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जीवन का परमार्थ

Swatantra Vaartha  Sun, 11 Jul 2010, IST

जीवन का परमार्थ

पिछले कई दशकों से आधुनिक तेलुगु कविताओं का अनुवाद हिंदी में प्रचुर मात्रा में हो रहा है। इसी क़डी में सद्‌यः प्रकाशित पुस्तक ‘तेलुगु काव्य प्रभा’(२०१०) हमारे समक्ष है। इसके अनुवाद जी परमेश्वर ने तेलुगु के ५६ कवियों की ५६ कविताओं का अनुवाद प्रस्तुत किया है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कवि डॉ सी नारायण रेड्‌डी, साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत एनगोपी, प्रमुख दलित कवि कत्ति पद्‌माराव और मुस्लिमवादी कवयित्री शाजहाना से लेकर नगागंतुकों तक की कविताओं इस संग्रह में संकलित हैं।

पिछली शताब्दी में तेजी से बदलती प्रवृत्तियों के साथसाथ तेलुगु कविता भी बदली। कवियों ने समसामयिक स्थितियों को सरल भाषा में काव्यात्मकता के साथ अंकित करना आरंभ किया। इस संकलन की कविताएं इस प्रवृत्ति का आइना पेश करती हैं। जी परमेश्वर द्वारा अनूदित इन कविताओं में एक ओर जीवन का सार प्रवाहित है, तो दूसरी ओर दलित का आक्रोश। तेलंगाना की संस्कृति के साथसाथ उपभोक्ता संस्कृति का चित्र भी अंकिता है। इतना ही नहीं प्लेटोनिक प्रेम थी है और पुरुष विमर्श भी।

सिनारे के नाम से प्रसिद्ध डॉ सी नारायण रेड्डी तेलुगु के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि, समीक्षक, शिक्षाविद, गीतकार, चिंतक और वक्ता है। वे किसी वाद के कटघरे में नहीं समाते। वे वस्तुतः मानवतावादी कवि हैं। उनकी कविताआें में मानव जीवन की सूक्ष्म परतें उजागर होती हैं। कवि अपनी कविता ‘मौलिक पाठ’ के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि मात्र सांस लेना ही जीवन नहीं है। मानव मूल्यों की रक्षा के लिए प्राणों को अर्पित करना ही जीवन का परमार्थ है ‘इच्छ्‌वास निःश्वास के संपुट को ही। जीवन समझने के बदले। मानवमूल्यों की रक्षा हित/प्राणों के अर्पण में ही। जन्म चरितार्थ होता है।’(पृ१४)

नलगोंडा जिले में जन्में एनठोपि की कविताआें में मिट्‌टी का सोंधापन है। अपनी कविता ‘स्माइल प्लीज’ के माध्यम से वे कहते हैं कि ‘हंसने को कहने पर हंसी आएगी क्या !/ हंसने के लिए कहते है तो / तुम पर ही हंसने की इच्छा होती है/ किन पता] के नीचे, अंतिम सांसें गिन रही हैं हंसी/ गांव में खोई हुई क्रांति, शहर में जगमगाएगी क्या ?/ कैमरे पर डालकर परदा, हंसने को कहते हो/ तुम्हारे खींचे जाने वाले फोटोग्राफ में/ कितनी रिक्तताएं !!/ भर सकोगे उन्हें ?’ (पृ२६)

गुंटूर जिले में जन्मे क्रांति पद्‌माराव दलित कवियों में प्रमुख हैं। इनकी कविता में पी़डतों और शोषितों की आवाज गूंज उठती है। वे जाति भेद का खंडन करते हैं। भारतीय समाज जाति के नाम पर अमानवीय रीति से बंटा हुआ है। इस भेदभाव को मिटाने के लिए अनेक प्रयास हुए, लेकिन यह आज भी समाज में विद्यमान है। इसी पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कवि अपनी कविता ‘हमारे गांव में मानवता नहीं ’ में कहते हैं कि ‘मेरे गांव के साथ मेरा कुछ बनता नहीं, जमता नहीं/ मुझे तो मेरी बस्ती ही पसंद है/ मानव को जाति भेद की दृष्टि से देखने वाली/ मेरे गांव की आंख/फ़ोडने का मन करता था मेरा/ /गांव के तालाब में जब वह अपनी भैंस को नहलाता था/ तो मुझे सी़ढयों पर च़ढने तक नहीं देता था/आज का गांव /मानवता विहीन, बिफरासांड है/ मानव को मानवसा / न देख पाने वाले, हमारे गांव पर / कभीकभी गाज गिरती है/ इसकी मांसपेशियों के ब़ढने के साथसाथ/ जाति का अंत ब़ढता ही जा रहा है/ गांव और मुहल्लो के बीच/कौटिल्य द्वारा बनाई गई/ लौह दीवार टूट नहीं रही।’

