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जाने दो साऽऽब !

Swatantra Vaartha  Sun, 22 Aug 2010, IST

जाने दो साऽऽब !

‘चौक में आज एक जलसा है

चंद लीडरां वहां पे आयेंगे

झूठे वादों का रंग दिखला कर

भूक बेकारी बांट जायेंगे।’

बोलके भुकया जोरजोर से शेरशायरी सुनारा था!

हमारे सोब भिडुवां कुछ भी नै समझ में आये तो भी ‘वाहवाऽऽ वाहवाऽऽ’ बोलरे थे !

हमारा बंबेली बबन्या मुगलएआझम में पृथ्वीराज कपूर साब की स्टाइल में ‘तखलियाऽऽ’ बोला !

‘फ्याऽऽट’ बोलके इत्त ब़डा लक़डी का तुक़डा आके ‘भिर्रर्रर’ बोलके पीठ कू ठोक के नीचे गिरा!

सिर कू लगता था तो उनो जिंदगी सेच ‘तखलिया’ हो जाता ! पीछे से जमाल साब का रोबदार, खनकदार आवाज भी आया ! दोचार दमदार गालियों के साथ !

‘अबेऽऽ ! ओऽऽ ! फाल्तू के ? समझ में नै आये तो लंबे बातां कैकू फेंकना ? मूं खोले तो ड़ेढ हजार मिस्टीकांऽऽ !!! हौले कहीं के !!! ‘इरशाद’‘तखलियां’ का फर्क नै मालूम ! ‘जेर’‘जबर’ की पेहेचान नै !! टिगलूजां कहीं के? मेरे पैर के छोटे उंगली के नाखून के उत्ते नै है ! शेरशायरी सुनारे ! वो भी लीडरों के उप्पर! बेवकूफ कहीं के ? अपनी गल्ली पहलेच बेकार फाल्तू लीडरों से भरी प़डी है ! एरवादा देड शाणा सुन लेंगा ! कहीं तो भी जाके पटरपटर करींगा ! अपने लीडरां कौन ? तुनक मिसाजी भ़डकीले बंपंरां !!! च़ीड में आके नल नै तो करेंट ‘कट’ करवाईंगे ! फुकट में नै सो लोल्ली ! नै सो आफतां !!’

बंबेली बबन्या ‘तुंटे’ के मार से तिलमिला उठा ! ‘अर्रर्र’ बोलके पीठ रग़ड लिया ! और गलती कर बैठा !

जमाल साब का गुस्सा हमारे गांव में भोत फेमस!

वैसा देखे तो हमारे गांव में ‘गुस्से वालों की पूरी पलटन’ है ! एक से एक बहारदार शाणे नमूने है!

हमारे गोपाल कू तो नाक पेच रहता गुस्सा !

एक बार हमारी रखमी मजाक में बोली

‘अईऽऽ ! अपने गोपाल का नाम पहले लाल था ! अब गुलाबी हो गया! गुस्सा कम हो गया नै ?’

बस्‌ !

‘खाऽऽड’ बोलके आवाज आयी !

हाथ मेंं पट्‌टी कू जमीन पे जोर से पटक के गोपाल गुर्राया !

‘दूसरों के नाक के रंगों के बदलाव देखने के पहले अपने ‘चिमुट भर’ नाम कू ‘आरशे’ में ‘चांगलं’ देख लेना !’

गोपाल कू गुस्सा आये तो, उसकी भाषा ‘खिच़डी’ बन जाती !

‘चिमुट भर’ ‘आरशां’ ‘चांगलं’ मराठी के है !

शास्त्री साब धीरे से हंसते हुए बोले!

‘गुणो भूषमते रूपम्‌!

गुण दोषमयं सर्वं स्त्रष्टा स्त्रजति कौतुकी!’

फिर हमारे परेशान थोप़डे देख के मतलब भी समझा के बोले !

‘गुण सौंदर्य का आभूषण है ! विधाता ने कौतुक में सब कुछ गुण और दोष से युक्त बनाया है !’

गोपाल गुस्सा जितना तीखा, उसका दिल उससे भोत ज्यादा मिठा ! हमारे गणपत सेठ, देशपांडे साब, चाचा, मामू, रेड्‌डी साब सोब के दिल आम, सीताफलों के जैसे मीठेे ! लेकिन, कब उख़डते ? कब लोल्ली करते ? कुछ भरोसा ने!

