तेलुगु संस्कृति का दर्पण बनती कहानियां
हिंदी की भांति तेलुगु में भी आधुनिक काल का उदय नवजागरण के उन्मेष के साथ ही हुआ। राष्ट्रीय चेतना, मुद्रण कला का विकास, विविध समाज सुधार आंदोलन के कारण तेलुगु साहित्य की दशा एवं स्वरूप में तेजी से बदलाव आया।
इस युग में गद्य की विविध विधाआें का विकास हुआ। आधुनिक तेलुगु साहित्य में ‘ग्रांथिकमु’ (पंडिताऊ भाषा) की जगह ‘व्यावहारिकमु’ (व्यावहारिक भाषा) का प्रयोग होने लगा। चिन्नया सूरी ने ‘बाल व्याकरणमु’ (बाल व्याकरण) नाम से तेलुगु व्याकरण लिखा। आधुनिक काल को सही अर्थ में आधुनिक बनाने वाले विद्वानों में कंदुकूरी वीरेशलिंगम् पंतुलु, तिरुपति वेेंकट कवि द्वय (दिवार्कल तिरुपति शास्त्री तथा चेल्लपिल्ला वेंकट शास्त्री) और गुरजाडा अप्पारव का महत्वपूर्ण योगदान है। इन चारों को आधुनिक तेलुगु साहित्य के युग प्रवर्तक कहा जाता है।
गद्य की विधाआें में कथा साहित्य (विशेषतःकहानी साहित्य) का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। सभी भारतीय भाषाआें में ब़डी तेजी से इसका विकास हुआ। इसे बंगला में ‘गल्प’, हिंदी में ‘कहानी’, तमिल और मलयालम में ‘कथेगल’, कन्नड में ‘कथेगलु’ और तेलुगु में ‘कथा’ अथवा ‘कथानिका’ कहा गया।
तेलुगु साहित्य में कहानी रचना का आरंभ १९ वीं शती के उत्तरार्द्ध में हुआ और तेलुगु के प्रथम कहानीकार हैं गुरजाडा अप्पाराव। गुरजाडा के पूर्व भी कुछ कहानियां लिखी गईं, पर उन्हें कहानी नहीं माना जा सकता, चूंकि उनमें आधुनिक कहानी के स्वीकृत तत्व दिखाई नहीं देते।
सती प्रथा, कन्याशुल्क, बाल विवाह, वेश्य वृत्ति जैसी सामाजिक विसंगतियों, दुराचार और परंपरावादियों की मान्यताआें पर गुरजाडा ने खुलकर प्रहार किया। गुरजाडा ने ‘कन्याशुल्कम्’ (कन्याशुल्क) उपन्यास के माध्यम से तेलुगु पाठकों को झकझोर कर रख दिया। उन्होंने समाज सुधार को लक्ष्य बनाकर ‘दिददुभाटु’ (सुधार), ‘मी पेरेमिटी’ (आप का नाम क्या है ?) और ‘संस्कर्ता हृदयम्’,(समाज सुधारक का हृदय) जैसी प्रसिद्ध कहानियों का सृजन किया। तेलुगु में कहानी विधा का प्रारंभ इन्हीं सामाजिक कहानियों से हुआ। तत्पश्चात चिंता दीक्षितुलु (एकादशी संग्रह), श्रीपाद सुब्रहमणय शास्त्री, वेलूरी शिवराम शास्त्री (कृति, क्षमार्पणम् (क्षमार्पण), अडवी बापिराजू, विश्वनाथ सत्यनारायण(नी ऋृणम् तीर्चुकुन्ना (तेरा ऋृण चुकाया), गुडिपाटी वेंकटचलम् (कन्नीटी कालुवा (अश्रुधारा), अदृष्टम् (किस्मत), वेंकटचलम् कथलु (वेंकटचलम् की कहानियां), मुणिमाणिक्यम् (हास्य कथलु, हास्य कहानियां), तल्लि प्रेमा (मातृ प्रेम), कांतम् कापुरम् (कांतम् का पारिवारिक जीवन), मोक्कपाटी नरसिम्ह शास्त्री (बैरिस्टर पार्वतीशम्), कोडवटेगंटी कुटुंबराव (तल्ली लेनी पिल्ला (अनाथ), मोंडिवाडु (हठीला), गोपीचंद (तंड्डुलुकोडुकुलु (बापबेटा), शितिलालयम् (खंडहर) आदि विख्यात साहित्यकारों ने तेलुगु कहानी को एक नया शिल्प प्रदान किया। साथ ही पुरानी प़ीढी के साहित्यकारों की भांति युवा प़ीढी ने भी सम सामयिक परिस्थितियों को अपनी कहानियों में उकेरा है।
