शिवनेत्र के तीन कथन
‘अपनी दिलरुबा जानेमन प्रेमिका को किसी नितान्त पराए आदमी के साथ फेरे लेते देखने से ज्यादा दुःखद त्रासदायी दृश्य जवानी के लिए दूसरा नहीं होता।’ आप्त वाक्य है यह, जरूर किसी महापुरुष ने कहा होगा। अगर यह शाश्वत उक्ति किसी महापुरुष के नाम दर्ज नहीं हो, जो उक्ति संग्रह में रुचि लेने वाले महानुभाव कृपया इसे शिवनेत्र शर्मा के नाम दर्ज कर लें। निजी यानी भोगे हुए यथार्थ से उपजा है यह आह से भराभरा कथन। इस त्रास को पूरी नाटकीयता के साथ हंसतेमुस्कुराते, लेकिन जिसे कहते हैं, मन ही मन रोते हुए झेला है शिवनेत्र ने। लेकिन आज मैं इससे एक कदम आगे की बात कर रहा हूं। अस्तु, किस्से को शुरू से बताने की अनुमति चाहता हूं। शिवनेत्री की इस त्रासदी के फ्लैशबेक में यदि जाना प़डे तो आप जान लें कि प्रारब्ध के माथे ठीकरा फ़ोडे बिना बात शुरू नहीं की जा सकेगी।
जिस साल इंजीनियरिंग में प्रवेश हुआ उस साल हायर सेकेंडरी की मेरिट लिस्ट में चौथे क्रम पर नाम था शिवनेत्र शर्मा और उसके ठीक बाद पांचवें क्रम पर था कु सुलभा शुक्ला का । और मेरिट की इसी निकटता के कारण प्रदेश के प्रमुख इंजीनियरिंग कॉलेज में एक ही सेक्शन में दोनों को प्रवेश मिला। प्रारब्ध के अलावा एक ही सेक्शन में हाेेने का कारण यह भी रहा कि दोनों के नाम ‘एस’ से शुरू होते थे और पहले दिन ही क्लास में मिलान किए जाने पर पता चला कि सेकेंडरी की मार्कशीट में दोनों को हर पेपर में समान अंक मिले हैं। बस, शिवनेत्र को जाने कैसे अंग्रेजी के पर्चे में तीन अंक ज्यादा मिले और उसका नाम सुलभा शुक्ला से ऊपर आ गया। थ़ोडे संकोच के बाद निकटता हुई, दोस्ती हुई, घूमनाफिरना शुरू हुआ। सुलभा शिवनेत्र के और शिवनेत्र सुलभा के घर आनेजाने लगे।
पर ये अंडरस्टेडिंग भी ब़डी कमीनी चीज है। कभी भी धोखा दे सकती है। यही हुआ इस कहानी में भी। बारबार सुलभा के आनेआने के कारण शिवनेत्र के घर के लोग यानी एक बहन, दो भाई मांबाप ने समझ लिया कि दोनों का ज़ोडा बनने वाला है।
‘‘तेरी सुलभा नहीं आई दो दिन से?’’ कहकर ठिठोलियां भी कर ली गई। खुद शिवनेत्र को याद आता है कि उसने दो बार सुलभा को धीमे से ‘आई लव यू यार’ कहा था। जिसे शायद सुलभा ने आजकल की तोतारटन्त जैसा कुछ मानकर कोई जवाब नहीं दिया या फिर मन के की बोर्ड पर कंट्रोल दबाकर सेव करना भूल गई। बात तीसरे साल यानी पांच सेमेस्टर पास कर लेने के बाद की है। उनकी बातचीत में ‘केम्पस सिलेक्शन’ जैसे आशावादी शब्दों की भरभार होने लगी थी। रोमांटिक कहानी के हिसाब से यही वह समय था, जब शिवनेत्र को नौकरी लगने के बाद शादी कर लेने जैसी कोई बात करनी थी। बातोंबातों में कुछ इशारे किए भी थे उसने। तभी क्या हुआ कि शहर में दंगे हो गए। पांच दिनों में आग ठंडी तो प़ड गई, लेकिन तनाव फिर भी था। तभी सुलभा के पिताश्री ने फाेेन किया, ‘भैया शिवनेत्र, हमारा एक जरूरी का है।’