हमारे भंवर लाल सेठ तो इत्ते मीठे कि जमाल साब उनकू प्यार से ‘मीठी छुरी’ बोलते !

उनकी बातों में इत्ता शहद टपकते रहता की उनके कप़डे की दुकान में ‘रूमाल’ खरीदने कू आने वाला ‘ग्रहाईक’ सूट का थान खरीद के जाता! जरूरी नै रही तो भी जी भर के दुवाएं देके जाता !

उन दुवाआें के भरोसे पे उनो फुल्ल लूट लेरे ! और ‘इंसानियत, सुविचार’ बोलके भाषणां ठोकरे!

‘थ़ोडी बहुत कमी तो यहां हर किसी में है

दरिया भी खूबियों का मगर आदमी में है

साया तेरे गुनाह का गैरों पे क्यों प़डे ?

क्या चंद्रमा का दाग कहीं चादनी में है ?’

कभीकभी मैं सोंंचतू की जमीं कु गुस्सा आया की आसमान कू ? इत्ती बारिश ?

जमींआसमान के बीच ‘आम आदमी’ परेशान होरा ! पीसा जारा !

‘ऊमस कर घृत माढ गनावे,

झंडा क़ीडी बाहर लावे।

नीर बिनां चि़डयां रज न्हावे,

तो मेह बरसे धर मांहन मावै।’

‘गर्मी से घी पिघल जाता। चि़डयां अंडे बाहर लाते! बगैर पानी के चि़डयां रेत में नहाते। तो इात्ती बारिश होंगी की जमी भीग भीग के थरथर कांपने लगेगी।’

ऐसी बातां लोगों के दिमाग में जल्दी नै घुसते ! उनकू ‘काव्‌्‌्‌काव्‌’ करना तो भोत जबरदस्त तरीखे से समझ में आता !

‘काग प़ढायो पींजरै,

पढगो च्यारूं वेद

समझायो समझयो नहीं,

रहयो ढेढ को ढेढ।’

कव्वों कू पिंजरे में बिठाके वेदां प़ढाये तो दिमाग में कब घुुुुसते बोलके ?

‘काग कुल्ह़ाडो कुटिल नर,

काटै ही काटै।

सुई सुहागो सापुरुष,

सांठै ही सांठै।।’

कौवा, कुल्हाडा और बुरे लोगां ये काटने वालेच कभी भी ! ज़ोडने वाले तो सुई, सुहागा और सत्पुरुष ही होते हैं।

आम आदमी के लफ़डे आम ही होते ! खास नै होते ! ‘रक्षाबंधन’ राखी का त्यौहार आने वाला है ! बहन भाई का प्यार ! राखी धागों का त्यौहार! किसी किसी के जिंदगी में बहन रहती ! लेकिन ‘राखी’ का प्यार नहीं रहता ! सोब कू एक अच्छी, प्यारी, ल़ाड प्यार करने वाली, झूठमूठ की ल़डाई करने वाली, थ़ोडा सताने वाली, भोत समझने वाली, समझाने वाली प्यारी बहनिया रहना येच हमारी ख्वाईश !

भुकया खबर लाया रखमी भोत राखियां लेके घूमरी बोलके !

कैकू ? क्या ? कब ? कैसे ? सोब सवालां च सवालां ! कैकू नै सो पंचायत्यां बोलके मैं मल्ले में इमली के झ़ाड पे च़ढके छुप गया ! नीचे से रखमी की आवाज आयी !

‘अईऽऽ ! क्या हौले लोगां है ? कहां छुप गये की क्या की ? ‘वागापूर’ के भाई कू राखी बांधने कू जाना है ! साथ में चलना रे बोले तो दिखरेच नैऽऽ !’

वो बातां सुनके मारे खुशी के मैं उप्पर से ध़डाम से गिरा ! रखमी डर गयी ! चमक गयी ! और चिल्लाई ‘अईऽऽ’ बोलके ! ऐसे ‘अई’च अपुन कू चाहिए ! क्या करते? जाने दोसाऽऽब!!!

डॉ जेपी वैद्य

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