गोपाल रथ३९ (गतांक से आगे)
क्षितिज में रक्तिम आभा बिखेरते हुए संध्या का सूर्य अस्त होने जा रहा था। आकाश में पक्षीगण अपने ठिकानों की ओर उ़डते हुए लौट रहे थे। संध्या की नीरवता को भंग करते हुए मातरी मां ने ग़ाडी चालक से पूछा, ‘क्यों भाई क्या कहीं रात्रि में ठहरने के लिए कोई उपयुक्त स्थान मिलेगा?’ ‘यहां से थ़ोडी दूर पर रास्ते में ही एक सराय है। यदि जगह मिली तो वहीं रुक जाएंगे।’ ग़ाडीवान ने उत्तर में कहा। दिन भर की लंबी यात्रा से थककर चूर हुए बैलों के पैर मन्थर गति से ब़ढते चले जा रहे थे। कुछ समय के उपरांत खर्जूर के वृक्षों का एक झुरमुट दिखलाई प़डा। वृक्षों की ओट से छनकर आता हुआ किसी टिमटिमाते हुए दिये का प्रकाश मानों उन्हें अपनी ओर आने के लिए आमंत्रित कर रहा हो। ग़ाडीवान ने उंगली से इशारा करते हुए सराय के आ जाने की सूचना दी और फिर ग़ाडी रोककर उसने बैलों को बंधनमुक्त करते हुए उनकी पीठ थपथपाई और उन्हें खानापानी देने के काम में लग गया।
इधर योगिराज वज्रनाभ एवं मातरी भी ग़ाडी से उतर कर नीचे आ गए। दोनों ने अपने पैरों को सीधा किया और फिर सराय की ओर ब़ढ गये। सराय के द्वार पर चार मुस्तंडे बैठे हुए सुरापान कर रहे थे। ‘क्या रात बिताने के लिए जगह मिल सकती है ?’ मातरी ने हवा में प्रश्न उछाला। कोई उत्तर न मिलने पर पुन: आवाज दी। सुरापान करने वालों में से एक मुस्तंडे ने मुस्कराते हुए कहा, ‘हां हां, क्यों नहीं ? सराय क्या तुम हमारे दिल में रहो।’ इतना सुनना था कि योगिराज का चेहरा क्रोध से तमतमा गया। फिर भी अपने को संयमित करते हुए उन्होंने मातरी से वापस लौटने के लिए कहा। तभी वह मुस्तंडा अपने स्थान से उठकर मातरी की ओर लपका। ‘अरे अब हमें यहां छ़ोडकर वापस कहां जाओगी?’ योगिराज के संयम का बांध मानों टूट गया हो। उन्होंने आगे ब़ढकर उस मुस्तंडे के मुंह पर एक जोर से घूंसा ज़ड दिया। वह वहीं पर ल़डख़डाकर गिर प़डा। यह देखकर उसके तीनों साथी योगिराज की ओर झपटे। योगिराज के पुराने पहलवानी के दांवपेंच काम आने लगे। उन्होंने दो मुस्तंडों को एक साथ उठाकर धरती पर पटका और फिर तीसरे की ओर द़ौडे। योगिराज उससे भ़िडे ही थे कि वे दोनों मुस्तंडे अपनी धूल झ़ाडते हुए जमीन से उठे और उन्होंने योगिराज को पीछे से कसकर पक़ड लिया। फिर क्या था, सामने वाले मुस्तंडे ने योगिराज को त़डात़ड पीटना शुरू कर दिया। मातरी मां ने द़ौडकर बैलग़ाडी से एक मोटी लक़डी उठायी और सामने वाले मुस्तंडे के सिर पर दे मारी। वह कराहते हुए धराशायी हो गया। ग़ाडीवान, जो अभी तक चुपचाप ख़डा हुआ तमाशा देख रहा था, एक जंगली शेर की तरह दह़ाडता हुआ द़ौडा और योगिराज को पीछे से पक़डे हुए दोनों मुस्तंडों पर दनादन प्रहार करने लगा। अब तक चारों मुस्तंडों का नशा काफूर हो चुका था। उन्होंने योगिराज के चरणों पर गिरकर क्षमायाचना करनी चाही। योगिराज ने उन्हें पैरों से ढकेलते हुए मातरी मां से क्षमा मांगने को कहा। मातरी मां ने उन्हें वहां से फौरन भाग जाने का आदेश दिया। उन चारों को दफा करने के बाद जब योगिराज मातरी मां के साथ सराय में घुसे तो देखा कि वहां का चौकीदार जमीन पर प़डा छटपटा रहा था। बदमाशों ने उसके हाथपैर रस्सी से बांध दिये थे और मुंह में कप़डा ठूंस दिया था, ताकि वह चीखचिल्ला न सके। योगिराज ने उसके हाथपैरों की रस्सी खोली और उसके मुंह का कप़डा बाहर निकाला। अब तक सभी कुछ सामान्य हो चुका था। मातरी मां ने चौकीदार को पानी गरम करने को कहा और फिर गुनगुने पानी से योगिराज के सिर पर आयी चोटों को धोया। उनकी आंखें पुन: नम हो गयीं। वह सिसकते हुए बोलीं, ‘स्वामी आज मेरे कारण आपको यह दिन देखना प़डा। अच्छा होता यदि मैं आपके साथ न आती।’ योगिराज ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, ‘मातरी, तुम न होतीं तो मेरे बचपन के पहलवानी के दांवपेंच कौन देखता ?’ ‘सो तो है।’ मातरी ने जवाब दिया और फिर दोनों खिलखिलाकर हंस प़डे। मातरी योगिराज के लाख मना करने पर भी उनके पैर दबाने लगी। योगिराज के सो जाने के उपरांत मां ने जमीन पर चादर बिछाई और लेट गयी।
दूसरे दिन भोर हाेेते ही ग़ाडीवान ने चलने का आह्वान किया। योगिराज एवं मातरी मां तो पहले से ही स्नानपूजन कर तैयार बैठे थे। सराय के चौकीदार को मातरी मां ने दो दीनार देने चाहे, लेकिन उसने कुछ भी लेने से मना कर दिया। साथ ही, रात वाली घटना के लिए उसने खेद प्रकट करते हुए क्षमायाचना की। योगिराज एवं मातरी मां ने ‘रात गई बात गई’ कहकर उससे विदा ली और ग़ाडी पर जा बैठे। ‘कुरुगूर पहुंचने में अभी कितना समय और लगेगा ?’ योगिराज ने ग़ाडीवान की ओर देखते हुए पूछा। ‘संध्याकाल तक पहुंचने की आशा है।’ उत्तर मिला। मातरी मां अपनी उंगलियों पर गणित लगा रही थी। ‘कहिए, आपकी ज्योतिष विद्या क्या कहती है ?’ योगिराज ने हंसते हुए प्रश्न किया। ‘स्वामी, कल ‘गुरुपूर्णिमा’ है। हम ब़डे पावन अवसर पर कुरुगूर पहुंच रहे हैं। हजारों की संख्या में श्रद्धालु बाबा के दर्शनों के निमित्त कुरुगूर पहुंचेंगे। ठहरने के लिए उपयुक्त स्थान मिलना कठिन होगा।’ मातरी मां ने चेतावनी देते हुए कहा। योगिराज ने सहज भाव में उत्तर दिया ‘ताम्रपर्णी के तट पर कहीं भी चादर बिछा कर ठहर जाएंगे। तपस्वी बाबा के दर्शनों की चिंता कीजिए, ठहरने की नहीं।’ ‘बाबा की अनुकंपा से दर्शन तो मिल ही जाएंगे।’ मातरी ने कहा। ग़ाडीवान, जो अभी तक चुपचाप बैठा यह वार्तालाप सुन रहा था बोला, ‘कल निश्चय ही गुरु भगवान के दर्शनों के लिए अपार भ़ीड होगी। आज रात से ही लोग आश्रम के चतुर्दिक एकत्रित होना प्रारंभ कर देंगे। कल दिन में तो कुरुगूर में पैर रखने की भी जगह नहीं मिलेगी।’ इतना कहते हुए ग़ाडीवान ने बैलों को हांक लगायी। ग़ाडी की गति में कुछ तेजी आयी। दिन का दूसरा पहर आतेआते धूप प्रखर हो गयी और गर्म हवा के झोंकों से समस्त वातावरण तपने लगा। मातरी मां बोली, ‘क्यों न दोपहर में हम अल्प समय के लिए कहीं विश्राम कर लें।’ योगिराज ने मातरी मां की बात का समर्थन किया। ग़ाडीवान ने मार्ग में ही एक बरगद वृक्ष की घनी छाया तले ग़ाडी रोक दी। स्वल्प विराम के उपरांत यात्रा पुन: प्रारंभ हुई। संध्याकाल आतेआते कुरुगूर के मंदिरों के समक्ष स्थित कीर्तिस्तंभों के ऊपरी ध्वज नजर आने लगे। मातरी मां आनंद विभोर हो उठीं। वह चीख कर बोलीं, ‘योगिराज, हम थ़ोडी ही देर में कुरुगूर पहुंचने वाले हैं। मेरा मन बाबा के दर्शनों के लिए आतुर हो रहा है।’ योगिराज ने ब़डी श्रद्धा के साथ मंदिरों की दिशा में सिर झुकाकर नमन किया। ‘बाबा की आरती का समय निकट आ रहा है। आज्ञा हो, तो ग़ाडी को पहले आश्रम की ओर ले चलूं। ठहरने की व्यवस्था बाद में कर लेंगे।’ ग़ाडीवान ने प्रस्तावित किया। योगिराज बोले, ‘बहुत ही उत्तम विचार है। हम अभी सीधे आश्रम में जाकर आरती का आनंद लेंगे।’ ग़ाडीवान ने आश्रम की दिशा में ग़ाडी को म़ोडा। सभी के हृदयों में एक सुखद अनुभूति का अनुभव हो रहा था।