‘बताइए पापाजी, मैं अभी घर आ जाता हूं।’ शिवनेत्र ने जिस उत्साह से जवाब दिया उसमें परिवार के सदस्य का अपनापन और भावी ससुर के प्रति आदर भाव दोनों ही थे। यहां स्पष्ट कर दूं, प्रेमकथा में हीरोइन के पिता के नाम में अकसर पाठकाेें की रुचि नहीं रहतीं। महान प्रेमकथाआें को याद कीजिए कितनी हीरोइनों के बाप के नाम आपको याद है? इीलिए मैेंने भी अपनी हीरोइन के पिता का नाम पता करने की कोशिश नहीं की। हां, तो सुलभा के पिता ने पूरे अपनेपन के साथ घर बुलाया और कहा, ‘‘अगले तीनचार दिन आपको हमारे साथ शहर में घूमना है। शहर में तनाव है ना! आप साथ रहेंगे तो।’’
‘‘जरूर, जैसा आप कहें।’’ शिवनेत्र ने जब विनम्र भाव से कहा, तो देखा कि सुनते ही सुलभा ड्राइंग रूम से उठकर चली गई। शिवनेत्र को लगा, चायशाय बनाने गई होगी। पिता के साथ घूमने की सहमति सुलभा के कलेजे पर जैसी किसी जगह पर तीर जैसी लगी होगी, यह तो वह सोच भी नहीं पाया। असलीयत तब खुली जब सुलभा के पिता उसे लेकर गणेश मंदिर पहुंचे। उन्होंने हाथ में सम्हाला बेग खोला। एक सौ एक रुपए, श्रीफल और रंगीन लिफाफा निकालकर बोले, ‘पहला निमंत्रण तो गणेशजी को ही दिया जाता है ना!’
अब शिवनेत्र को हुआ कलेजे पर तीर लगने का एहसास। उसने देखा, लिफाफे पर गणेशजी के चित्र और ब़डे हरुफों में ‘सादर निमंत्रण’ के बाद दर्ज थी खतरनाक इबारतसुलभा वेड्स गोवर्धन’। ‘सॉरी’ अपने पूर्व कथन को सुधारना चाहता हूं, निमंत्रण पत्र देख शिवनेत्र को तीर लगने का एहसास नहीं हुआ, उसे लगा जैसे कलेजे पर किसी ने गोवर्धन रख दिया हो। अगले दोतीन दिन निमंत्रण बांटते हुए सुलभा के पिता बताते रहेएकाएक सब हो गया। उन्हें जल्दी थी। परिवार अच्छा है। ऐसे ल़डके मिलते नहीं हैं। और भी जाने क्याक्या और अन्त में ल़डका बीस हजार कमाता है। गवर्मेंड जॉब है, लेक्चरार। गोवर्धन की विरुदावली सुन बारबार शिवनेत्र की इच्छा हुई, वहीं स़डक पर घुटनों के बल बैठ जाए और अपने होने से रह गए ससुर से कहे, ‘क्या आप थ़ोडा इंतजार नहीं कर सकते? देखना, केम्पस सिलेक्शन में ही मुझे उस गोवर्धन से तीन गुना पैकेज मिलेगा।’
कुछ बोल न सका शिवनेत्र। नोटएक जो लोग समझना चाहते हों कि शालीन व्यक्ति के संस्कार कैसे आ़डे आते हैं और वे आ़डे ही क्यों आते हैं, ख़डे क्यों नहीं आते, वे शिवनेत्र की इस चुप्पी को देख समझ सकते हैं। नोट दोप्रेमी युवक के जीवन में कैरियर की शुरुआत से पहले सुबह पौ फटने के ठीक पहले जैसा ही घुप्पा अंधेरा रहता है। उक्त संग्रहकर्ता इस दूसरे नोट को भी शिवनेत्र के भोगे हुए यथार्थ से उपजे आप्तकथन के रूप में दर्ज करें।
शिवनेत्र ने निमंत्रण बांटे, हाउस की व्यवस्था करवाई, केटरिंग पर निगाह रखी, दूर दराज से पधारे सौ कां सुलभा के रिश्तेदारों के ठहरने की व्यवस्था में मदद की आदि इत्यादी। और जैसा कि बता चुका हूं, हंसतेमुस्कुराते, मन ही मन रोते, अपनी सुलभा की अनजान गोवर्धन से शादी की भीषण त्रासदी को बर्दाश्त किया। घर के सदस्य भी, सहपाठी भी आशा करते रह गए कि शिवनेत्र कोई प्रयास करेगा। कम से कम एक बार तो सुलभा के आगे मन की बात रखकर अपनी दीवानगी प्रमाणित करेगा। सुना है, किसी सहेली ने सुलभा से कहा भी, ‘हम तो समझे थे कि तू शिवनेत्र साथ!’
