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(गतांक से आगे) गोपाल रथ४०

Swatantra Vaartha  Sun, 21 Mar 2010, IST

(गतांक से आगे) गोपाल रथ४०

मधुर कवि ने आश्रम के निकट ही दो कमरे सेवकों से कहकर खुलवा दिये थे, जहां एक में योगिराज ने और दूसरे में मातरी मां ने अपना सामान रख लिया। कई दिनों की थकान के कारण मातरी मां लेटते ही सो गईं, लेकिन योगिराज की आंखों में नींद नहीं थी। उनके मस्तिष्क में विचारों का झंझावत उठ रहा था। संत नम्मालवार से मिलने का उनका उद्देश्य क्या है ? वह क्या प्रश्न पूछेंगे ? अपने ‘पंचवीर’ मत के प्रचार एवं प्रसार में वह संत नम्मालवार से किस प्रकार का सहयोग प्राप्त करना चाहेंगे ? विचारों की इस ऊहापोह में योगिराज को देर रात तक नींद नहीं आयी।

दूसरे दिन प्रात: मातरी मां ने बाहर से आवाज दी, ‘स्वामी, बाबा के दर्शनों के लिए चलना है। मधुर कवि आते ही होंगे।’ योगिराज अपनी नित्यक्रियाआें से निवृत्त होकर बाहर आए। बाबा के दर्शनों की लालसा मन में हिलोरें ले रही थी। थ़ोडी ही देर में मधुर कवि भी वहां आ पहुंचे। तीनों ने मिलकर आश्रम की ओर प्रस्थान किया। योगिराज ने दूर से देखा कि बाबा इमली के वृक्ष के नीचे पद्‌मासन लगाए समाधि में बैठे हैं। गौर वर्ण दुबलीपतली छरहरी काया, आजानु बाहु, सुती हुई लंबी नासिका, उन्नत ललाट एवं ओजस्वी मुखारविन्द को देखकर योगिराज पुलकित हो उठे। उन्होंने मन ही मन बाबा को प्रणाम किया और मातरी मां की ओर देखते हुए कहा, ‘स्वल्पायु में ही बाबा ने परम पद प्राप्त कर लिया है। निश्चय ही उन्होंने घोर तपस्या की होगी।’ ‘बाल्यकाल से ही बाबा इसी वृक्ष के नीचे तपस्या में लीन हैं। वह मनुष्य नहीं देवता हैं।’ मातरी ने पलट कर उत्तर दिया। तभी बाबा के शरीर में हलचल हुई। उन्होंने एक पद गुनगुनाया

‘वह दीपक जो रात भर जला और अब भी जल रहा है

अपने प्रियतम (पेरुमान) के प्रेम में अंतिम सासें गिन रहा है

संभवत: वह भी मेरी ही भांति दु:खी है ?

यह प्यारजनित प़ीडा ही तो है, जो उसे बुझने नहीं दे रही है ?’

मधुर कवि ने तत्काल उस पद को लिपिबद्ध किया। योगिराज ने जैसे ही पद को सुना तो उनके नेत्रों से अश्रु धारा बह निकली। वह सिसकसिसक कर रोने लगे। मधुर कवि को कुछ समझ में नहीं आया। वह स्तब्ध ख़डे रह गए। उन्हें चकित देखकर मातरी मां धीरे से बोलीं, ‘मधुर जी, योगिराज भावविभोर हो गए हैं। यह उनके हर्षातिरेक में निकले हुए आंसू हैं। आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।’

