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हिन्दू विवाह कानून में संशोधन

Swatantra Vaartha  Sun, 29 Aug 2010, IST

हिन्दू विवाह कानून में संशोधन

वैदिक रीति से संपन्न हुए विवाह को हिन्दू विवाह कहा जाता है। अन्य संप्रदायों के स्वीच कानूनों में विवाहों के नियमों को कानूनी मान्यता देते हुए इधर हिन्दू विवाह कानून भी बनाया गया। १९५५ में बने इस कानून में कई बार संशोधन हो चुके हैं। ऐसे कानूनों में भी समय के अनुसार समाज में आए परिवर्तनों को देखकर संशोधन होते ही रहते हैं।

हिन्दू विवाह कानून बनाते समय विवाह की रीति में आए संकल्पों का भी गहराई से अध्ययन होना चाहिए था। सनातन भारतीय मान्यता के अनुसार विवाह दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, वरन दो परिवारों का मिलन है। इसलिए विवाह के समय दो परिवारों के गुणदोष, गोत्र और आर्थिक स्थितियां मिलाई जाती रही है। सासससुरननददेवर के स्वभावों का भी पता लगाया जाता रहा है। इसके पीछे यही भाव कारण रहता आया है कि विवाह टिकाऊ हो। विवाह का टिकाऊ होना इसलिए भी जरूरी है कि उस दंपत्ति पर दो पी़ढयां अवलंबित होती है। ल़डके के मातापिता (दादादादी हों तो वे भी) और बच्चे। विवाह के टूटने पर मात्र पतिपत्नी नहीं वरन उनके मातापिता और बच्चे भी प्रभावित होते हैं। इसलिए विवाह के अवसर पर कन्यादान, सात फेरे, लाजा होम के बाद पति के वाम भाग में बैठने के पूर्व कन्या अपने वर से सात वचन लेती है। हिन्दू विवाह रीति में विवाह शता] पर आधारित नहीं है। वह समझौता भी नहीं, संकल्प है। संस्कार है। वैदिक विवाह रीति में कन्या की ही प्रधानता होती है। मानो विवाह स्त्री के लिए ही रचाए जाते हैं। तभी तो कन्या, वर से सात प्रतिज्ञाएं करवाती है।

कन्या द्वारा ली गई पहली प्रतिज्ञा‘बिना किसी कारण से तुम रात बाहर नहीं बीताओगे। बाहर भोजन भी नहीं करोगे।’

दूसरी प्रतिज्ञा‘तेरे सुखदुःख, भाईबंधु अब मेरे होंगे। मेरा पालनकर्ता बनकर तुम मेरी सब जरूरतें पूरी करना।’ वर स्वीकारता है।

तीसरी प्रतिज्ञा‘मैं तुम्हारी शक्ति लेकर अपनी शक्ति ब़ढाऊंगी।’

चौथी प्रतिज्ञा‘मैं तुम्हारी खातिर जिऊंगी। तुम मेरी चिंता करना।’

पांचवीं प्रतिज्ञा‘मैं रूठूं, झगडूं, तब भी तुम शांत रहना। बुरा मत मानना।’

छठी प्रतिज्ञा‘मेरे मातापिता ने पालपोस कर कन्यादान किया है, उन्होंने कुछ दिया न दिया, तुम कभी ताना मत मारना।’

सातवीं प्रतिज्ञा ‘हवन, यज्ञ और सभी धार्मिक काया] में मैं तुम्हारी भागीदार रहूंगी, परंतु तुम्हारे पाप काया] में मैं भागीदार नहीं रहूंगी। मैं अपना धर्म भी नहीं बाटूंगी । तुम पराई स्त्री का संसर्ग कभी नहीं करोगे।’

वर द्वारा उपरोक्त सात वचनों को स्वीकार करने पर कन्या उसके वाम भाग में बैठती है। शिलारोहन करती है। दोनों को ध्रुवतारा दिखाया जाता है। अर्थात्‌ विवाह के सभी विधिविधान में इसके दीर्घायु होने की कामना की जाती है।

इन प्रतिज्ञाआें में से दूसरी और छठी प्रतिज्ञा की ओर मैं ध्यान खींचना चाहूंगी। वे हैं ‘तुम्हारी मातापिता, भाईबंधु अब मेरे होंगे’ और ‘मेरे मातापिता ने कुछ दिया, न दिया, तुम कभी ताना मत मारना।’ तात्पर्य यह कि दोनों ओर के मातापिता उस विवाह संस्कार के हिस्सा हैं। उनको अपनाकर उनकी देखरेख करना भी, विवाह के समय कन्या ने स्वीकार किया है। फिर हिन्दू विवाह कानून बनाते समय विवाह के प्रमुख घटक ल़डके और ल़डकी के मातापिता क्यों छूट गये। दहेज प्रतिबंधन कानून में उनको नहीं छ़ोडा गया है। बहू द्वारा लगाए सच या झूठे आरोपों पर आज सैक़डों सासससुर जेल की हवा खा रहे हैं। परंतु हिन्दू विवाह कानून में तलाक मांगते या देते समय मातापिता की समस्याआें पर विचार ही नहीं किया गया। हिन्दू विवाह कानून की धारा १३ बी के तहत विवाह विच्छेद के लिए नौ आधार बताए गए हैं विवाहेत्तर संबंध, क्रूरता, परित्याग, धर्म परिवर्तन, मानसिक संतुलन बिग़डने, कुष्ठ रोग जैसी असाध्य बीमारी, संन्यास लेने और सात साल या इससे ज्यादा समय से जीवनसाथी के जीवित होने के बारे में कोई खबर नहीं होने। विवाह विच्छेद के इन आधारों में आपसी सहमति भी ज़ोडा गया है। परंतु इन आधारों में कहीं भी मातापिता की अवहेलना या उनसे पूछताछ, उनका विचार लेना नहीं ज़ोडा है। तात्पर्य यह कि जिस हिन्दू रीति से हुए विवाह के संरक्षण के लिए कानून बनाया गया है, उसमें विवाह में लिए वधू के द्वारा वर से लिए गए वचन या प्रतिज्ञाआें की अवहेलना कर दी है।

