जाने दो साऽऽब !
हमारे जमाल साब रह रह के नव्वे बातां सुनाते !
‘जिंदगी सुख्खे नाले के जैसा नै रहनारे ! हौले पोट्टोंऽऽ! कुछ तो भी नव्वा करके बताव् ! ‘मिन्नीस वर्ल्ड रिकार्ड’ में नामां चमकानां ! नै तो कव्वे, कुत्ते, मक़ोडे के जैसेच जीते ! मरते ! जाने के बाद लोगां याद कर लेना रेऽऽ ! जिंदगी का कुछ तो भी मकसद रहना रे’ बोले एक दिन!
उनके ‘एमोशनल बातां’ सुनके हमारा भुकया थ़ोडा ज्यादाच ‘एमोशनल’ बन गया ! और आंख्या बंद करके गुनगुनाने लगा !
उसका गुनगुनाना बोले तो ‘लौड स्पीकर’ लगा के ‘फुल सौंड’ में गाये जैसाच समझ लो!
‘जियो तो ऐसा जियो
जैसा सोब तुम्हारा हैऽऽऽ
मरो तो ऐसा के जैसा
तुम्हारा कुछ बी नईऽऽऽ’
उनो गारा था !
उसकी बेसुरी ‘तार सप्तक’ सुनके मैं चमक गया!
‘फटयाक्’ से जमाल साब की तरफ देखा !
उनो ध्यान मुद्रा में बैठे जैसेच ‘आंख्या बंद’ करके ‘कोटेशनां’ सुनारे थे ! भुकया के ‘तानां’ सुन के झटका लगे जैसेच ‘भारी भरकम’ बॉडी कू हिलाये! आंख्या तीतरबटेर के जैसा फ़डफ़डाए ! मैं दिल मेच सोंंचा ‘अब जरूर कुछ तो भी लोल्ली होतीच बोलके!’ भुकया फराकत गाना गारा था! अपने ही गाने के मस्ती में चूर था ! और ‘बगैर नॉलेज’ के हाथां भी हिलारा था !
‘फ्याऽऽड’ बोलके जमाल साब ‘तकया’ फेक के मारे और कान के परदे फटे जैसा चिल्लाये !
‘अबेऽऽ ! ओ फाल्तू केऽऽ ! चुप बैठ !! क्या अगावु फाल्तू के पोट्टे है रे बाबा अपने गांव में ! पैदाइशी पागलां मारूऽऽ ! थू: ! दुनिया बदलरी ! तुम भी जरा बदलो रेऽऽ ! इंसानों के जैसा जियो रे बोलके मैं समझारूंऽऽ ! तो ये हौले पोट्टे मेंढकों के जैसा ‘डरांऽऽव् डरांऽऽव्’ कर्रे ! थू: ! इनो नै सुधरते ! देश भी नै सुधरता ’ बोलके सनकी मेच उठके चले गये !
उधरकिधर की आसमान फट के लोगां तितरबितर भागे कते ! वो लोगां कित्ते स्पीड से भागे की हम कू तो नै मालूम ! लेकिन ‘करेंट शॉक’ लगे जैसा झटका खाके भुकया एक सेकंड ‘भावूरभावूर’ हो के देखा ! मजाक नै ! जमाल साब के तक्के का मार था वो ! दूसरे सेकंड में ‘दनादन’ कूद कूद के रफू चक्कर हो गया! अब आपकू बोलना प़डता क्या ? मैं भी फौरन गायब हो गया बोलके ?
‘हे माणसं महान! तितकेच सनकी अन् आक्रस्ताली !
केव्हां काय होईल ! नाही भरोसा ! मिकेल धक्का की देतिल टाली !!’
मल्ले में हम भोत फुरसत से सोंचे ! आंख्या बंद करके फुल्ल सोंचे ! ऐसा ‘सीरियसली सोंच विचार’ करने कूच ‘आत्ममंथन’ बोलते कते !
‘इन्ट्रावर्र्जन अंड सेल्फ थिंकिंग’ बोलते अंग्रेजी में ‘पकपक’ करने वाले महापंडित ऐसा सोंचे तो!
‘न्यूटन’ बोलके एक साब थे !
‘ऑपिल’ निच्चे गिरा तो ‘थियरियां’ लिखे कतेे!
‘फर एव्वरी ऑक्शन देर विल बी रियाक्शन’ बोले कते !
हम कू अंग्रेजी वंग्रेजी ज्यादा नै आता ! हां! थ़ोडा सा काम चलावू आता ! ‘गुड मॉर्निंग गुड ईवेनिंग’ और ‘थ्यांकयूऽऽ! सारीऽऽ’ के उप्पर हम ‘डेवलपी’च नै हुवे ! हमारे गल्ली की दुनिया में ‘अंग्रेजी’ कै कू ? गोपाल एक बार बोला ‘दुनिया में भोत लोगों कू भी कुछ ज्यादा नै समझता ! लेकिन उनो ‘रिकाटां’ बनाते बोलके ! हमारे लीडरां तो घांस, चारा, सीमेंट, चुन्ना, स्टील के राडां भी खा के ‘रिकाटां’ बनाते ! लोगां बोले ‘लीडरों का रिकाट त़ोडना भोत मुश्किल’ बोलके !
न्यूटन साब की ‘ऑक्शनरियाक्शन’ की थियरी तो स्कूल में जा के नै प़ढे तो भी हमकू मालूम थी !