तेलुगु कहानी की इस रोचक यात्रा का आनंद हिंदी पाठकों को प्रदान करने के लिए राचकोंडा बहनों (राचकोंडा स्वराज्य लक्ष्मी, पारनंदि निर्मला, मुनुकुट्ल पद्म राव, गुंटूर रजनी प्रभा) ने तेलुगु पत्र पत्रिकाआें में प्रकाशित ४८ चर्चित कहानियों का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया है। उनकी सद्यः प्रकाशित पुस्तकें ‘तेलुगु की प्रतिनिधि कहानियां, भाग१, २ (२०१०) हिंदी पाठकों के समक्ष तेलुगु संस्कृति का आइना पेश करती हैं। प्रथम खंड में अवसराल रामकृष्ण राव, वेलचेटि सुबह्मणय, मल्लादि वेंकट कृष्णमूर्ति, शांति नारायण, विविन मूर्ति, चिल्ल भवानी देवी, सोदुम जयराम, वाराल कृष्णमूर्ति, मधुरांतक नरेंद्र, कवन शर्मा, धंडिकोटि ब्रह्माजी राव तथा पारनंदि निर्मला की कहानियों का अनुवाद सम्मिलित है, जबकि द्वितीय खंड में राचकोंडा सुभद्रा देवी, स्वराज्य लक्ष्मी, बलिवाड कांताराव, एल आरस्वामी, दार्ल तिरुपतिराव, शिवल जगन्नाथराव, अवधानुल विजयलक्ष्मी और वेलचेटि सुब्रह्मणयम् की कहानियों को रखा गया है। इन कहानियों में विषय वैविध्य है। इनमें वृद्धावस्था की रचनाएं, चिकित्सा क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार, वैवाहिक जीवन की विसंगतियों के साथसाथ स्त्री विमर्श, पर्यावरण विमर्श और दलित विमर्श जैसी उत्तर आधुनिक सोच से संबंधित कहानियां भी शामिल हैं।
मराठी में १९६० के बाद दलित साहित्य आंदोलन चला। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य है जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था, अछूत समस्या, जातिगत सांप्रदायिकता और दलितों के अधिकार की ल़डाई को तीव्र करना ही है। हिंदी साहित्य के साथसाथ तेलुगु साहित्य में भी दलित विमर्श ने जोर पक़डा। विद्रोह और आक्रोश वस्तुतः दलित साहित्य की मूल प्रवृत्ति है। लंबे समय से दलितों को सामाजिक तिरस्कार और शोषण का शिकार बनाया जाता रहा है। समाज सुधार और जागरण की लहर का यह सुपरिणाम है कि सदियों से दवा ‘अर्थी’, ‘विवाह’, ‘बंधन’ (सोदुम जयराम), ‘मुखिया का बैल’ और ‘दीवाल’ (वाराल कृष्णमूर्ति) द्रष्टव्य हैं।
सोदुम जयराम की कहानी ‘अर्थी’ में दर्शाया गया है कि पहले हरिजन बस्ती गांव से बाहर होती थी, पर आज हरिजन बस्ती और गांव के बीच की दूरी समाप्त हो चुकी है।‘बीते दिन तो और ही थे, वे दाने दाने के लिए मौताज होते हैं। घिनौनी जिंदगी जीते थे। मार खाकर फिर उसी किसान के वहां जा बैठते थे और अधफूंकी ब़ीडी के लिए हाथ फैलाते थे। उन्हें शायद यह महसूस ही नहीं होता था कि कितनी घिनौनी जिंदगी जी रहे थे वे। औरतों की बात का तो कहना ही क्या ? जब मर्द ही गुलामों की तरह जी रहे थे, तब उनकी औरतों का अपना अस्तित्व ही क्या रह जाता है । कभी घोंघे की चाल चलने वाला जमाना आज तीर की तेजी से भाग चला जा रहा है।’