योगिराज को रोता देखकर मधुर कवि के हृदय में एक गहरी शंका घर कर गयी थी। वह समझ गए थे कि मातरी मां के साथ आए हुए महात्मा उच्च कोटि के संत हैं, यद्यपि वह अपनी वास्तविकता प्रकट नहीं होने देते। सभी कुछ सामान्य होने के उपरांत मधुर कवि ने ब़डी आत्मीयता के साथ योगिराज से प्रश्न किया, ‘महात्मन्‌ भगवान नम्मालवार का पद सुनकर आप फूटफूटकर रोने लगे थे। इसका क्या कारण है ?’ मधुर कवि का प्रश्न सुनकर योगिराज थ़ोडा मुस्कराए ओर बोले, ‘कविराज, यही रहस्य समझने के लिए तो मैं बाबा के पास आया हूं। बाबा के अंतर में मायों से मिलने की छटपटाहट, मायों से न मिल पाने की कसक एवं तज्जन्य प़ीडा उन्हें व्याकुल किये हुए है। वही प़ीडा, वही छटपटाहट और वही कसक मेरे हृदय में भी विद्यमान है। प्राचीन कहावत है, ‘घायल की गति घायल जाने’ अर्थात हम दोनों का दर्द एक है। जब दु:खती हुई रग में कोई उंगली रख देता है तो आंसुआें का निकलना स्वाभाविक है। मेरे रोने का भी यही कारण था।’ ‘तो क्या आप भी कवि हैं ?’ मधुर कवि ने पूछा। ‘नहीं, मैं कवि नहीं हूं, परंतु कविता के मर्म को भली भांति समझता हूं।’ योगिराज ने उत्तर दिया।

बाबा की समाधि का समय समाप्त हुआ। उन्होंने आंखें खोलीं तो अपने समक्ष मधुर कवि, मातरी मां एवं योगिराज को बैठे हुए पाया। मातरी मां की कुशलक्षेम पूछने के पश्चात्‌ बाबा ने योगिराज की तरफ देखते हुए कहा, ‘आपके यहां आने से हमें प्रसन्नता है। हमारी इच्छा है कि आप कुछ समय हमारे आश्रम में रहकर हमें अनुग्रहीत करें।’ योगिराज प्रसन्न मुद्रा में बोले, ‘यह तो मेरा सौभाग्य ही होगा कि मैं आश्रम में रहकर आपके सान्निध्य का लाभ उठा सकूं।’ मातरी मां ने बीच में टोकते हुए कहा, ‘योगिराज, मुझे यहां से चले जाने के लिए मत कहिएगा। मैं यहीं रहकर आप महापुरुषों की सेवा का आनंद उठाऊंगी।’ यह सुनकर बाबा मुस्कराए और बोले, ‘भला मातरी को यहां से कौन जाने देगा ? बहुत दिनों तक पांड्‌य नरेश के लिए घी बनाकर भेजा हैैै, अब कुछ हमारे लिए भी बनाइए, ताकि हम लोग भी उसका भोग लगा सकें।’ यह सुनकर सभी लोग हंस प़डे। मातरी मां ने कहा, ‘स्वामी मेरा बनाया हुआ घी यदि आप ने खा लिया तो मैं समझूंगी कि उसे स्वयं भगवान ने पा लिया।’

संत नम्मालवार (बाबा) जब भी अवकाश मिलता, तो योगिराज को बुला भेजते। मधुर कवि अहर्निश बाबा के साथ ही रहते थे। बाबा के विनोदी स्वभाव ने योगिराज का मन जीत लिया था। उनका मन तो बाबा को छ़ोडने को करता ही नहीं था। फिर भी, बाबा की दिनचर्या के अनुरूप ही उनसे मिला जा सकता था। प्राय: संध्या के समय ही बाबा के दर्शन होते और सत्संग का अवसर प्राप्त होता। योगिराज के साथ मातरी मां एवं मधुर कवि भी सत्संग में भाग लेतेथे। यदाकदा कुरुगूर के भक्तगण बाबा के दर्शनों की लालसा में खिंचे चले आते और सत्संग का लाभ उठाते।

नित्य की भांति बाबा का दरबार लगा हुआ था। बाबा के श्रीमुख से निकले हुए वचनों को सुनने के लिए सभी उत्सुक थे। तभी योगिराज ने अवसर के अनुरूप बाबा से प्रश्न किया

योगिराज ‘भगवान दक्षिण भारत में वैष्णव सम्प्रदाय की नींव कब और कैसे प़डी? आप तो आलवार संतों के सिरमौर हैं। क्या हमें इस विषय में कुछ बतलाने का कष्ट करेंगे ?’

