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‘तीन पत्ती’

Swatantra Vaartha  Fri, 26 Feb 2010, IST

teen patti‘तीन पत्ती’

एक जमाना था जब अमिताभ बच्चन की फिल्में रिलीज हुआ करती थी तो धूम मच जाती थी। वहीं आज अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘तीन पत्ती’ रिलीज हो रही है । अमिताभ अब उनके साथ काम करने वालों की तमन्ना पूरी करते दिख रहे हैं। इस फिल्म से शक्ति कपूर की बेटी श्वेता कपूर भी डेब्यू कर रही है।

अमिताभ बच्चन और हिन्दूजा परिवार के रिश्ते बहुत पुराने हैं। अब जब यह परिवार फिल्म निर्माण के क्षेत्र में आया हैं तो उन्होंने मित्रता को एक नए सूत्र में बांध लिया हैं। याद रहें क्रिकेट और तीन पत्ते बहुत ही अनिश्चय के खेल हैं, लेकिन इनके पैटर्न को समझने का प्रयास किया जाता रहा है। इंदौर के ही अंषुमान विजयवर्गीय ने एक दिवसीय क्रिकेट में संभावना की थ्यौरी पर बहुत काम किया हैं। सिनेमा में तीन पत्तों के खेल का नाटकीय प्रयोग अनेक फिल्मों में हम देख चुके हैं। हॉलीवुड की फिल्म में नायक लंबी और अत्यंत महंगी बाजी के बाद कहता हैं कि उसके पास तीन बादशाह हैं। वह दो बादशाह टेबल पर रखता हैं और कहता हैं कि तीसरा बादशाह वह स्वयं हैं। ऐसा कहा जाता हैं कि राजकपूर अपनी फिल्म ‘श्री ४२०’ में पत्ते लगाने के विशेषज्ञ के रूप में पेश हुए थे। उन्हें यह ट्रिक दिलीप कुमार ने सिखाई थी, जो यथार्थ जीवन में पचास के आसपास ट्रिक्स लगाने के मास्टर माने जाते रहे हैं। अधिकांश हम फिल्मों में देखते हैं कि विलेन एक पत्ता अपनी बॉंह में छुपाता हैं या अड्डे पर डांस कर रही कैबरे डॉंसर उसे इशारों में पत्तों के नंबर बताती रहती हैं और नायक की हार तय करती हैं।

इस फिल्म की कहानी में वैंकट सुब्रह्मूयम (अमिताभ बच्चन) एक गणितज्ञ हैं। उसे अपने विषय में दक्षता हासिल हैं। रातदिन वह चिंतन मनन में ही खोया रहता है। वह एक नई थ्योरी प्रस्तुत करता है, लेकिन उसके वरिष्ठ प्रोफेसर थ्योरी को नकार देते हैं। ताश खेलते समय एक दिन वेंकट को लगता हैं कि ताश के माध्यम से इस थ्योरी को बेहतर तरीके से समझाया जा सकता हैं। वेंकट को लगता हैं कि ताश और प्रायिकता यानि संभावना के सिद्धांतों के बीच कुछ संबंध है। वह इस बारे में अपने जुनियर प्रोफेसर शांतनू (माधवन) को बताता हैं। दोनों निर्णय लेते हैं कि जुआ घर में जाकर इस थ्योरी को परखना चाहिए। ताश खेल रहे अन्य खिला़डयों के पत्तों के बारे में इस थ्योरी से वे जान लेते हैं कि किसके पास कौनसे पत्ते हैं। लंदन के केसिनों में वेंकट की मुलाकात पर्सी ट्‌चटेबर्ग (बेन किंग्सले) से होती हैं जो दुनिया का सबसे ब़डा जीवित गणितज्ञ हैं। वेंकट के समीकरणों से पर्सी यह जान लेता हैं कि प्रायिकता के सिद्धांतों को नए सिरे से लिखना होगा। वेंकट की थ्योरी के जहां एक और अच्छे परिणाम हैं तो बुरे भी हैं। एक ओर उसकी खोज का उपयोग कई जगह किया जा सकता हैं तो दूसरी ओर मनुष्य अपने लालच के लिए भी इसका उपयोग कर सकता है। क्या वेंकट को अपने ज्ञान की कीमत जान से चुकानी होगी? इस फिल्म के बारे में अमिताभ बच्चन कहते हैं‘यह फिल्म एक विश्वविद्यालय और वहां के एक प्रोफेसर जो कि गणितज्ञ हैं की कहानी है। एक दिन प्रोफेसर कंप्यूटर पर ताश का खेल खेल रहे होते हैं, तो अचानक वह प्रोबेबिलिटी के अपने सिंद्धांत को लगाकर ताश खेलने लगते हैं और जीत जाते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार जुआँ खेलते समय किसी एक खिल़ाडी का एक पत्ता देखने के बाद प्रोफेसर अपने सिद्धातं से पता लगा लेते हैं कि दूसरे खिला़डयों के पास कौनसेपत्ते हैं। फिर प्रोफेसर अपने एक जूनियर के सुझाव पर जुआघर जाते हैं। वहां एक बार जीतने के बाद जुआघर जाने का उनका सिलसिला बन जाता हैं। इससे उनके पास बहुत पैसा आता हैं और फिर वो पैसा अपना खेल दिखाता हैं, जिसकी वजह से प्रोफेसर कई दूसरी समस्याआें में फंसते चले जाते हैं।

इस फिल्म के अन्य कलाकारों में रायमा सेन, सुष्मिता सेन और धुव्र गणेश, श्रद्धा कपूर, सिद्धार्थ खेर, वैभव तलवार , सायरा मोहन के अलावा मेहमान कलाकारों में अजय देवगन, जैकी श्रॉफ, महेश मांजरेकर, शक्ति कपूर, टीनू आनंद और गणेश यादव डैनी प्रमुख हैं। इसकी कथापटकथा शिवकुमार सुब्रह्मूयम और लीना यादव की हैं। संगीत सलीम सुलेमान का हैं।

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