एक ओर विश्व में अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस मनाया जा रहा है और दूसरी ओर ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के नाम पर उन्हें जमीन से विस्थापित किया जा रहा है। डॉ कवन शर्मा की कहानी ‘बचाओ’में इस बात को स्पष्ट किया गया है। ‘ब़डे ब़डे बांधों का निर्माण करने पर निर्वासित हुए लोग अब भी चालीस से अस्सी प्रतिशत निर्वासित ही हैं। आज के नेताआें के वादे केवल पानी पर खींची लकीर मात्र हैं। जिंदगी का आनंद उठाने वाले कुछ हैं, तो बली की वेदी पर च़ढने वाले कुछ और हैं।’
इस संकलन की कहानियों में स्त्री के अनेक रूपों का चित्रण भी है। स्त्री भले ही शारीरिक शक्ति में पुरुषों से कमजोर है, लेकिन उसके पास मानसिक शक्ति की कमी नहीं होती। बलिवाड कांताराव की कहानी ‘कथानायिका’ में ऐसी स्त्री की मानसिक स्थिति का वर्णन है, जिसके पास शारीरिक सुंदरता नहीं है ‘ठंडी हवा के झोंके रह रहकर बंद दरवाजों की दरारों से आ आकर गालों को थप्प़ड की मार की तरह सुन्न कर रहे थे । मेरी कल्पना की उमा में और प्रत्यक्ष उमा में जमीनआसमान का अंतर था। अपनी चिट्ठी में उतने सुंदर और कोमल भावों को व्यक्त करने वाले उमा देखने में नाटी, धंसी आंखों वाली, चिडिया सी दुबली पतली थी। ‘मुझे लगा कि जीवन की सभी इच्छाएं उसी क्षण जलकर राख हो गई और मेरी नसे फूटकर शक्तिविहीन हो गई। मैं वहीं ढेर सा प़डा रहा।’ यदि स्त्री देखने में सुंदर नहीं होती तो कोई भी उसे पसंद नहीं करता। वह स्त्री भी मानसिकता रोग का शिकार हो सकती है।
इस समाज में निःसंतान स्त्री को प्रता़डत होना प़डता है। पारनंदि निर्मला की कहानी ‘बंगारम्मा’ में निःसंतान स्त्री की मानसिक प़ीडा का वर्णन है।‘जिंदगी आराम से कट रही थी। किंतु विधाता को यह सहन नहीं हुआ। भाग्य का क्रूरतम दंड बंगारम्मा को मिली। वह यह कि उसकी गोद कभी नहीं भरी।दिन बीतते गए, वर्ष बीतते गए, जाने कितने देवी देवताआें से मनौतोयां मांगी। हर प़ेड, हर मंदिर में माथा टेका, किंतु उसके माथे पर संतान भाग्य कोई नहीं लिख पाया था। यह खोट सदा महसूस करती कि उसके बच्चा नहीं है। ससुराल में भी उस पर व्यंग्य बाण चलते, उसे नीची दृष्टि से देखते।’ लेकिन निःसंतान स्त्रियां भी स्नेहशील, ममतामयी और वात्सल्य से युक्त होती हैं, इसे नकारा नहीं जा सकता है।
दहेज प्रथा सामाजिक विसंगति है। सब लोग यह जानते हैं कि दहेज लेना और दहेज देना दोनों कानूनन अपराध हैं, फिर भी लोग दहेज लेने और देने को अपनी शान समझते हैं। यही कारण है कि दहेज न दे पाने की स्थिति में अनेक शिक्षित कन्याएं अविवाहित रह जाती हैं। अवधानुल विजयलक्ष्मी की कहानी वाह रे वाह ! बुजुर्ग में इस विषमस्थिति का मार्मिक चित्रण है।
अंततः यह कहना समीचीन होगा कि अनुवादकों ने इन दो संकलनों में प्रायः ऐसी तेलुगु कहानियों का चयन किया है, जिनमें नारी हृदय की प़ीडा और सामाजिक विसंगतियों का मर्मस्पर्शी अंकन है। कुछ कहानियों में बाल मनोविज्ञान को भी आधार बनाया गया है। इसमें संदेह नहीं कि इस अनुवाद से तेलुगु और हिंदी भाषियों के मध्य साहित्यिक ही नहीं, सामाजिक और सांस्कृतिक आत्मीयता में वृद्धि होगी, क्योंकि अनुवाद का कार्य सही अथा] में सेतुबंध का कार्य है। राचकोंडा बहनों की यह साहित्य सेवा सराहनीय है।
