उस्मान अली खान का परिवार (१)
बादशाहों, राजाआे, नवाबों तथा जागीरदारों में अन्तःपुर या जनानखाने में अनेक रानियां या बेगम तथा रखैल भी रहा करती थी। परिवार के पहले पांच निजाम के अंतःपुर पर किसी लेखक, इतिहासकार अथवा शोधकर्ता ने कोई प्रकाश नहीं डाला न उनकी कोई ठोस जानकारी उपलब्ध है। षष्टम तथा सप्तम् निजाम नवाब मीर महबूब अलीखान तथा नवाब मीर उस्मान अली खान के अंतःपुर तथा उनकी बेगमात एवं पत्नियों के विषय में जानकारी उपलब्ध है। यहां हम केवल नवाब मीर उस्मान अली खान के परिवार, जिसमें अंतःपुर भी शामिल है, पर कुछ प्रकाश डाला जा रहा है।
यह तमाम सामग्री अंतिम निजाम के निकट संबंधियों के सहयोग से इकट्ठा की गयी है।
नवाब मीर उस्मान अली खान ने इस्लाम धर्म के आदेश तथा सिद्धान्त के अनुसार चार विवाह किए, किंतु एक बादशाह के नाते उन्होंने कई स्त्रियों को अपने अंतःपुर अथवा हरम में दाखिल कर लिया था। उनके निजी सचिव तथा नजदीकी दरबारी नवाब होशयार जंग, होश बिलगिरामी के अनुसार उस्मान अली खान के हरम में लगभग ४५ खवासे थीं। (खवास= राजाआें और नवाबों की लौंडी जिसके साथ वह संभोग करते हो)। ब्याहता पत्नियों से जो संतान उत्पन्न होती थी उन्हें प्रिन्स (शहजादा, राजकुमार) तथा प्रिन्सेस (शहजादी, राजकुमारी) कहा जाता था। खवासों या अन्तःपुर की बेगमात से पैदा होने वाली संतान ‘साहिब जादा’ और ‘साहिब जादी’ कहलाती थीं। युवावस्था तथा उसके बाद भी उस्मान अली खान ने अपने पिताश्री नवाब मीर महबूब अलीखान की ‘हरम परंपरा’ को कायम रखा। कहीं सुंदर स्त्री पर नजर प़डी, चाहे वह भी परिवार की हो, उसे हरम में दाखिल कर दिया जाता था। इस आशा के साथ कि वह बादशाह की न केवल बेगम कहलाएगी, अपितु शाही महल में पूरे राजसी ठाठ से रहेगी। कई बार यह सपना केवल सपना ही रह जाता था। होश बिलगिरानी के अनुसार ‘नादान औरतें इस भ्रम में मुब्तिला होकर महल में दाखिल होने से खुश थी कि बादशाह की बीवी बनेंगी, जवाहेरात से लदी रहेंगी, जरब्फत और किमखाब (एक प्रकार के कीमती कप़डे) के वस्त्र पहनकर अपने सुंदर शरीरों को सजाए रखेंगी, फूलों की सेज पर सोएंगी, अशरफियों (स्वर्ण मुद्राएं) से खेलती रहेंगी, मगर जब दाखिल हुई तो हर तरफ से यह आवाज आने लगी
‘ख्वाब था जो कुछ कि देखा जो सुना अफसाना था’
अनब्याही पत्नियों अथवा खवासों से उस्मान की कई संतानें हुई। डॉक्टर वीके बावा अपनी पुस्तक ‘दि लास्ट निजाम’ (अंतिम निजाम) में हरम के विषय में यूं लिखते हैं, ‘उस्मान के हरम में लगभग ४२ बेगमें, ३३ संतान, ४६ पौत्रपौत्रियां, १६ बहुएं, ४४ खानाजाद (पालकडी औरतें) तथा २००० नौकरचाकर थे । डॉ बावा के अनुसार ‘हरम में प्रवेश अथवा दाखिल करने या होने के भी कई तरीके थे। एक तो यह था कि यदि उस्मान की नजर किसी सुंदर ल़डकी या औरत पर प़ड गई और वह उनके मन को भा गयी तो उसे हरम में दाखिल करा दिया जाता था। दूसरे यह कि किसी दरबारी के कहने पर अथवा जनान खाने की किसी वरिष्ठ दासी किसी परिवार की ल़डकी की खोज करती या परिचय प्राप्त करती और इसी बात की सूचना कोई दरबारी ब़डी होशियारी से उपयुक्त समय पर उस्मान से इसका जिक्र करता था। उस ल़डकी को बुलाया जाता तथा उसे देखकर, उससे बातचीत करके उसे हरम में प्रवेश करने का निमंत्रण दिया जाता । तीसरा तरीका था उस्मान की माता का जनान खाने अथवा पालकडियों में से किसी सुंदर ल़डकी का चयन करके अपने पुत्र को उपहार स्वरूप भेंट करना।’ हरम की इन तमाम खवासों की राजसी ढंग से देखभाल होती थी। उनके खानपान तथा रहनसहन का उत्तम प्रबंध रहता था। उनका काम केवल उस्मान की शारीरिक इच्छाआें की पूर्ति ही था। न इससे कम और न ज्यादा। हरम की देखभाल केवल स्त्री गार्ड ही करता था। वहां पुरुषों का आना निषेध था। उस्मान के हरम में दाखिल होने वाली अंतिम स्त्री थीलीला बेगम, जो गुलबर्गा के एक हिन्दू कन्ऩड परिवार की महिला थी। वह अत्यंत सुंदर तथा आकर्षण वाली थी और इसी कारण वह उस्मान की सबसे चहेती बेगम थी। इनसे सात संतान हुई। उस्मान के परिवार के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने के पहले उस्मान का वंशवृक्ष दिया जा रहा है।
