ADVERTISEMENT

आपका वोट

क्या राहुल गांधी भ्रष्टाचार खत्म करेंगे?

  • सही
  • गलत
  • पता नहीं
और भी

फोटो दीर्घा

Share

जाने दो साऽऽब !

Swatantra Vaartha  Sun, 11 Jul 2010, IST

जाने दो साऽऽब !

‘मूं पे गिरना बोले तो क्या रे ?’ बोलके जामल साब पूछे !

उनके सवालां बेमौसम बरसात के जैसे रहते ! और कब ? क्यों ? किसकू ? और कित्ती देर धुनक के जाते की समझ में नै आता !

हम एक दूसरे के थोप़डे देख के चुपचाप ख़डे हो गये !

तो उनो फिर जोर से गुर्राये

‘क्यों रे फाल्तू के ? बहरे हो गये क्या रे हौलोंऽऽ !’ बोलके आंख्या घुमाके फिर वोईच सवाल दोहराये !

मैं पैदाइशी शांति दूत !

लेकिन हमारे लोगां मेरे ‘फीलिंग्स’ नै समझते !

‘लेव्‌ ! सुनोऽऽ ! गांधी जी बातां कर्रेऽऽ’ बोलके च़िढाते !

अब जमाल साब ‘मूं पे गिरना’ ऐसे सवालां कैकू पूछना ! उनो बैठे तो उठ नै सकते !

उठे तो बैठ नै सकते!

कुत्ते, चोट्‌टे पीछे प़डे तो भागना तो छ़ोडो फटाफट चल भी नै सकते ! हमारे गांव के ‘गांधी चौक’ में केले के छिलके पे फिसल के गिरे तो ‘नेहरू चौक’ तक ‘ट्रॉफिक जाम’ हो गया !

उनका अग़डबंब भारी पर्सनालिटी कू कौन उठा सकता बोलके ? हम लोगां भाग के गये !

इधर से खींचे ! उधर से खींचे !

मैं इधर और भुकया उधर गिर गये !

लेकिन जमाल साब एक ‘ईंच’ भी नै हिले !

उत्ते लोल्ली में भी हमारे रेड्‌डी साब हमारे कानां पक़ड के ‘अबेऽऽ ! हौलोंऽऽ ! मैट्रिक सिस्टम है ! अभ्भी भी ईंचा, मैलां, फुटां, बोलरे क्या रे ? सेंटीमीटर, किलोमीटर नै मालूम क्या रे फाल्तू के ? जमाल साब बोले तो क्या वेंकटी मास्टर की लंग़डी भैंस समझे क्या रे ? जाव्‌ ! भागो ! क्रेन लेके आव्‌’ बोलके चिल्लाये !

भ़ीड में से कोई तो भी फुसफुसाया

‘सुने साबऽऽ ! रेड्‌डी साब के पॉलीट्रिक्सां ? ये बिचारे इस मोटे कू उठाने आये तो मैट्रिक सिस्टम सुनारे ! और भोत शान से इस मोटे कू लंग़डी भैंस भी बोलरे ! खुद मेट्रिक फेल लेकिन बातां पीएचडी के ! कैसा सुधरींगा ये देश ?’

उसकू भ़ीड में से ही जवाब मिला !

क्या साऽऽब ? देश कू क्या हो गया! अच्छाच है ! तुम लोगांच सुधरो जरा ! रात में जंगल काटते ! दिन में लोगों कू काटते !’

हम चमक गये!

जमाल साब तो छिलके पे फिसले !

लोगां ‘फीलिंग्स’ पे फिसलरे थे !

आजकल हर चीज में पॉलिटिक्स’ घुसरे !

उप्पर बैठे सो ब़डे लोगां ‘पेट्रोलडीझलकिरोसिनग्यास’ कू आसमान तक ब़ढा के लेके गये !

नीचे वाले फौरन ‘बंद’ शुरू किये !

घर में बेचैनी कू तंग आके ‘सेठां’ दुकानां, शहरां खोलके बैठे तो जोरजोर से लोल्लियां करके ‘अबे ओ मोटेऽऽ ! बंद है बंद ! चल गिराव्‌ शटर ! बंद कर दुकान !’

एक पत्थर ‘भिर्रर्र’ बोलके आया तो २३ हजार का नुकसान ! पत्थरां डिक्की में भर के लीडरां गायब हो जाते!

लाठियों के शिकार ‘तमाशा’ देखने वालेच हो जाते !

आफतां तो गरीबों केच !

बंद रहे तो भी परेशान उनोच !

