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टोकाटोकी

Swatantra Vaartha  Sun, 11 Jul 2010, IST

टोकाटोकी

पेन (कलम), कागज और पुस्तक ये तीन आदर्श समुदाय का निर्माण करते हैं। ये ही तीन चाहिए लेखक बनने के लिए। यहां पुस्तक का अर्थ है कोई भी ‘पाठ’। ‘कुछ’ चाहिए। ‘आधार’ चाहिए। निराधार क्यों रहा जाए ? दुनिया का महानत नाटककार शेक्सपीयर अपने एक नाटक ‘किंग लीयर’ में मुख्य पात्र से कहलवाता है नथिंग विल कम ऑफ नथिंग’ अर्थात ‘कुछ नहीं से कुछ नहीं होता।’ इस सूक्ति को नवलेखकों के लिए मैंने उलट कर प्रस्तुत किया है ‘सम थिंग विल कम फ्रोम समथिंग ।’ ‘कुछ से और कुछ आएगा। आप कहेंगे ‘ब़डी अच्छी बात कही।’ अच्छी बात है मगर पूर्णतः मौलिक नहीं। एक कहावत पहले से ही मौजूद है ‘समथिंग इज बैटर दैन नथिंग’ (‘कुछ कुछ नहीं से बेहतर है।’)

लेखक वर्ग में यह एक आम शिकायत रही है कि जब भी वे किसी विचार के आधार पर कुछ लिखने बैठते हैं, तो एक बारगी उनके सामने रखा ‘खाली पेज’ उन्हें विचलित कर देता है। सब कुछ भूल जाते हैं, वे कुछ देर के लिए। इसका इलाज वे अपनी तरह से करते हैं। हर स्थापित लेखक ऐसे क्षणों में कुछ अनूठा करता है। बाद में उनकी ये आदतें किंवदांति बन जाती हैं।

नवलेखक के सामने खाली सफेद कागज और हाथ में कलम भी है, तो क्या जरूरी है कि मन में आए विचार लेखनीबद्ध हो ही जाएं। जब ऐसा नहीं होता तो कुछ तरकीब ल़डानी होगी। हम ऐसी स्थिति से उबरने के लिए एक सुझाव दिया करते हैं। ‘अपने सामने कोई ‘पाठ’ क्यों नहीं रख लेते ? कोई कविता, कहानी, अनुच्छेद रख लें और फिर उसे प़ढते हुए अपनी प्रतिक्रिया स्वरूप लिखना शुरू करे। शब्ददरशब्द, वाक्य दर वाक्य आगे इस तरह आते चले जाएंगे जैसे मशीन से पॉपकार्न। और यदि आपकी प्रतिक्रिया असरदार है, तो बात बन जाएगी।

किसी अंग्रेजी समालोचक ने कहीं लिखा है राइटिंग इज रीडिंगरिएक्टिंग । किसी ‘पाठ’ को प़ढने के साथसाथ जब आप अपने विचारों को लेखनीबद्ध करते चले जाते हैं, तो एक नया पाठ तैयार होता है। पहले भी हमने आपको इशारा किया था। ‘पाठ’ ब़डा है या छोटा है, इससे फर्क नहीं प़डता। ‘कैटलिस्ट’ की चर्चा ईलियट ने किसी अन्य संदर्भ में की थी और ‘टचस्टोन’ की आर्नल्ड ने किसी अन्य संदर्भ में, फिर भी नव लेखक इन पारिभाषिक शब्दों से अपने मतलब की सीख ले ले तो क्या हर्ज है ?