शिखामणी ने अपनी कविता ‘पुतली’ में एक अध़ेड उम्र की भिखारिन की दुर्दशा का वर्णन किया है, जो तपती दुपहरी में स़डक के किनारे अंजलि पसार कर बैठी रहती है ‘तपती दोपहर की घूप में / भ़ीड भरी स़डक के एक कोने में / सदा एक ही मुद्रा में/ आंजलि पसार कर/ एक अंध़ेड उम्र की औरत/ मानव होकर भी वह ठूंठ बन गई है।’ (पृ५३)

कुछ दशकों से स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्ति और स्त्री सशक्तीकरण की बातें सुनाई दे रही हैं। स्त्री अधिकारों के साथ ही पुरुष सोच के बदलाव को भी कुछ कविताआें में लक्षित किया गया है। कोडूरि विजय कुमार ने अपनी कविता में उत्तर आधुनिक पुरुष के इस सोच को दर्शाया है कि संसार के एक ग्राम बन जाने के साथ ही स्त्री पुरुष का भेद भाव समाप्त हो गया है। यह प़ढना ब़डा मनोरंजक लगता है कि कहीं ऐसा करना स्त्री को बुरा न लगे। अर्थात्‌ स्त्री को बाहर के साथसाथ घर की भी जिम्मेदारियां निभाने के लिए बाध्य करने का बहुत सुंदर तर्क उत्तर आधुनिक मदा] ने खोज लिया है ‘जिस दिन नौकरानी नहीं आती है /चौका बासन करने की, कप़डे धोने की बात सोचता हूं/लेकिन ‘तुम्हें यह सब पसंद नहीं होगा’ समझकर चुप हो जाता हूं/ बच्चों के नैपकिन बदलना चाहता हूं, टॉयलट धोना चाहता हूं/ ‘तुम ठीक से नहीं धोते हो’ कहोगी, समझकर चुप रह जाता हूं/ स्त्रियों के समान सुंदर, घर या रसोई का काम/ क्या पुरुष कर सकते हैं, माय डियर !’ (पृ४९)

समसामायिक तेलुगु कविता की एक विशिष्ट प्रवृत्ति के रूप में मुस्लिमवादी कविता उभर कर आई है। परंतु इस संग्रह में शाजहाना, खादर शरीफ शेख और डॉ एस समीउल्लाह की जो कविताएं संकलित हैं, वे इस प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। ऐसा संभवतः इसलिए है कि अनुवादक ने विभिन्न प्रवृत्तियों के प्रतिनिधित्व की दृष्टि से कवियों और कविताआें का चयन नहीं किया है, बल्कि ‘विशेषकर पिछले २००७ से २००९ के बीच (यानि तीन वर्ष) एक रविवारीय अंक में छपी कविताआें को उन्होंने चुना है।’ जैसा कि निखिलेश्वर ने कहा है ‘समकालीन तेलुगु कविताआें का यह एक सामायिक अंश है। अनुवादक को जो भी जंचा और अनुकूल लगा, उन कविताआें को अपना लिया।’

निखिलेश्वर ने अनुवाद की कलम की ल़डख़डाने और शब्द चयन में असावधानी की ओर भी संकेत किया है। मुझे इस संबंध में कुछ नहीं कहना। जैसा की डॉ एम रंगय्या ने इंगित किया है, इस संकलन की उपलब्धि इसके विषय वैविध्य में है, जिसमें प्रेम, गांव, मां, ब़ुढापा, स्वप्न, फूल, कली, धूप, पग़डी, दलित, पुतली, समय, स्वेच्छा, कुशल मंगल और चूने की डिबिया तक न जाने क्याक्या शामिल है।

१२० पृष्ठ की यह अनूदित काव्य कृति ‘कादंबिनी क्लब’, हैदराबाद द्वारा प्रकाशित की गई है। मूल्य के स्थान पर ‘अमूल्य’ अंकित है। डॉ अहिल्या मिश्र के नेतृत्व में ‘कादंबिनी क्लब’ ने अनेक उपलब्धियां अर्जित की है। यह कृति इस क्रम में एक और मील का पत्थर है। यों तो हैदराबाद में हिंदी और तेलुगु के साहित्य को प्रोत्साहित करने वाली अनेक संस्थाएं हैं, लेकिन हिंदी के माध्यम से तेलुगुु कविता को एक अमूल्य पुस्तक के रूप में उपलब्ध कराने का जो अनूठा कार्य ‘कादंबिनी क्लब’ ने किया है, वह अभिनंदनीय भी है और अनुकरणीय भी। आशा है अन्य साहित्यिक संस्थाएं इससे प्रेरणा लेंगी।

डॉ जीनीरजा

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