कविता वाचक्नवी की पांच कविताएं
न सोने वाली औरतों
कभी पूरी नींद तक भी
न सोने वाली औरतों !
मेरे पास आओ,
दर्पण है मेरे पास
जो दिखाता है
कि अक्सर फिर भी
औरतों की आंखें
खूबसूरत होती क्यों हैं,
चीखोंचिल्लाहटों भरे
बंद मुंह भी
कैसे मुस्कुरा लेते हैं इतना,
और, आप !
जरा गौर से देखिए
सुराहीदार गर्दन के
पारदर्शी चम़डे
के नीचे
लाल से नीले
और नीले से हरे
उंगलियों के निशान
चुन्नियों में लिपटे
बुर्कों से ढंके
आंचलों में सिमटे
नंगई संवारते हैं।
टूटे पुलों के छोरों पर
तूफान पार करने की
उम्मीद लगायी औरतों !
जमीन धसक रही है
पह़ाड दरक गये हैं
बह गयी हैं चौकियां
शाखें लगातार कांपती गिर रही हैं
जंगल
दलदल बन गये हैं
पानी लगातार तुम्हारे डूबने की
साजिशों में लगा है,
अंधेरे ने छीन ली है भले
आंखों की देख
पर मेरे पास
अभी भी बचा है
एक दर्पण
चमकीला।
सूर्य नमस्कार
झिर्रियों की धूप
देती है आभास
बाहर
उग गया है सूर्य।
कुछ पल
लुकेछिपे, बंद झरोखों
दरारों से
झांक लेगा
किसी एक कोने, नुक्क़ड, किनारे।
अंधेरी कोठरियों के वासी
रहेंगे ठिठुरते ही
कांपते ही
त़डफ़डाते ही।
हड्िडयों तक
बर्फ जमे लोग
कैसे करें
सूर्यनमस्कार ?
छांह में झुलसे जले
एक साया
तमतमाया
बोलता
लो तप जरा
और हम
प़ेडों तले भी
छांह में
झुलसे जले
साथ सोए स्वप्न को
पलपल झिंझ़ोडा,
देखा उनींदी आंख से,
औ’ सकपकाए।
बांह धर कर
स्वप्न ने
कुछ पास खींचा,
आंख का
अंजन नहीं हूं
स्वप्न हूं
मत आंख खोलो।
कल्पदर्शी चक्षु का
अविराम नर्तन
तरलता के बीच
पलपल
थिरकता है
और छाया को
तपन के
त़ाडनों से
हेरता है।
बांहें
कल्पवृक्ष की शाखा सी
भुजा
होती यदि मेरी
कल्पकल्पांतर में
काल के भाल को
अलकनंदा की गोद में भर
बना लेती अपना
रावी और ताप्ती के
अजस्र प्रवाह में
पखार देती
काल के गतिमान पांव।
कलकल करती ब्रह्मपुत्र के
रूप विकराल में
कलिकाल
तिरती वांछाआें की
छिदी नौकाएं ले
ढ़ूंढता दो हाथ वाली
मेरी बांहें।
तू क्या रोंदे
जब थी
चार बरस की
बुआ लाईगु़डया
मिट्टी की।
मैंने संग सुलाया
त़डके
संग
नहलाया।
धोतेमलते
हो गयी
गु़डया कीच़ड
बह गयी
जलप्लावन में
जलधारा में।
आज,
वे मुझे
औरऔर मांजते हैं
चाहते हैं
भीतरबाहर
धुल देना
पुनीत कर देना।
कीचती जाती हूं
औरऔर
धुलाधुली में
बहे जाती हूं
जलधारा में
गलगल।
कीच़ड खोखो
बह जाऊं तो
धुल जाऊंगी ?
कहो, खिल़ाडी
कहो खिल़ाडी !