यह होगा कैसे ? ब़डा आसान है। एक तरीका तो यह है कि पहले सामने रखे ‘पाठ’ के इर्दगिर्द खाली प़डे स्थान पर हाशिए पर आप अपने विचार लिखें। किसी प्रोफेसर की कक्षा में बैठे छात्र पाढ्य पुस्तक के इर्द गिर्द लिखते चले जाते हैं और बाद में उसी लेखन के आधार पर परीक्षा के लिए नोटिस बना लेते हैं। ठीक ऐसा ही नव लेखक भी कर सकता है।

किसी पाठ को प़ढते समय जो कुछ लिखा जाता है, उसे ‘टीका’ या ‘टिप्पणी’ कहते हैं। कभीकभी हम किसी व्यक्ति को कह देते हैं बहुत टीका, टिप्पणी करता है। टीकाटिप्पणी करना हमारा स्वभाव है। लेखक के लिए ऐसा करना इतना जरूरी है जैसे लक़डहारे के लिए कुल्ह़ाडी और रसोइए के लिए कलछी।

ब़डेब़डे लेखक टीकाकार हुए हैं। शुक्ल जी का इतिहास क्या है ? किसी ग्रंथ की भूमिका मात्र और इसे तैयार करने के लिए उनके सामने पाठ था मिश्र बंधुआें का लेखन। इमर्सन (१८०३१८८२) एक आदर्श टीकाकार रहे हैं। वे अपनी टीकाआें को हाशिए पर नहीं अलग से कॉपियों में लिखा करते थे। वे खुद को ‘सर्जनात्मक पाठक’ (क्रिसटिव रीडर) कहा करते थे। वे जीवन पर्यन्त इसी तरह लिखते रहे। एक युवा नव लेखक को उन्होंने सलाह देते हुए कहा था ‘अपने आपको लेखक बनाने के लिए केवल प़ढो।’ (‘ओनली रीड टू स्टार्ट योर ओन टीम) करके देखें। अभी तक आपने प़ढने के लिए प़ढा होगा, आनंद के लिए प़ढा होगा, परीक्षा के लिए प़ढा होगा। लेखक बनना चाहते हैं, तो लिखने के लिए प़ढो। साथसाथ दोनों कार्य चलें। प़ढने के साथ लिखना भी रहे। सामने विभिन्न ‘पाठ’ रहें। आपके लिखने की मेज एक ‘कार्यशाला’हो जाए।

पहले भी लिखते रहे हैं, तो आप इस तरह के लेखन के उपरान्त एक अंतर अनुभव अवश्य करेंगे। आपको आत्मविश्वास प्राप्त होगा। पुराने पाठों से नए पाठ के निर्माण की इस ‘अंतरपाठीयता’ कहलाने योग्य प्रविधि को आज समस्त विश्व में अपनाया जा रहा है। अब आगे आपकी मर्जी। व्हिटमैन कहा करते थे कि एक तो वे अपने काम के प्रति कभी लापरवाह नहीं रहे। दूसरे उन्होंने कभी कोई चीज थोपी नहीं (‘नेवर फोर्स्ड एनी थिंग’)। खुद पर भी नहीं। हम में से कितने लोग होंगे जो एक ही पुस्तक को काटने छांटने सजानेसंवारने सुधारने में पैंतीस वर्ष लगा दे?

तो फिर टोकाटाकी, टीकाटिप्पणी, पर क्षिद्राणवेषण आलोचनासमालोचना से शुरुआत करें। नवलेखक से यह अपेक्षा अवश्य की जाती है कि वह प्रकाशन से पूर्व अपनी हर रचना पर अपने मित्रों, शुभचिंतकों, अग्रजों और सुधीपाठकों का अभिमत अवश्य ले लें। एकदम से कालजयी रचनाकार बन जाने की चेष्टा न करें। कालजयी रचना का युग यह नहीं है। आज कोई ‘रामायण’ नहीं लिखी जा सकती। हां, रामानंद सागर जैसे पंडित एक नहीं अनेक बार उसकी पुनः प्रस्तुति कर सकते हैं। बात में दम होगा तो बात खुदबखुद बोलेगी। इसलिए रचना को बोलने दें, खुद कम बोलें। कहा भी है। ‘बात बोलेगी, हम नहीं।

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