तीन पत्ती
दो टूक : जुए में ताश के पत्ते लगाना बेशक आसान हो, लेकिन जिंदगी में उसकी मर्जी के बगैर आप उसके पत्तों के बारे में कुछ नहीं जान सकते। यही नहीं, हो सकता है कि जिंदगी में ताश के पत्तों से ज़ुडी कोई सच्चाई आपको जिंदगी और मौत के एक ऐसे खेल में फंसा दे, जिससे निकलना मुश्किल ही नहीं, बल्कि नामुमकिन हो। सो निर्देशक लीना यादव की अमिताभ बच्चन, सर बेन किंग्सले, आर माधवन, रायमा सेन और नई अभिनेत्री श्रद्धा कपूर के अभिनय वाली उनकी नयी फिल्म ‘तीन पत्ती’ भी जिंदगी के कुछ ऐसे खतरनाक पन्नों को दिखाने वाली है।
अब यह बात अलग है कि इसकी बहुत सारी घटनाएं और पात्र हॉलीवुड की फिल्म ‘ट्वेंटी वन’ से मिलते जुलते हैं।
कहानी : फिल्म की कहानी वेंकट (अमिताभ बच्चन) नाम के मशहूर गणितज्ञ की है। उसे जिंदगी और ताश के पत्तों के खेल में कई समानताएं नजर आती हैं, लेकिन इससे ज़ुडी थ्योरी को उसके वरिष्ठ प्रोफेसर नकार देते हैं। लंदन में ताश खेलते समय एक दिन वेंकट को लगता है कि ताश के माध्यम से इस थ्योरी को बेहतर तरीके से समझाया जा सकता है। वह इस बारे में अपने जूनियर प्रोफेसर शांतनु (माधवन) को बताता है। दोनों निर्णय लेते हैं कि जुआ घर में जाकर इस थ्योरी को परखना चाहिए। यही नहीं, वे वहां ताश खेल रहे अन्य खिला़डयों के पत्तों के बारे में इस थ्योरी से वे जान लेते हैं कि किसके पास कौनसे पत्ते हैं। वहीं एक केसिनो में वेंकट की मुलाकात पर्सी (बेन किंग्सले) से होती है, जो दुनिया का सबसे ब़डा गणितज्ञ है। पर पर्सी उसे बताता है कि वेंकट की थ्योरी के जहां एक ओर अच्छे परिणाम हैं, तो बुरे भी हैं और जब सचमुच उसकी थ्योरी के परिणाम को शांतनु जैसे ही लोग अपने लालच के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं, तो उसकी जिंदगी भी मौत के एक ऐसे गुंजल में फंस जाती है, जहां से निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। जिंदगी के कुछ ऐसे ही खतरनाक गुंजलों को दिखाने वाली है ‘तीन पत्ती’, जिसमें रायमा सेन, ध्रुव गणेश, सिद्धार्थ खेर, सायरा मोहन, शद्धा कपूर, डैनी डेंजोंगपा, सुष्मिता सेन, अजय देवगन, जैकी श्रॉफ, महेश मांजरेकर, इरफान खान, बोमन ईरानी, टीनू आनंद, शक्ति कपूर, गणेश यादव, मीता वशिष्ठ और पंकज झा के चरित्र भी आते जाते रहते हैं।
गीत संगीत : फिल्म में इरफान सिद्दीकी, आसिफ अली बेग और अजिंक्य अय्यर के लिखे गीत हैं और संगीत सलीम सुलेमान का है, लेकिन चूंकि यह फिल्म पश्चिमी पात्रों और चरित्रों के मूड वाली है, इसलिए इसके गीत भी उसी परिस्थिति के अनुसार लिखे गये हैं। इसमें केवल सुनिधि चौहान का गाया नीयत जैसे बोलों वाला एक ही गीत ऐसा है, जिसे देखने और गुनगुनाने में आपको मजा आ सकता है। पर यह एसिड फैक्ट्री में मानसी स्कोट के गाए गीत खट्टीमिठी की याद दिलाने वाला है। बाद में इसे बिग बी की आवाज में भी फिल्माया गया है। इसी तरह इक्का बादशाह रानी जैसा गीत भी सुनने लायक है। पर यह ऐसा नहीं की याद रखा जा सके।
अभिनय : दरअसल फिल्म की कहानी बेन किंग्सले से शुरू होती है और फिर अमिताभ से होती हुई फिल्म के बाकी के पात्रों से ज़ुड जाती है, लेकिन मध्यांतर तक कुछ पात्रों और चरित्रों को लेकर रहस्य बना रहता है। फिल्म की भ़ीड में कई ऐसे कलाकार हैं, जिन्हें कुछ भी करने का मौका नहीं मिला है। पूरी फिल्म के केंद्र में बिग बी हैं और वही अंत तक छाये रहते हैं। हालांकि उनका लुक और उनके पात्र के चित्रांकन में कुछ नया नहीं है। शब्द बनाने वाली लीना ने भी उनके चरित्र का ऐसा कोई विस्तार नहीं दिया है, जो उन्हें कुछ नया करने का मौका देता। पर मध्यांतर के बाद वे जरूर उभरकर सामने आ जाते हैं। माधवन अब ऐसे चरित्रों के अभ्यस्त हो गए हैं, लेकिन उनके पात्र के रहस्य और अवयव तत्व उन्हें खलनायक की तरह सामने लाते हैं। नयी अभिनेत्री श्रद्धा कपूर सुंदर तो है, लेकिन अभी उन्हें तीन पत्ती कुछ ऐसा करने का मौका नहीं देती, जो किसी नयी अभिनेत्री में संभावनाआें को दर्शाती हो। इसके अलावा जैकी, अजय देवगन और शक्ति कपूर के अलावा टीनू आनंद और कुछ नए चेेहरों को भी कुछ करने का मौका नहीं मिला है। पर नए चेहरों में सिद्धार्थ, ध्रुव और वैभव ठीक लगे हैं।
निर्देशन : फिल्म की कहानी लीना ने अपने सहयोगी शिव सुब्रमूयम के साथ खुद लिखी है, लेकिन उसके कई ऐसे पेंच हैं, जो उनकी पटकथा और कहानी के विस्तारों को उनकी पहली फिल्म शब्द की तरह ही प्रश्नों से घेर देती है। फिल्म में कुछ ऐसे प्रसंग जरूर हैं, जो संवेदनशीलता और भावुकता वाले हैं, लेकिन इसके बावजूद ये किसी ऐसी कहानी और प्रस्तुतिकरण की पैरवी नहीं करते, जो लीना को स्थापित करे।
फिल्म क्यों देखें : यदि बिग बी के प्रशंसक हों।
फिल्म क्यों न देखें : ऐसा कुछ नहीं जो भ़ीड को खींचे।
