कार्तिक कॉलिंग कार्तिक
दो टूक : डर आपके भीतर होता है बाहर नहीं। यदि आप चाहें तो इसे कभी भी काफूर कर सकते हैं। बस इतना सा संदेश देती है निर्देशक से अभिनेता बने फरहान अख्तर, दीपिका पादुकोण और शेफाली छाया की मुख्य भूमिका वाली निर्देशक विवेक लालवानी की फिल्म ‘कार्तिक कॉलिंग कार्तिक’।
कहानी : फिल्म की कहानी कार्तिक (फरहान अख्तर) नाम के बेहद शर्मीले और कम बोलने वाले एक युवक की है। अपने दफ्तर में काम करने वाली सोनाली (दीपिका पादुकोण) से वह प्रेम करता है। पर एक रात जब कार्तिक के फोन की घंटी बजती है तो वह रोज बजने लगती है। कार्तिक उस इंसान से बात करने लगता है, जिसके बारे में वो जानता तक नहीं। फोन करने वाला दावा करता है कि वह कार्तिक है। वह फोन पर यह भी कहता है कि वह कार्तिक की जिंदगी बदलने के लिए आया है। कार्तिक उसकी बात मान लेता है। इसके बाद कार्तिक और सोनाली की जिंदगी में ऐसा बदलाव आता है, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। सोनाली का मानना है कि उसे खुद को मनोचिकित्सक डॉक्टर कपा़डया (शेफाली छाया) को दिखाना चाहिए। पहले वो तैयार नहीं होता, लेकिन एक दिन सोनाली के कहने पर जब कपा़डया घर आती है, तो खुद हैरान रह जाती है। फोन पर कार्तिक के सामने ही कार्तिक नाम का कोई आदमी बात कर रहा है। इस बदलाव के चलते न केवल सोनाली की बल्कि कपा़डया की जिंदगी और रिश्ते भी बदल जाते हैं, बल्कि वे अलग भी हो जाते हैं। कार्तिक कोचीन में काम करने लगता है। जहां न कोई फोन आता है और ना ही उसे कोई तंग करता है। पर जब उसका एक साथी (यतिन कायरेकर) उसे फोन लेने की जिद करता है, तो एक बार फिर उसकी जिंदगी में वही दूसरा कार्तिक लौट आता है, जिसे वो छ़ोड आया था।
गीतसंगीत : फिल्म में यूंं तो कोई पारंपरिक गीत नहीं है, लेकिन इसके बावजूद फिल्म में जावेद अख्तर के लिखे छ: गीत हैं। संगीत शंकरएहसानलॉय का है। कैलाश खेर, सुकन्या और केके का गाये जानेे ये क्या हुआ, कैसी है यह उदासी छायी जैसे गीतों के अलावा सब गीत साधारण हैं। हां एक और गीत चाहे तो आप सुन लें और वह गीत है शंकर और आलिशा मेंडोसा का गाया ‘उफ तेरी अदा’ जैसे बोलों वाला गीत।
अभिनय : अब फरहान के बारे में क्या कहूं। वो जो चाहे बने, लेकिन अभिनय उनके बस का रोग नहीं। प्लीज फरहान निर्देशन करो ना। ना तो उनके चेहरे पर भाव आता है और न ही उनकी संवाद अदायगी में उतारच़ढाव वाली प्रतिभा दिखायी देती है। दीपिका तुमने ये फिल्म क्यों की मुझे नहीं समझ आया। शेफाली बस खानापूर्ति करती हैं। अब किया भी क्या जाए, जब फिल्म में कुल जमा तीन ही पात्र हों। पर अब इसे फरहान की किस्मत ही कहा जायेगा की तीन पत्ती के मुकाबले लोगों को कार्तिक कॉलिंग कार्तिक जरा ज्यादा पसंद आयी है।
निर्देशन : फिल्म का विचार अच्छा था। लेकिन फोन से फोन करने का विचार जरा अटपटा है। मल्टिपल मानसिक विकार और डर के कई उदाहरण फिल्म में हैं। पर निर्देशक लालवानी जी कुछ फ्रेम और रखते तो ज्यादा अच्छा होता। फिल्म बहुत सूखी और धीमी है। फ्रेम्स के रंग अच्छे हैं, लेकिन फरहान और दीपिका की ज़ोडी में इस फिल्म को देखना बाप रे बाप।
फिल्म क्यों देखें : यदि फरहान अख्तर के प्रशंसक हों।
फिल्म क्यों न देखें : यदि मुझसे न पूछे तो बेहतर, वर्ना लोग मुझे फरहान से ईर्ष्या करने वाला समझेंगे।