संत नम्मालवार (बाबा) ‘इस संबंध में स्पष्ट रूप से कुछ कहना कठिन है। आदिकाल से ही तमिल कवियों की रचनाआें में भगवान विष्णु का वर्णन किसी न किसी रूप में मिलता अवश्य है। कभी ‘मुरुकन’ तो कभी ‘तिरुमाल’ और कभी ‘वेंकट’ आदि नामों से उनका वर्णन किया गया है। दक्षिण के राज्यों, विशेषकर पांड्‌य एवं पल्लव नरेशों की राजसभाआें में उत्तर भारत से चारणों के आने की प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है। रामायण, महाभारत, भगवद्‌गीता एवं हरिवंश पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों का मौखिक वर्णन करने के लिए चारणों को पुरस्कृत किया जाता रहा है। यदाकदा तत्संबंधी नाटकों के मंचन तो आज भी राजसभाआें में होते रहते हैं। अभी कुछ समय पूर्व जब हम पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम में थे, तो वहां संस्कृत भाषा के महान नाटककार भास के ‘बालचरित’ नाटक को पल्लवराज के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, जिसमें भगवान कृष्ण की बाललीलाआें का अत्यन्त मधुर एवं मार्मिक पक्ष देखने को मिलता है। इन सबके अतिरिक्त, उत्तर भारत के जैन, बौद्ध एवं वैदिक धमा] के प्रचाार एवं प्रसार के निमित्त उनके धर्मप्रचारकों का आवागमन तो प्राचीन युग से होता चला आ रहा है। अत: संगमयुग के प्रारंभ से ही विष्णु के व्यूहों तथा विभवों का वर्णन प्राप्त होने लगता है। जहां तक आलवार संतों की परंपरा का प्रश्न है, तो वह पुरातन काल से ही दक्षिण भारत में, विशेषकर पांड्‌य देश में प्रचलित है। मुझसे पूर्व अनेक आलवार संतों का जन्म हो चुका है, जिनमें पेइ, पुतत्त (भूतम्‌) पोइकई आदि प्रमुख हैं। भविष्य में भी कितने ही वैष्णव संत अवतरित होंगे, जिनकी मधुर रचनाआें द्वारा ज्ञान की उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहेगी।’ इतना कहकर संत नम्मालवार शांत हो गए। योगिराज ने पुन: प्रश्न किया

योगिराज ‘स्वामी, दक्षिण की जनजातियों के आराध्य देव तो मायों है। यहां के लोग प्राय: मायों की उपासना करते हैं। मायों का वैष्णव मत से क्या संबंध है ?’

संत नम्मालवार ‘बंधुवर, ‘मायों’, ‘मायन’, ‘मायावन’ एवं ‘माल’ शब्द कृष्ण के पर्यायवाची हैं। तमिल भाषा में ‘मा’ शब्द का अर्थ ‘काला’ अर्थात कृष्ण होता है। इसी प्रकार दक्षिण के मायों और मथुरा के कृष्ण के रूपरंग एवं आचरण में गहरी समानता है। अंतर केवल इतना है कि मायों दक्षिण की जनजातीय संस्कृति से संबद्ध हैं। उनके क्रियाकलाप, जैसे कुरवई नृत्य, पिन्नई द्वारा लाए गए बैलों को पछ़ाडकर उसको वरण करना तथा कुरुंतु वृक्ष को त़ोडना आदि दक्षिण में प्रचलित मान्यताआें के अनुरूप हैं। गोकुल में जन्में कृष्ण की लीलाआें में इनका उल्लेख नहीं मिलता।’