हाल ही में हिंदू विवाह कानून और विशेष विवाह कानून में संशोधन लाने के लिए विधि आयोग के सुझाव पर केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने संसद में विधेयक लाने की स्वीकृति दे दी है। समाचार पत्रों ने लिखा ‘अब हिन्दू विवाह में तलाक बहुत आसान हो जाएगा।’ संशोधन के सुझावों के औचित्य पर मैं फिर बात करूंगी। यहां तो मेरा कहना है कि संशोधन यह होना चाहिए कि विवाह विच्छेद की स्वीकृति देते समय मातापिता का विचार लेना या उनकी स्थिति पर विवाहविच्छेद के प्रभाव का आकलन अवश्य होना चाहिए। कानून में एक नई धारा ही क्यों न ज़ुडे और बच्चों का भी ध्यान रखा जाए। अन्यथा हिन्दू विवाह कानून को भी परिवार त़ोडक बना दिया जाएगा। ग्राम्य संयुक्त परिवारों में अक्सर ऐसा होता था कि पतिपत्नी के बीच आपस में बातचीत नहीं होती थी, पर परिवार वाले उस पत्नी को ही घर की मालकिन बना देते थे। या उसका भारणपोषण तो हो ही जाता था। तलाक के कानून के अनुसार भारणपोषण भी न्यायालय द्वारा निर्धारित राशि पर ही होता है। जो अब तक उपयुक्त राशि नहीं मानी जाती।

दरअसल अब विवाह के रस्मरिवाज, विधिविधान और मंत्रों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। विवाह के अवसर पर नाचगान, खानापीना और ऐश करने में लोग रमे रहते हैं। पंडित जी को शीघ्र विवाह संपन्न कराने के लिए अलग से दानदक्षिणा दिए जाते हैं। पंडित भी विवाह की गंभीरता को नहीं बताते। विवाह में उपयोग में लाई जाने वाली वस्तुआें के प्रतीकात्मक महत्त्व नहीं बताते। तभी तो हिन्दू विवाह संस्कार को छिन्नभिन्न करने की व्यक्तिगत, सामाजिक और सरकारी कोशिश हो रही है। हम भूल जाते हैं कि विवाह संस्कार के लुप्त होने, परिवारों के बिखरने से व्यक्ति, परिवार, समाज ही नहीं, राष्ट्र की मूल धारणाएं भी छिन्नभिन्न होंगी। क्योंकि हिन्दू जीवन पद्धति में सब एक दूसरे से ज़ुडे हैं। गृहस्थाश्रम पर निर्भर है, तीनों आश्रम। हिन्दू जीवन पद्धति का तानाबाना परिवार में ही बुना जाता है। जिसे त़ोडने के लिए कानून को आसान बनाने पर सब तुले हैं। सभी बिन्दुआें पर गंभीरता और दूरदृष्टि से विचार करना है।

डॉ एनी वेसेंट ने हिंदू विवाह पद्धति का गहराई से अध्ययन किया था। उन्होंने सावधान किया था ‘सावधान ! कहीं आप भारतीय नारी के अंतःकरण में स्थित विवाह की पवित्रता और त्यागमय जीवन की श्रेष्ठता की ज़डें न खोद दें। उन्होंने युगयुग से अपने आदशा] को उन्नत रखा है, पतिप्रेम को एक आध्यात्मिक शक्ति के रूप में संजोया है, न कि केवल कामवासना की पूर्ति अथवा सांसारिक सुख के रूप में । सावधान ! आप कहीं उनके समक्ष विषयसुखों को आध्यात्मिक सुख से अधिक मोहक और सुखसुविधा एवं भोगविलास के जीवन को स्वकर्त्तव्य और स्वार्थत्याग के जीवन से अधिक आकर्षक रूप में प्रस्तुत न कर दें। नारियां ही भारत को पतन से बचाएंगी, किंतु वे नारियां नहीं, जिनके आदर्श डिगते जा रहे हैं। अभिजात और आत्मत्याग नारी के अंतःकरण में अधिष्ठित है, भारत की पुत्रियां ही हिंदू धर्म और हिंदू परिवार को सुरक्षित रखे हुए हैं और आगे भी रखेंगी।’

हिंदू विवाह कानून में बारबार परिवर्तन कर विवाह संस्कार को ही विद्रुप नहीं बनाना चाहिए। संशोधन करते समय सरकार और न्यायालय स्त्री हक और सुविधा की दुहाई देते हैं। पर हिन्दू विवाह के महत्त्व को छिन्नभिन्न करने वाले स्त्री विरोधी हैं।

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