अपने महान देेेश के किसी राष्ट्र, प्रांत, जिल्ला, तालुका, मोहल्ला और गल्ली में जाव्! झ़ाडों के नीचे नै तो ‘कचरा कुंंडी’ के पास फराकत सोने वाले कुत्ते कू ‘ठप्पऽऽऽक्’ बोलके इत्ता सा कंकर फेक्के मारो ! अपने इत्ते से ‘ऑक्शन’ कू कित्ता ब़डा ‘रियाक्शन’ होता?
आप खुद ही प्रॉक्टिकल करके आजम लो!
फाल्तू के गल्ली के कुत्ते क्या कर सकते ऐसा नक्को सोंचो ! एक किस्सा बता तूं !
हमारे सोमवंशी साब एक दिन आधी रात कू बस स्टयांड में उतरे ! फुकट की शान में काला कोट पेहने हुवे थे ! हमारे गल्ली के कुत्ते भोत तेज ! बस स्टयांड के कुत्ते तो भोतीच अगावु ! सोमवंशी साब पहले ‘ह्याऽऽड’ बोलके हाथां हिलाये ! फिर कुत्तों कू गालियां दिये !
उनके ‘ऑक्शन’कू पूरे कुत्ते एक हो के ‘रियाक्शन’ बताये ! ‘यूनिटी ऑल्वेसविन्स’! उनो सामने ! और १५२० कुत्ते पीछे ! बस्् ! रन्निंग रेस शुरू हो गयी ! पूरे रात भर उनो बस स्ट्यांड से ‘गांधी चौक’ ‘अंबेडकर चौक’ ‘नेहरू चौक’ ‘शिवाजी चौक’ घूूूमे! घूमे क्या ?? हैबत में भागे ! और ‘सब्जी मंडी के सामने चक्कर आके गिर गये !
मन्नान साब के ‘चिकन सेंटर’ के पास कुत्ते रुक गये ! लेट नाइट में फुकट का डिन्नर कौन छ़ोडते बोलके ?
दूसरे दिन मन्नान साब उज़डे हुवे चिकन सेंटर के सामने कट्टे पे बैठ के भोत लोल्ली किये ! इनडैरेक्ट की सोमवंशी साब के उप्परीच उनका हमला था !
‘घर में पट्टेपट्टे का फटा पैजामा पहनने वाले सूटां डाल के कैकू घूमना ? वो भी आधी रात कू ?’ बोलके भोत हंगामा करे!
सोमवंशी साब बाद में जिंदगी में ‘सूटां’ नै पहने!
न्यूटन साब के थियरी’ से पोट्टे सुधरे क्या? लोगां कुछ सीखे क्या ? ‘सेल्फ नॉलेज ईज दि बिगिनिंग ऑफ विजडम’ बोलके बोले ब़डे लोगां !
‘अंतमृख व्हा स्वत: ची ओळख करुन ह्या तरच शहाणे बनाल’ बोलके हमारे शास्त्री साब सुनाये !
‘अंदर झांको ! खुद कू पहचानो ! तभ्भीच इन्सान बन सकते ! समाज कू काम में आ सकते !’ बोलके ब़डे लोगां बोले !
क्या फायदा हुवा ? कोटेशनां किस के कान में घुसे बोलके ?
अपने लीडरों कू तनखे की फिकर लगी !
घर कू गरीब लोगां आयेे तो ‘चाय’ पिलाने कू पैसे नक्को क्या ? बोलके अपने लीडरों का ‘सिंपल सवाल’ !
गरीबों के दिल में तो हजारों सवाला है?
‘साऽऽब ! खाने कू नै है! पीने कू साफ पानी नै मिलरा ! महंगाई ब़ढरी ! क्या खाना? कैसे जीना ? मेहरबानी करके हमारे पोट्टों कू छोटी सी नौकरी दिलाव् साब ! भोत मेहेरबानी होंगीऽऽ’
बोलके हाथां पैरा प़डने वाले गरीबों कू अपने लीडरां ‘चाय पिलाते’ ?
उनकू तो सिमेंटां, राडां, चारा खाने कू च टैम बस नै होरा !
उनके ऐसे ‘ऑक्शनों’ कू गरीब लोगां एक दिन ‘रियाक्शन’ नै बताते क्या ? इत्ता सा ‘जर्नल नॉलेज’ सिखाने कू ‘न्यूटन साब’ कैकू ? उनके थियरियां कैकू ? सोमवंशी साब कू सबक सिखाने वाले कुत्ते क्या ‘न्यूटन’ कूूूूूूूूूूूूू प़ढे क्या ? मैं दिल मेच सोंचा ! यस् ! गरीब लोगां आर ग्रेट ! खाने कू पीने कू नै मिले तो भी हवा खाके दिनां गुजारते ! हमारे ‘महान लीडरां’ कुर्सी गये तो जिंदा रहते क्या ? तनखा नै ब़ढी तो ‘गरीबों’ कू याद करते क्या?
रखमी चिल्लाई ‘अईऽऽ ! क्या येडे है अपने लोगां ? नींद में भी ‘तनखा तनखा’ बोलके चिल्लारे ! दीवाने कहीं केऽऽ !!’ बोलके !
उनो सच बाेेली ! दीवानेच चिल्लाते ! क्या करते ? जाने दोसाऽऽब!!!
डॉ जेपी वैद्य