योगिराज ‘महात्मन्‌, मदुराई में मातरी मां के आश्रम में मैंने गांव के मुखिया की पुत्री के विवाह के समय बैलों को पछ़ाडने की प्रथा एवं तत्पश्चात कुरवई नृत्य तो देखे हैं, किंतु कुरुंतु वृक्ष को त़ोडने का क्या प्रयोजन है ? कृपया बतलाने का कष्ट करें ?’ संत नम्मालवार नेत्र बंद किये हुए कुछ देर तक चुपचाप बैठे रहे, मानों वह समस्या का समाधान ढ़ूंढ रहे हों। तत्पश्चात वह बोले

संत नम्मालवार ‘योगिराज, तमिल देश की एक अत्यन्त प्राचीन प्रथा के अनुसार माघ माह में कुमारी ल़डकियां भोर होते ही नदी में स्नान करने के लिए जाती हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से उनको स्वेच्छा के अनुरूप पति प्राप्त होता है। कहा जाता है कि एक समय जब बालाएं स्नान करने के निमित्त पानी में उतरीं तभी मायों ने पीछे से आकर उनके वस्त्र हरण कर लिए और कुरुंतु वृक्ष के ऊपर जा बैठे। कुमारियों के अनुनयविनय के उपरांत मायों ने कुरुंतु वृक्ष की शाखाआें को नीचे की ओर झुका दिया, ताकि कुमारियां उस वृक्ष के पल्लव त़ोडकर वस्त्र के रूप में धारण कर सकें। अत: ‘वस्त्रहरण’ या फिर ‘चीरहरण’ की लीला केवल तमिल देश की संस्कृति से संबद्ध है।’

योगिराज ‘श्रीमन्‌, भगवान की इस अद्‌भुत लीला का रहस्य क्या है ? दक्षिण के वेदान्तियों की इस संबंध में क्या प्रतिक्रिया हुई ?’

संत नम्मालवार ‘भगवान की लीलाआें के पीछे निहित ग़ूढ रहस्य को समझ पाना दुरुह ही नहीं वरन्‌ असंभव है। हम जो भी सोचें या कहेंगे वह केवल हमारा अनुमान ही होगा। वास्तव में देखा जाए तो ‘वस्त्रहरण’ लीला में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। यह तो केवल बालगोपाल की विनोदी प्रकृति को उजागर करती है। इसको अशोभनीय नहीं कहा जा सकता। गोपिकाआें के साथ बालकृष्ण की छ़ेडछ़ाड तो चलती ही रहती थी। रही बात कुरुंतु वृक्ष के पत्तों को पहनने की तो वह प्रथा भी जनजातियों में सनातन काल से चली आ रही है। मथुरा के कृष्ण भी पर्णवेश धारण करने वाले कहे गए हैं। संस्कृत भाषा के महान कवि कालिदास उन्हें पहले ही ‘पर्णवेष विष्णों’ कह चुके हैं। अत: स्पष्ट है कि जनजातियों में पल्लव रूपी वस्त्र धारण करने की प्रथा आदिकाल से ही संपूर्ण भारत में प्रचलित थी। निश्चित रूप से ज्ञानियों के लिए भगवान मायों की इस लीला का रहस्य कुछ भिन्न होगा। उनके लिए ‘चीरहरण’ की लीला का अर्थ आत्मा के ऊपर प़डे हुए कृत्रिम आवरण को हटाकर परमात्मा के सान्निध्य को प्राप्त करना अधिक तर्कसंगत होगा।’

इतना सुनना था कि योगिराज आनंदविभोर हो उठे। उनके नेत्रों से अश्रुधार बह निकली। ‘धन्य है दक्षिण के आलवार और उनकी अनन्य भक्ति।’ योगिराज ने मन ही मन सराहा। मधुर कवि एवं मातरी मां भी प्रेमविह्वल हो उठे। आश्रम के चतुर्दिक एकत्रित जनसमूह ने ‘भगवान मायों की जय’ के नारे लगाए। सर्वत्र हर्ष एवं उल्लास की लहर द़ौड गयी।

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