सुलभा केवल मुस्कुरा दी । फिर गंभीर हो गई और हंसतीमुस्कुरातीरोती विदा हो गई। शिवनेत्र के साथ पिछले द़ोढाई में बनी अंडरस्टेडिंग जाने कहां हवा हो गई। शिवनेत्र ने उस दिन के बाद सुलभा के घर कभी न जाने की कसम सी खा ली। बुलाने पर भी नहीं गया। लग रहा था, दो आप्त वाक्यों के साथ प्रेम कथा यहां खत्म हो गई। अब इसे लेखक की कमजोरी कहें या कथानक की मजबूरी, यह सब जो हुआ, फ्लैशबैक था। तीनस़ाढे तीन साल गुजर गए। हाउस वाइफ हो गई सुलभा। प़ढाई छ़ोड दी। शिवनेत्र की लाख से ऊपर की नौकरी लगी। परिवार के लोग शादी की बात करने, ल़डकियों के फोटो दिखाने लगे। हर फोटो के साथ शिवनेत्र दिल मैं बैठी सुलभा की तुलना करता। लगभग गोल चेहरा चौदहवीं के चांद टाइप, तराशी भोंहे, ब़डी आंखें, मुस्कुराने की तरफदारी करते होंठ, च़ोडे माथे पर सतत बदलती कभीकैसी कभीकैसी बिन्दिया। गनीमत रही जो किसी ने सुलभा के सौन्दर्य का वर्णन करने को उकसाया नहीं, अन्यथा अच्छा भला इंजीनियर कवि हो जाता, बेचारा। वो हुआ यूं कि तीन दिन की छुट्टियों में घर लौटे शिवनेत्र ने एक दिन यूं ही भाई से पूछ लिया, ‘सुलभा की कोई खबर है क्या?’
‘‘नहीं तो, हां, ड़ेढएक महीने पहले उनके पति का एक्सिडेंट हुआ था, कार से। अस्पताल में भर्ती थे। उनके पापा देखने जा रहे थे, तब स्टेशन पर मिले थे।’’
‘उसके बाद?’’ शिवनेत्र ने आतुरता से पूछा और भाई ने कहा, ‘अभी कुछ दिन पहले उनके घर के आगे से निकला था, तो ताला लगा था।’
खबर ने विचलित कर दिया, रहा नहीं गया शिवनेत्र से। बाइक से पांच मिनट की दूरी थी। क्या गुजर रही होगी सुलभा पर? यहां स्पष्ट कर दूं, जिन आशंकाआें ने उसे भर दिया था, वे हर्षमिक्षित नहीं थी। ऐसे अरमान नहीं जागे कि सुलभा विधवा हो जाएगी, तो मैं उससे शादी। अलबत्ता ऐसी कई कहानियां उसने प़ढी थी, जिसमें शादी के बाद पूर्व प्रमिका प्रेमी के पास लौट आती हैं। यह जरूर हुआ कि उसे याद नहीं आया कि किसी दिन उसने इस घर की ओर कभी रुख न करने की कसम खाई थी।
दरवाजा खुला था। ड्राइंगरुम में सुलभा सामने ही बैठी, गोद में थाली रखे चावल बिन रही थी। थाली अलग रख उठने को हुई, तब तक शिवनेत्र सामने ही सोफे पर बैठ गया ‘अरे, तुम यहीं हो?’
