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पाइल्स के इलाज में बेहद कारगर है स्टेपलर तकनीक

Swatantra Vaartha  Tue, 31 Aug 2010, IST

पाइल्स के इलाज में बेहद कारगर है स्टेपलर तकनीक

पाइल्स या बवासीर जैसी बीमारी के पनपने का सबसे ब़डा कारण है हमारी भागती द़ौडती जिंदगी, अस्त व्यस्त दिनचर्या, खानपान में लापरवाही और मानसिक तनाव जो कि अब आम जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बनते जा रहे हैं।

इसके ऊपर से भारतीय परंपराआें और रीति रिवाजों में छिपी हुई शर्म की वह परत, जो लोगों को खुलकर इस बीमारी की चर्चा के लिए घर से बाहर निकलने की इजाजत ही नहीं देती है जिसके कारण लोग इस बीमारी को सालों साल अपने अंदर पालते रहते हैं। वैसे भी उचित जानकारी के अभाव में बवासीर के रोगियों की संख्या में दिन दोगुना इजाफा हो रहा है। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि आज भी केवल दस प्रतिशत मरीज ही इस बीमारी का इलाज कराने के लिए आगे आते हैं।

डॉ भीमसेन बंसल बताते हैं कि,‘ दरअसल इस बीमारी का संबंध शरीर में मल त्यागने के स्थान से है, जिसे गुदाछिद्र कहा जाता है। वास्तव में इस स्थान पर मांसपेशियों में आए बदलाव के कारण एक घावनुमा आकृति पैदा हो जाती है, इस अवस्था को बवासीर कहा जाता है। जिसके कारण मल त्यागने के समय खून का स्राव हो जाता है। मल त्यागने के दौरान इस घाव के उभार से घर्षण पैदा होता है, जिससे यह स्थान छिल जाता है, क्योंकि मांसपेशियों से होकर खून की नलियां गुजरती हैं इसलिए वहां से रक्त की धारा फूट प़डती है और मल के साथ काफी खून निकलता है। परिणामस्वरूप मल त्यागते समय लगातार रक्त स्राव होने से मरीज निरंतर कमजोर हो जाता है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी घट जाती है। कई मरीजोंं को तो मल त्यागते समय भयावह प़ीडा से गुजरना प़डता है। यह प़ीडा मल त्यागते समय तो कष्टदायी होती ही है मगर ये प़ीडा मरीज का सोना, उठना और बैठना तक दुर्लभ कर देती है। बवासीर मेेें रक्त प्रवाह और दर्द के साथसाथ खुजली भी पैदा हो जाती है। फिर उचित इलाज के अभाव में यह जितना फैैलता है उतना ही मरीज को मल त्यागते समय दिक्कत का सामना करना प़डता है जिससे कि दूसरी बीमारियां होने का खतरा भी बना रहता है। इसलिए पाइल्स एक खतरनाक बीमारी है।

अगर इसके इलाज की बात की जाए तो यह मरीज के केस पर निर्भर करता है। यदि बीमारी प्रारंभिक अवस्था में ही है, तो दवाआें, योगासन और मरीज की दिनचर्या में बदलाव लाकर इसे ठीक कर दिया जाता है। वैसे आमतौर पर ऑपरेशन के द्वारा इसका उपचार किया जाता है। यह तरीका सबसे पहले इटालियन सर्जन डॉ एंटानियो लांगों डिपार्टमेंट ऑफ सर्जरी यूनिवर्सिटी ऑफ प्लेरमो ने इजाद किया था।

पाइल्स के ऑपरेशन में मुख्य तौर पर गुदा क्षेत्र में छिद्र कर हिमोराइड्‌स को बाहर निकाला जाता है और बाद में फिर से उस छिद्र के चीरे को सिल दिया जाता है। यह प्रक्रिया काफी दर्द भरी होती है और उसमें खून भी ज्यादा निकलता है। साथ ही मरीज को कम से कम से कम १५ दिनों तक बिस्तर पर रहना प़डता है। इसके बाद भी मरीज को काफी सावधानी बरतनी प़डती है जैसेकब्ज न होना, उचित समय पर मल निवृत्त होना आदि।

बवासीर का इससे बेहतर इलाज करने के लिए दूसरी तकनीक भी मौजूद है जिसे स्टेपलर तकनीक कहा जाता है, जो कि ऑपरेशन के मुकाबले काफी आसान होता है। यह एक यंत्र है जिसे पीसीएच प्रोसीड्‌यूरल सेट कहते हैं। इस प्रक्रिया में न तो ज्यादा खून निकलता है और न ही ज्यादा दर्द होता है। मरीज भी जल्द ही सामान्य स्थिति में पहुंच जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान एक गोलनुमा ३३ एमएम हिमोराइड स्टेप्लर नामक यंत्र को गुहा के अंदर डालकर कथित गांठ को सेंकने का काम किया जाता है। जहां पर रक्त जमा होने का अंदेशा रहता है।

वैसे गांठ की आकृति और स्थिति के आधार पर इस तकनीक के माध्यम से तीन अलगअलग तरीकों से इलाज किया जाता है, लेकिन किसी भी तरीके से कोई तकलीफ नहीं होती है और ब़डी आसानी से गांठ को सफलतापूर्वक खत्म कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को पूरा करने में तकरीबन दस मिनट का समय लगता है और मरीज मात्र तीन दिनों के बाद सामान्य दिनचर्या अपना लेता है। सबसे अच्छी बात तो यह है कि इस तकनीक से शरीर पर किसी तरह के घाव के निशान अथवा बैंडेज लगाने के निशान भी नहीं प़डते हैं और मरीज का आसानी से इस बीमारी से पीछा छूट जाता है। अधिक जानकारी के लिये नई दिल्ली के आरजीस्टोन यूरोलॉजिकल रिसर्च सेंटर के चेयरमैन डॉभीमसेन बंसल फोन नं ०९८७१२२८८६६ पर संपर्क किया जा सकता है।

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