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औषधीय गुणों से पूर्ण भी होती हैं पत्तियां

Swatantra Vaartha  Tue, 20 Jul 2010, IST

औषधीय गुणों से पूर्ण भी होती हैं पत्तियां

वृक्षों की पत्तियों में भी उपचार का गुण छिपा होता है। पत्तियों के अंदर औषधीय गुणों के विद्यमान होने से छोटीछोटी पत्तियों का महत्व अत्यंत ब़ढ जाता है। जानकारी के अभाव में पत्तियों के अंदर छिपे गुणों का उपयोग हम नहीं कर पाते। कुछ महत्वपूर्ण पत्तियों के अंदर छिपे गुणों अर्थात्‌ औषधीय महत्व का वर्णन यहां किया जा रहा है:

अनार की पत्तियां अनार को दा़डम, पॉमेग्रेनेट, लोहितपुष्पक आदि नामों से भी जाना जाता है। इसकी पत्तियां अभिमुख या विपरीत आयताकार या दीर्घवत कुंठिताग्र तथा चिकनी होती हैं। इनका स्वाद कुछ कसैला होता है। चिकित्साविदों के अनुसार पत्तियों के रस में पेलीटिएरीन, एल्केलॉइडस तथा टैनिक एसिड की मात्रा पायी जाती है।

अनार की पत्तियों का क़ाढा बनाकर उससे कुल्ली करने पर मुंह के छाले समाप्त हो जाते हैं। पत्तियों के रस से दांतों को मलते रहने पर दांत मोती से चमकने लगते हैं। अनार की पत्तियों के ताजे रस से मालिश करते रहने पर स्तनों के आकार में वृद्धि होती है। अतिसार में पत्तियों का क़ाढा पिलाना लाभदायक होता है। शर्बत में अनार की पत्तियों का रस एक गिलास में आधा चम्मच की मात्रा में डालकर पीते रहने से लू का प्रकोप नहीं होता।

आम की पत्तियां आम को फलों का राजा माना जाता है। इसके पत्ते हरे रंग के एवं चिकने होते हैं। पत्तों के किनारे प्रायः लहरदार होते हैं तथा आधार की ओर च़ौडाई कम होती जाती है। इसकी कोमल पत्तियों का उपयोग औषधीय काया] के लिए किया जाता है।

आम की पत्तियों में औषधीय गुण होने के कारण आयुर्वेद के चिकित्सक इसका प्रयोग अधिकांश करते रहते हैं। कोमल पत्तियों का स्वरस निकालकर दो छोटी चम्मच की मात्रा में ठंडे पानी में मिलाकर पिलाने से पेट के कृमि निकल जाते हैं।

पत्तियों को पानी के साथ पीसकर उस लुगदी को थ़ोडा गरम करके घाव पर रखकर बांध देने पर घाव आसानी से पक जाता है। पत्तियों को जलाकर उसकी राख (भस्म) में शहद मिलाकर खाते रहने से स्वप्नदोष तथा रक्तप्रदर में आशातीत लाभ होता है। कोमल लाल पत्ती में दो दाना गोल की (मरीच)लपेटकर यंत्र की तरह गले में लटका लेने पर कामशक्ति ब़ढती है तथा दुःस्वप्न आने बंद हो जाते हैं।

इमली की पत्तियांः इमली को तित़िडी, अम्लिका, ऑक्ली, टेमरिंड आदि के नामों से भी जाना जाता है। इसकी पत्ती छोटी होती है। पत्तियों के डंठल बहुत छोटे होते हैं। दक्षिण भारत में इमली का प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाता है।

इमली के पत्तों के क़ाढे में सेंधा नमक मिलाकर पीने से खांसी दूर होती है। इसकी कोमल पत्तियों की चटनी खाने से भूख ब़ढती है। पत्ती के क़ाढे में भात मिलाकर खाने से पांडुरोग अच्छा होता है।पत्ती के क़ाढे से योनि प्रक्षालन करते रहने से ल्यूकोरिया के कीटाणु दूर होते हैं। गर्मी के मौसम में इमली की पत्तियों का रस शीतल जल में डालकर पीने से तरावट बनी रहती है। आयुर्वेद में इमली को श्वासकासहर एवं तृष्णानाशक बताया गया है। इसके रस में सूजन दूर करने की भी शक्ति होती है।