खुल्ला रहे तो भी परेशान उनोच !

फिर ? कौन है ये गरीब ?

जो पैसे नै रहे तो भी बीडियां, सिगरेटां पीते !

चोरी छुपे मटका खेलते!

मौका देख के थ़ोडी ‘अंगूर’ की पीते!

और फिर ल़डख़डाते हुए ख़डे रह के सोब कू फुल्ल धुनकते ! वो भी ‘ब्यूटिफुल पोथेटिक लॉन्ग्वेज’ से !

एक बार हमारे चाचा ने सुनाया

‘मरद तो मुछयाल, बंको, नैन बंकी गोरिया।

सुरहल तो सिंगाल बंकी, पौड बंकी घो़डया।।’

फिर हमारे परेशान थोप़डे देखके खुद भी परेशान हो गये ! बगैर मतलब समझे शेरां सुनाये तो ऐसाच होता !

‘मर्द बोले तो मुच्छियां रहना! औरत के आंख्या बांके रहना ! गाय सिंगों वाली रहना और घ़ोडी भी तंदुरुस्त रहना !’

चाचा की शायरी सुनके चाची चमक गयी !

तब तक मामू भी जोश में आये और शायरी मेच जवाब दिये !

‘मरद जो जब्बान बंको,

कूख बंकी गोरिया।

सुरहल तो दुधार बंकी,

तेज बंकी घो़डया।।’

‘मर्द वहीं है जो जुबन का पक्का हैऔर नारी वीर प्रसविनी। दूध भोत देने वाली गाय अच्छी। और तेज द़ौडने वाली घ़ोडी अच्छी।’

मामू की शायरी सुनके मामी भी चमक गयी ! फिर दोनों एकदम ‘काव्‌ काव्‌’ करने लगे

‘क्या फाल्तू की शेरशायरी सुनारे जी ! आं ! दोदो फूट के मुच्छियां रह के जमाल साब हिते नै डुलते नै ! तुम लोगां तो सफाचट ! और क्या बोले ? औरतों को और कुछ कामां नै क्या ? दूध देने वाली गाय अच्छी ? तो मुखयार के ठेले पे ‘कट चायां’ कैकू गिटकते ? वो भी फुकट की? और क्या बोले ? घ़ोडी के जैसा तेज द़ौडना ! हौ ! ये बात अच्छी है ! जाव्‌ ! भाग के मार्केट में से आलूप्याज लेके आव्‌ ! जाव्‌ !’

चाचा मामू करेंट का झटका लगे जैसा गायब हो गये ! जमाल साब भी अजीब ढंग से चलते हुए खिसक गये !

जमाल साब भी अजीब ढंग से चलते हुए खिसक ये !

बाद में भुकया खबर लाया !

‘अरेऽऽ ! टपरी में कट चाय पीरे अपने शायरां ! इत्ते जल्दी घर कू लौटने का भरोसा नेऽऽ !’

बंबोली बबन्या उसके खास स्टाइल में सुनाया

‘शायरों की फलटन फुकट में भागेला

उप्पर नक्को बोले तो भी लीडरां ‘यात्राएं’ निकालेलाऽऽ

इधर बारिश की लोल्लीऽऽ उधर बंद की लोल्लीऽऽ

अपने भारत महान में ‘गरीब’ कैसा जियेलाऽऽ’

मैं ‘वाहवाऽऽ’ बोलते बोलते रखमी कू देखके मूं बंद कर लिया !

‘अईऽऽ ! अजीबीच होरा यहां ! ‘बंद’ बोले तो अपना ‘नल’ भी बंद हो जाता क्या रे ? जरा उप्पर थोप़डे करके बादलों कू ‘बंद’ बोलो ना रेऽऽ !’

बोली ! बादलां बरसना किसके हाथ में है बोलके ? लीडरों की ‘सद्‌भावना यात्राएं’ किसको समझ में आरे बोलके ?

रखमी के ब़डेब़डे आंख्या देख के मैं दिलमेच गाने लगा ‘बरसो रे मेघा मेघा’ बोलके ! रखमी मेरे तरफ अजीब ढंग से देख के बोली ‘अईऽऽ ! येडे के जैसा दे खरा क्या रेऽऽ !’ बोलके !

इस देश में ‘येडे’ भोत है ! उनो बरसना शुरू करे तो लीडरों का क्या होईंगा ? क्या ‘बंद’ करींगे ? क्या ‘चालू’ करींगे ? क्या करते की क्या की? जाने दोसाऽऽब!!!

डॉ जेपी वैद्य

आपकी राय