उस्मान अलीखान की माता का नाम अम्तउज जोहरा था। जो एक शिया परिवार से थी। उस्मान अपनी माता से अगाघ प्रेम करते थे, आदर करते थे। इसी कारण अपनी आयु के एक भाग में उन्होंने शिया मत में प्रवेश भी किया वह शिया बन गए। अम्तउज जोहरा सालारजंग प्रथम की एक हिंदू पत्नी प्रीतमजी की नवासी थी। होश बिलागिरामी के अनुसार इसी कारण उस्मान अलीखान प्रीतम जी को अपनी मुंहबोली नानी कहा करते थे। उस्मान अलीखान के जन्म पर भी कई सवाल ख़डे किये गए। एक इतिहासकार के अनुसार जब महबूब अली खान ने जोहरा बेगम को अपनाया तो वह पहले ही से गर्भवती थी। डॉ वी के बावा के अनुसार स्वयं उस्मान अलीखान ने १९३२ में एक पत्र उस समय के रेजिडेन्ट ले कर्नल टेरेन्स कीज को लिखा, जिसमें उस्मान ने कहा कि उनके पिता, नवाब महबूब अली खान ने उनकी संतान की माताआें से विवाह (निकाह) नहीं किया और इसमें कोई बुरी बात भी नहीं है, क्योंकि किसी संतान को बादशाह की संतान कहलाने के लिए एवं वैधता के लिए बादशाह किसी बेगम से विवाह होना जरूरी नहीं है। सालारजंग परिवार से इस प्रकार के संबंधों के कारण ही उन्होंने अपनी एक कन्या का विवाह नवाब सालारजंग के पर पौत्र नवाब काजिम नवाज जंग (अली पाशा) से किया।
उस्मान अली खान की तमाम संतानों को ‘जाह की उपाधि प्रदान की जाती थी। जैसे आजम जाह, मोअज्जम जाह आदि। इसी श्रृखंला में इनकी चहेती बेगम लीला बेगम तथा किसी और बेगम से उत्पन्न संतान को ‘हश्त जाह’ (हश्त=आठ) कहा जाता है और इन्हीं आठ बेटों को उस्मान अली खान की जायदाद तथा हीरे जवाहरात का एक हिस्सेदार (छः आने का हिस्सा १६ आने में से, क्योंकि उस्मानी हाली मुद्रा में १६ आने एवं ९६ पैसे हुआ करते थे) बनाया गया।
उस्मान अली खान का पहला विवाह हैदराबाद के एक प्रसिद्ध नवाब, मीर जहांगीर अली खान जहांगीर जंग बहादुर की सुपुत्री एजाज उन्निसां बेगम से १४ अप्रैल १९०६ को संपन्न हुआ। जहांगीर जंग की माता आसफजाही परिवार ही से थी। वह पंचम निजाम नवाब अफजल उद्दौला के भाई रोशन उद्दौला की सुपुत्री थी। इस प्रकार एजाज उन्निसां बेगम उस्मान की पटरानी अथवा ज्येष्ट पत्नी थी। इनको लोग दुल्हन पाशा के नाम से जानते थे। इनका महल ईदन बाग (ई़डन गार्डन) में था।
कहा जाता है कि दुल्हन पाशा ब़डी सनकी थी, उनका दिमागी संतुलन कुछ ठीक नहीं रहा करता था। वह शाम को मोटर में नगर के बाजारों में घूमती और किसी ब़डी दुकान से मचनाही वस्तुएं उठा लातीबिना मूल्य चुकाए । यह क्रम सप्ताह में दो तीन बार चलता रहता था। ऐसी हरकत से नगर के सभी दुकानदार परेशान थे। वह सामान देने से न तो इंकार कर सकते थे और न ही उस सामान का मूल्य अदा करने का इस्रार या आग्रह। दुल्हन पाशाकी इस अजीब आदत से मजबूर होकर महल में एक विशेष प्रबंध किया गया। सामान, जिसमें जेवरात, वस्त्र आदि हुआ करते थे, महल में तो आ जाता,किंतु उसके बाद वह सारा सामान उन दुकानों को लौटा दिया जाता, जहां से उन्हें खरीदा गया था। ऐसे प्रबंध से दुकानदारों को राहत मिलती थी। जहां पहले दुल्हन पाशा की मोटर को देखकर दुकानदार अपनी दुकाने बंद कर लेते थे, अब इस इन्तेजाम के बाद वह महारानी का हाथ ज़ोडकर स्वागत करते और उनका मनचाहा सामान मोटर में रखवा देते।
