महिलाएं अपराध की तरफ उन्मुख क्यों
समाज में यह धारणा बनी है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महिलापुरुषों की भागीदारी में प्रतिशत का ब़डा अंतर है। कुछ काम ऐसे रहे हैं, जहां महिलाआें के प्रवेश का प्रतिशत शून्य रहा है। जैसे अपराध का क्षेत्र। इक्कीदुक्की महिलाएं ही अपराधिक काया] में संलग्न होती थी। यूं तो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महिलापुरुष की भागीदारी है। कोई क्षेत्र महिलाआें के लिए भी वर्जित नहीं रहा। पंरतु स्त्री या पुरुष की प्राकृतिक तदनुकूल पारिवारिक और सामाजिक स्थिति भिन्नभिन्न है। इसी भिन्नता के कारण उनकी जिम्मेदारियां भी भिन्न हैं। जैसे स्त्री की प्राकृतिक जिम्मेदारी बच्चा पैदा करना, पारिवारिक जिम्मेदारी बच्चा पालन तथा परिवार चलाना है और इन्हीं दोनों जिम्मेदारियों के कारण उनके अंदर पुरुष की तुलना में अधिक ममता, सहनशीलता, उदारता और सहृदयता है। बच्चों और परिवार की देखरेख में इन गुणों की अधिकता होना आवश्यक माना गया और इन गुणों की प्रधानता के कारण वे रचनात्मक कार्य में अधिक दिखी। विध्वंसक कार्य में नहीं, परंतु किसी काल में स्त्रीपुरुष के कार्यक्षेत्र विभाजित नहीं रहे। अपवाद भी दिखता ही था। महिलाएं भी ठगी, हत्या, चोरी, डकैती में पक़डी जाती रही हैं। आज के समय में पुरुषों के द्वारा हो रहे अपराधों में विविधता और ब़ढोतरी हुई है, तो महिलाएं भी उन काया] में अधिक प्रवृत्त हुई हैं। राजीव गांधी की हत्या में एक आत्मघाती महिला द्वारा कार्य संपन्न होना, पूरे समाज को अचंभित कर गया था। माना जाता है, इस प्रकार के आत्मघाती अपराधियों के परिवार की सुरक्षा और देखरेख की जिम्मेदारी वह संगठन ले लेता है, जिसे किसी की हत्या करानी होती है। परंतु स्त्री तो स्वयं परिवार होती है। उसका ऐसे अपराधों में संलग्नता समाज का मानस झकझोर जाता है। स्त्री के स्वरूप और व्यवहार पर ही प्रश्न चिह्न लगाता है।
यह सच है कि स्त्रियों के अंदर अपराधिक प्रवृति और अपनी रोजीरोटी या समृद्धि के लिए प्रतिस्पर्धी अपराधिक व्यवहार ब़ढे हैं। महिलाआें में ईर्ष्या और द्वेष अधिक होता है। कारण उसकी तीव्र महत्त्वाकांक्षा होती है। वह स्वयं और अपने परिवार को आगे ही आगे देखना चाहती है। इस प्रतिस्पर्धा में आ़डे आने वाली महिला और पुरुष के साथ कठोर व्यवहार करने में इक्कीदूक्की महिलाएं प्रतिद्वंद्वी की हत्या तक कर जाती हैं। घरेलू अपराधों, दहेज हत्या, प्रत़ाडना देना जैसे अपराधों में प्रत्येक कारागार में पिछले पच्चीस वषा] में युवतियों और महिलाआें की संख्या ब़ढी है,परंतु इधर तो डकैती, हत्या, राहजनी, तस्करी और अपहरण, लूटपाट, शॉप लिफ्टिंग और पॉकेटमारी जैसे ब़डेछोटे अपराधों में महिलाआें की संख्या उत्तरोक्तर ब़ढ रही है।
पिछले दिनों एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में ‘अपराध में भी महिला सशक्तिकरण ?’ के नाम से छपी रिपोर्ट में कई राज्यों का विवरण छपा था। राज्यों की रिपोर्ट के शीर्षक पर ध्यान दें। पंजाब‘संगीन अपराध करती हैं महिलाएं।’ उत्तराखंड‘हिला अपराधियों से देवभूमि भी शर्मसार।’ छत्तीसग़ढ‘सीमित है महिलाआें का दखल’। पश्चिम बंगाल‘ठंडे दिमाग से अपराध करने में महिलाएं आगे।’ महाराष्ट्र ‘बेहद कम महिलाएं शामिल हैं अपराध में।’ राजस्थान ‘मिट रहा है महिलापुरुष अपराधी का भेद।’ बिहार‘अपराध में भी है आधी दुनिया का दखल।’ उत्तर प्रदेश ‘जयराम की दुनिया में महिलाआें की दस्तक तेज।’ दिल्ली‘बदमाशों के गैंग में महिलाआें का दबदबा।’ असम‘पूर्वोत्तर की स्थिति शेष भारत से अलग।’
समाचार पत्र में उपरोक्त शीर्षकों को ‘महिला ढाल है, तलवार नहीं’ के ब़डे शीर्षक के तहद छापा गया है। उसी अध्ययन रिपोर्ट में पुलिस महानिरीक्षण अशोक अवस्थी के हवाले से कहा है ‘सामाजिक अपराधों में महिलाएं जरूर सामने आ रही हैं। ज्यादातर मामलों में इसकी वजह परिवार होते हैं। अब तक संगठित या महिला की अगुआई में अपराध की घटनाएं प्रकाश में नहीं आई हैं। अधिकांश मामलों में पुरुषों द्वारा महिलाआें को आगे किया जाता है,ताकि उनका बचाव हो सके।’