‘आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए?’ जैसे शुरुआती वाक्यों को यंत्रवत की उपमा दे दें, पर उसके बाद दोनों चुप। शुद्ध भारतीय मध्यमवर्गीय मजबूरी में एक होतेहोते रह गए पूर्व प्रेमी प्रेमिका को बात करने का सूत्र नहीं मिल रहा था। सुलभा ने गहरी नजर से देखा, इतने दिनों में शिवनेत्र कुछ गंजा, कुछ मोटा पर पहले से ज्यादा स्मार्ट हो गया है।
शिवनेत्र ने सोचा, जरूर अपने पति उस गोवर्धन से मेरी तुलना कर रही है। लेकिन तभी सुलभा के चेहरे को ध्यान से देखते ही वह हतप्रभ रह गया। उसने देखा, सुलभा थ़ोडी गदरा गई थी, पर वे भोंहें, वे आंखें, वे होंठ और नाक, सब कुछ वही थे, कपाल कुछ और च़ौडा हो गया था, पर हाय, उसके बीच बदलबदल कर चमकती रहने वाली बिन्दी गायब थी। बिन्दी से खाली हुई त्वचा रंग खोकर और भी तेज चमक रही थी।
बिन्दिया की अनुपस्थिति से शिवनेत्र में उपजे भावों के लिए कहा जा सकता है कि वहां कुरुणा, शोक, सहानुभूति के बीच कहीं हर्षमिश्रित आशा का संचार होने लगा था। विवाह की घटना में उसने खुद के संकोच को दोष दिया था। बारबार उसे लगता रहा कि निमंत्रण छपने के बाद भी उसे दिल की बात कहने की एक कोशिश करनी तो थी, पर आज वह इस निश्चित पर पहुंच चुका था कि अब वह संकोच नहीं करेगा। स्तब्ध शिवनेत्र तय नहीं कर पा रहा था कि वह गोवर्धन के एक्सीडेंट की बात कहां से शुरू करे। तभी हुआ मां का प्रवेश। अभिवादन का आधा अधूरा सा उत्तर देकर वे सुलभा की ओर म़ुडी और बरस प़डी, ‘यह क्या? तुझसे कितनी बार कहा है? उठ पहले।’
सुलभा ने उठने का उपक्रम किया और माताजी शिवनेत्र की ओर देखकर बोली, ‘कितनी बार समझा चुकी हूं, नहाने के बाद सबसे पहले बिन्दी लगाओ, पर सुनती ही नहीं।’
और उठकर ख़डी होती सुलभा को देख शिवनेत्र ने महसूस किया, कैसा लगता है, जब अंकुरित होने से पहले ही सपना झुलस जाता है, कोई ख्याल जब आने से पहले ही डूब जाता है। प्रयासपूर्वक सोफे से उठ चुकी सुलभा के चेहरे पर लज्जा मिश्रित मुस्कान थी। इस नई किस्म की मुस्कान ने शिवनेत्र के कलेजे पर पहुंचकर एक नए शॉक की रचना की। मां लगातार बोले जा रही थी, ‘आठवां चल रहा है, ऐसे में ऐसी गलती थ़ोडे ना करनी चाहिए।’
बेमन से चर्चा कर, सुलभा के दोतीन महीने यहीं रहने की सूचना पाकर, फिर आने का झूठा वादा करते हुए तीसरे आप्त वाक्य के साथ लौट आया शिवनेत्र। ‘अपनी पूर्व दिलरुबा जानेमन को गर्भवती देखना किसी पराए आदमी से सात फेरे लेने से भी दुःखद त्रासदायी दुश्य है, जवानी के लिए।’ आप चाहे तो इसे भी शिवनेत्र के नाम दर्ज कर लें।
