दी। सुभाष का ब़डा भाई काफी प़ढलिखा था। वह उसे तुरंत पास के शहर लखनऊ इलाज के लिए ले गया। डॉक्टर सेन वहां के जानेमाने मनोचिकित्सक हैं।

डॉ सेन ने सुभाष के भाई को सुभाष की बीमारी के बारे में समझाते हुए कहा, ‘दरअसल आपका भाई मल्टीपल पर्सनलिटी होने के कारण ऐसा व्यवहार कर रहा है। इस मानसिक रोग में एक ही समय में व्यक्ति में कई व्यक्तित्वों का समावेश हो सकता है। हालांकि इनका आपस में एकदूसरे से कोई संबंध नहीं होता यानी हर व्यक्तित्व अपने आपमें अलग होता है। उसका अपना भूतकाल, अपनी याद्दाश्त होती है। इतना ही नहीं, रोगी स्वयं इस बात से बिलकुल अनभिज्ञ रहता है।’

हर व्यक्तित्व का अपना नाम और अपनी पहचान होती है जिनके मूड से लेकर खानेपीने की आदतें, रहनसहन, बोलचाल, उम्र, लिंग अर्थात्‌ सब कुछ भिन्न होता है। इसी प्रकार तदनुसार वेेेे प्रतिक्रिया भी भिन्न देते हैं। फिर तो उन्हें दवाएं भी उनके व्यक्तित्व के अनुसार ही लगती हैं। व्यक्तित्व में बदलाव होने पर पहले व्यक्तित्व की यादें और बातें भूल जाती है और उसी अवस्था में यानी पहले वाले व्यक्तित्व में लौटने पर वे फिर याद आ जाती हैं।

स्प्लिट पर्सनलिटी अर्थात्‌ विभाजित व्यक्तित्व में दो भिन्न व्यक्तित्व होने पर भी वे दोनों एकदूसरे से संबद्ध होते हैं और एकदूसरे के अस्तित्व का उन्हें बोध होता है जबकि मल्टीपल पर्सनलिटी में एक ही व्यक्ति में भिन्नभिन्न व्यक्तित्व एकदूसरे से बिलकुल कटे होते हैं।

नीरजा इसी अनोखे रोग से ग्रसित है। जब वह मंजू बन जाती है तो बेहद खुशमिजाज और हंस़ोड लगती है, लेकिन पूजा बनने पर एक गुस्सैल कर्कशा के रूप में सामने आती है। फिर जब नलिनी बन जाती है, तो गहरे अवसाद में डूबी अपने आपमें ही सिमटी रहती है और श्वेता बनने पर उसके कुछ अलग ही रंगढंग होते हैं। तब वह एक कॉकेट की तरह अभिसारिका बन पुरुषों को रिझाती है, लेकिन इतना सब कुछ होने पर भी अंत में वही नीरजा वाला व्यक्तित्व ही उसका मूलरूप होता है।

कोई भी इंसान जन्मजात यह रोग लेकर पैदा नहीं होता, न ही इसमें ‘सुपर नेचुरल तत्व’ जैसी ही कोई बात है। किसी आत्मा वगैरह का भी कोई चक्कर नहीं होता क्योंकि यह सब कपोल कल्पना ही है। यह वास्तव में एक मानसिक रोग है जो लाइलाज नहीं। इस रोग का कारण काफी कुछ मरीज का असामान्य बचपन होता है। दोहरे अर्थ वाले उपदेश और लंबी संघर्षमय हिदायतें व्यक्ति को पागल बना सकती है। पिता की छवि का दहशत जगाना या यौन इच्छाआें को लेकर अपराध बोध से ग्रस्त होना भी आगे चलकर व्यक्ति के व्यक्तित्व पर कहर बरसा सकता है।

कहा भी जाता है ‘मैन इज ए प्रोडक्ट ऑफ पास्ट’ यानी हर व्यक्ति अपने अतीत से गहराई से ज़ुडा रहता है, लेकिन मल्टीपल पर्सनलिटी वालों का अपना अतीत सिवाय हादसों के भूला रहता है। अपनी असंगठित मनोदशा का उन्हें अहसास तक नहीं होता। वैसे देखा जाए तो किसी भी नॉर्मल व्यक्ति की ‘यूनिडाइमेंशनल पर्सनलिटी’ नहीं होती अर्थात्‌ मल्टी शब्द उसके साथ ज़ुडा होता है और वह उसका प्लस प्वाइंट ही होता है।

कैसा होता है नॉर्मल होना?

मानसिक स्वास्थ्य के अंतर्गत भावात्मक स्थिरता तथा परिपक्वता, चरित्र की विशालता तथा व्यापकता, मानसिक दबावों को सहन करने की शक्ति तथा स्वयं को सामान्य अवस्था में बनाए रखने की क्षमता, मनोवैज्ञानिक कुशलता आदि सभी कुछ समाहित है।

वास्तविकता को समझने की शक्ति, पूर्वाग्रह रहित विचार व्यक्त करने की योग्यता, दरदृष्टि आदि बातें, लेकिन ये सब गुण हर व्यक्ति में एक साथ नहीं मिलते। इसका मतलब यह नहीं कि वे असामान्य है। हां, यह कहा जा सकता है कि जो व्यक्ति सामान्यता के जितना करीब होता है, वह उतना ही सामान्य होता है।

साइकोथेरेपी ही मल्टीपल पर्सनलिटी की समस्या का स्थायी इलाज है, बाकी दवाईयां तो केवल सामयिक और अस्थायी इलाज ही साबित होती है। मनोचिकित्सक बीमारी की ज़ड तक सम्मोहन द्वारा पहुंच पाते हैं। एक बार समस्या से रुबरु होने पर वे मनोवैज्ञानिक तरीके से भिन्नभिन्न व्यक्तित्वों को जोडनेे का प्रयत्न करते हैं। इसमें काफी लंबा समय भी लग सकता है और पूर्ण सफलता न मिलने पर भी उन्हें इस दिशा में कुछ सफलता तो मिल ही जाती है।

उषा जैन ‘शीरी

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