ईख की पत्ती ः इसे इक्षु, उक, शुगरकेन, आक आदि के नामों से जाना जाात है। ईख के रस से बने ग़ुड, खांड, चीनी, मिश्री आदि सर्वत्र मिलते हैं। इसकी २ से ३ इंच च़ौडी पत्तियां होती हैं जिनको ‘गेंडा’ भी कहा जाता है। पत्तियों के किनारे या तट तेज होते हैं। इसकी पत्तियां पतली, छोटी, नरम और गहरे रंग की भी होती हैं।

ईख या गन्ने की पत्तियों को पीसकर सूजन या दर्द वाले स्थान पर लगाते रहने से सूजन एवं दर्द दोनों ही नष्ट हो जाते हैं। पत्तियों को जलाकर भस्म बनाकर कपूर एवं नारियल तेल मिलाकर लेप करने पर ‘बालत़ोड’ का घाव शीघ्र दूर होता है। ईख के रस में सुक्रोज, राल, वसा एवं ग्वानीन नामक रसायनिक पदार्थ भी पाये जाते हैं। मूत्र न उतरने पर ईख की पत्तियों का स्वरस पानी में डालकर पिलाया जाता है। ईख की पत्तियों के स्वरस के साथ आंवले का तेल बराबर मात्रा में मिलाकर मालिश करते रहने से गठिया का सूजन व दर्द भी दूर होता है।

एरंड की पत्ती ः इसे अरंडी, रेंडी, कैस्टर सीड आदि नामों से जाना जाता है। इसकी खेती समग्र भारत वर्ष विशेषतः उत्तर प्रदेश, बंगाल, चेन्नई, मुंबई आदि स्थानों (ग्रामीण इलाकों) में की जाती है। इसके पत्ते में वसाम्ल, रिसिनोलिक अम्ल, ओलिक अम्ल, लिनोलिक अम्ल, स्टियरिक अम्ल और हाइड्रोक्सीस्टियरिक अम्ल आदि विद्यमान रहते हैं।

एरंड के पत्ते पर सरसों का तेल लगातार थ़ोडा गर्म करके घाव (फ़ोडा) पर बांधने से या तो वह बैठ जाता है या फिर पक कर फूट जाता है। पत्तियों के रस में जैतून का तेल मिलाकर मालिश करने से गठिया जैसा ज़ोड दर्द भी ठीक हो जाता है। अर्श (बवासीर),भगंदर तथा गुदभ्रंश के रोगों में ‘एरंड पाक’ का सेवन करने से इनमें राहत मिलती है।

कचनार की पत्ती ः कचनार को युग्मपत्र, बाहोनिया, वारिएगाटा आदि नामों से भी जानते हैं। इसके फूल श्वेत, लाल, पीले व नीले रंग के होते हैं। औषधीय प्रयोग में लाल कचनार की पत्तियों का उपयोग होता है। इसकी पत्तियों का स्वाद खट्टा होता है। व्रणशोधन, रोपण, स्तम्भन, प्रमेह, गंडमाला आदि रोगों का शमन इसके प्रभाव से होता है।

कचनार की पत्तियों का क़ाढा बनाकर घावों को धोने से वे जल्दी सूखते हैं। इसके क़ाढे से लिंग की सफाई करते रहने पर स्तम्भन शक्ति प्राप्त होती है। गंडमाल रोग में इस पत्ती को गर्म करके बांधना हितकर होता है। कचनार की पत्तियों को सिरहाने रखकर सोने से बुरे सपने आने दूर हो जाते हैं। इसकी पत्तियां ६ इंच तक लंबी एवं इतनी ही च़ौडी होती हैं। एक नुस्खे के अनुसार कचनार की पत्तियों के स्वरस को सिर के बालों में लगाते रहने से जूं नहीं पनपती ।

आनंद कुमार अनंत

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