आश्रम के निकट अपार जनसमुदाय स्वामी के दर्शनों की लालसा में इधरउधर भाग रहा था। महाप्रभु नम्मालवार प्रतिदिन की भांति आज भी इमली के वृक्ष के नीचे विराजमान थे। श्रद्धालुआें में उनके चरण छूने की ह़ोड लगी हुई थी। मृदंग एवं मंजीरों की ध्वनि पर आरती गान मुखरित हो रहा था। ‘गुरुदेव की जय’, ‘सद्गोपा की जय’ एवं ‘मायों भगवान की जय’ के नारों से सम्पूर्ण वातावरण गूंज रहा था। मंदिर के परिसर में छोटीछोटी दुकानें फूलमालाआें, मिठाईयों एवं संत नम्मालवार के चित्रों की बिक्री के निमित्त लगी हुई थीं। छोटे बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले सजाए गए थे। चतुर्दिक हर्षोल्लास का वातावरण था। गुरुपूर्णिमा के उत्सव का प्रबंध बाबा के प्रिय शिष्य मधुर कवि के हाथों सौंपा गया था, जो संपूर्ण व्यवस्था को सुचालित करने के लिए इधरउधर द़ौड रहे थे।
ग़ाडीवान ने आश्रम से थ़ोडी दूर पर लाकर ग़ाडी रोकी। शीघ्रता के साथ योगिराज एवं मातरी मां ग़ाडी से उतरकर नीचे आए। मातरी मां ने ग़ाडीवान के हाथ में दो दीनार रखे और आभार प्रकट करते हुए उससे विदा ली। आश्रम के चतुर्दिक व्याप्त गहमागहमी को देखते हुए मातरी मां ने थ़ोडी देर तक दूर ख़डा रहना ही उचित समझा। अचानक उनकी दृष्टि मधुर कवि पर प़डी। वे संत नम्मालवार (बाबा) के साथ एक दो बार मदुराई आ चुके थे। मातरी मां से उनका परिचय भी मदुराई में ही हुआ था। योगिराज को वहीं ख़डा कर मातरी स्वयं भ़ीड में मधुर कवि की ओर ब़ढीं। मधुर कवि ने भी मातरी को दूर से अपनी ओर आते देखा। वह लपक कर उसी ओर ब़ढे। मधुर कवि को आता देख लोग मार्ग से तनिक हट कर ख़डे हो गए। मातरी मां ने मधुर कवि को अभिवानदन किया और दूर ले जाकर योगिराज से परिचय करवाया। मधुर कवि ने ब़डे आदर के साथ योगिराज को गले लगाया और तीनों ने मिलकर बाबा के दर्शनार्थ इमली के वृक्ष की दिशा में प्रस्थान किया।
संत नम्मालवार (बाबा) नित्य की भांति शांत भाव से इमली के वृक्ष के नीचे रखे आसन पर विराजमान थे। यदाकदा अभयमुद्रा में दाहिना हाथ उठाकर वह भक्तजनों को आशीर्वाद देते और पुन: ध्यानस्थ हो जाते। मधुर कवि ने निकट आकर मातरी मां के आगमन की सूचना दी। तभी मातरी द़ौडकर बाबा के चरणों में जा गिरी। बाबा ने आशीर्वचन देते हुए अपना दाहिना हाथ मातरी के सिर पर रखा। तत्पश्चात योगिराज की ओर निहारते हुए बाबा ने मातरी से प्रश्न किया, ‘मातरी, तुम्हारे साथ भगवा वस्त्र धारण किये हुए महात्मा कौन हैं ? कहां से पधारे हैं ?’ ‘स्वामी, यह महान योगी वज्रनाभ हैं। मथुरा नगरी से कुछ समय पूर्व मदुराई पधारे थे। बहुत पहुंचे हुए सिद्ध हैं। पांड्य नरेश की राजकुमारी को असाध्य रोग से क्षणों में मुक्त कराना योगिराज का एक महान चमत्कार था, जिसको सर्वत्र सराहा गया है। स्वयं पाड्य नरेश भी योगिराज को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। राजकुमार ने तो योगिराज से दीक्षा भी ली है।’ योगिराज जो अभी तक मूक दर्शक के रूप में मातरी मां के पीछे ख़डे थे, बाबा के चरणों की ओर लपके। बाबा ने आसन से उठकर योगिराज को गले लगाया और मधुर कवि को उनके ठहरने आदि की समुचित व्यवस्था करने के आदेश दिये। तत्पश्चात वह समाधि में चले गए। गुरुपूर्णिमा का उत्सव ब़डी धूमधाम से मनाया गया। देर रात तक बाबा के श्रद्धालुआें का तांता लगा रहा। सभी ने बाबा के दर्शनों का लाभ उठाया और अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये।