सबसे अधिक आकर्षित किया था उस अध्ययन रिपोर्ट का शीर्षक‘अपराध में भी महिला सशक्तिकरण’ विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे मानो सशक्तिकरण का उपहास उ़डाया गया हो। अपराधिक मामलों में महिलाआें की ब़ढत किसी के लिए सुखद समाचार नहीं है। महिलाएं भी शायद ऐसा सुनना नहीं चाहें। सशक्तिकरण का अभिप्राय महिला को पारिवारिक, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टि से सशक्त बनाना है। जिससे उसका परिवार सुखी हो। उसे समाज में पहचान और सम्मान मिले।
जो सत्य है, उसे छुपाया नहीं जा सकता। झुठलाया भी नहीं। महिलाआें के अंदर पनप रहे अस्वाभाविक अपराधिक प्रवृत्ति समाज के लिए चिंता का विषय अवश्य है। यह मानना प़डेगा कि आज पुरुषों में भी अपराधिक प्रवृत्ति की ब़ढोतरी हुई है। अपराध ने सारे बंधन त़ोड लिए हैं। सामान्य प़ढाईलिखाई और प्रशिक्षण के द्वारा मनुष्य को योग्य नागरिक तथा अर्थार्जन का माध्यम बनाने की पहल चल रही है। शिक्षा के क्षेत्र में शत प्रतिशत उपलब्धि अभी प्राप्त नहीं हुई। दूसरी ओर इसी समाज में छुपछुप कर अपराध की शिक्षा दी जाती है। इसमें भी विविधताएं हैं। अपराध की दुनिया में प्रवेश के लिए कठिन से कठिन शारीरिक प्रशिक्षण दिया जाता है। संभवतः अपराधिक संगठनों द्वारा प्रशिक्षण पर खर्च भी बहुत किया जाता है। राज्य सरकारों के मानव संसाधन मंत्रालय के बजट से उनका बजट कम नहीं होता।
पुरुषों की अपराधिक प्रवृति और अपराधी बनने का कारण उनकी गरीबी को माना जाता है। महिलाएं भी पेट की खातिर ही उधर प्रवृत होती होंगी, परंतु गरीबी मुख्य कारण नहीं कही जा सकती । क्योंकि लाखों गरीब महिलाएं मेहनत से ही पैसा कमाना चाहती हैं। अपराध की दुनिया में उनका प्रवेश करना सशिक्तकरण नहीं कहा जा सकता। सशक्तिकरण से महिलाआें को शुकून मिलता है। अपराधीकरण से महिला तबाह हो जाती है। एक बार अपराध की दुनिया में प्रवेश कर फिर बाहर भी नहीं निकल पाती। दरअसल अपराध की दुनिया में मदा] का बोलवाला है और महिलाएं उनकी शिकार हो रही हैं। वे सीधे नहीं उतरती, पुरुषों का औजार बनती हैं।
वह ढाल बने या तलवार, महिलाआें का अपराधीकरण रोकना ही होगा। उचित शिक्षा के साथ उन्हें रोजगार से ज़ोडना आवश्यक है। एक ब़डा तरीका समाज में रंग ला रहा है। स्वयंसेवा समूह । ग्रामीण और शहरी गरीब इलाके में भी स्वयंसेवा समूह, कई सामाजिक कुरीतियों और बुराइयों की दवा बनकर ख़डे हुए हैं। इन्हें उन इलाकों में भी ले जाना चाहिए जहां से अधिक महिलाआें के अपराध में संलग्न होने की संभावना रहती है।
दूसरी बात है कि महिला में पुरुष के बराबर होने या अपने को पुरुष समझने और ऐसी पहचान करवाने की आई नई प्रवृति पर रोक लगानी होगी। आज स्त्रीपुरुष बराबरी के दंगल में महिलाआें के अंदर भी यह भाव भरा गया है कि वह पुरुष से किसी मायने में कम नहीं है। स्त्रियों के अंदर आत्मविश्वास भरने तथा सदियों से अपने को पुरुष से हीन मान बैठी महिलाआें की सोच को बदलने भर के लिए तो यह नारा ठीक है। परंतु एक हद तक ही स्त्री को प़ढानालिखाना, नौकरीरोजगार में अवसर देना आवश्यक है। तात्पर्य यह नहीं कि वह बराबरी के नाम पर वह सब कार्य भी करे जो पुरुषों के लिए भी वर्जित है। स्त्री, पुरुष के बराबर नहीं, विशेष है। प्रकृति ने उसे विशेष जिम्मेदारियां देकर भेजा है। उसके खाते में अपराध खपता नहीं है। इसलिए जहां अपराध के विरुद्ध उनका मानस बनाना है, वहीं उनके रोटीकप़डे और मकान की समस्या का हल निकालना भी है। अचम्भा तो इस बात का है कि अपराधिक मामलों में संपन्न घरों की महिलाआें की संख्या अधिक होती है। धन की लिप्सा बहुत ब़डी नशा है। इसे दोनों प्रकार से रोकना है। कठिन दंड और पुरस्कार दोनों देकर। कई मायने में महिलाआें में ब़ढती अपराधिक प्रवृति समाज विरुद्ध है। रोक आवश्यक है। वह निर्मातृ है। इसी भाव को जगाए रखना है।
