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अतिथि तुम कब जाओगे

Swatantra Vaartha  Sun, 28 Feb 2010, IST

अतिथि तुम कब जाओगे

एक समय था यानि १९८० का दशक, तब कॉमेडी फिल्में भी चला करती थीं। साथ ही उनका संगीत भी कॉमेडी टच लिए होता था। आजकल की कॉमेडी का टेस्ट कुछ अलग है। फिर भी प्रयासों की प्रशंसा अवश्य ही की जानी चाहिए। अजय और कोंंकणा की इस फिल्म का संगीत भी सुनने लायक तो है। इस फिल्म के गीत इरशाद कामिल ने लिखे हैं, जिसे प्रीतम और अमित मिश्रा ने संगीत दिया है। इसमें कुल ९ गीत हैं। रिमिक्स का त़डका इसके तीन गीतों में है। हां, यह जरूर है कि सिचुएशनल कॉमेडी के अनुसार गीत लिखे गये हैं। इसके गीत लाउड अवश्य हैं, लेकिन सहजता और सरसता को बरकरार रखा गया है। इसका पहला गीत है ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ को अमित मिश्रा ने कम्पोज करने के साथ गाया भी है। इसमें उन्होंने देसी ट्‌यून को वेस्टर्न संगीत की तर्ज पर बीट्‌स का उपयोग किया गया है। यह पुराने गीत ‘दो बेचारे बिन सहारे’ की याद दिलाता है। दूसरा गीत ‘ज्योति जलई ले’ को सुखविंदर सिंह ने गाया है, जो नवरात्रि में बजने वाले रिमिक्स गीतों की याद दिलाता है। वैसे यह ‘बीडी जलई ले’ की पूरी कॉपी लगता है। सुनने में अच्छा लगता है। आगे ‘ना जाने तुम कब आओगे’ को अनुपम आमोद ने एसडी बर्मन स्टाईल में गाया है। ‘आजाआजा’ यह एक फास्ट गीत है, जिसे प्रीतम ने फनी बनाया है। इसे रघुवीर यादव, अजय झिंगरन और रजनीश ने गाया है। यह एक कैची गीत है। इसका रिमिक्स भी मौज्दू है। ‘सुख कर्ता, दु:ख कर्ता’ एक मराठी आरती का रिमिक्स वर्जन बनाया गया है, जिसे अमित मिश्रा ने गाया है। जाहिर है यह एक डिवोनशल गीत की धुन भी सुंदर है, लेकिन सवाल यह उठता है कि धार्मिक भावनाआें से ज़ुडी आरतियों को रिमिक्स करने की इजाजत नहीं देनी चाहिए, क्योंकि यह हमारी आस्था से ज़ुडी चीजें हैं और उन्हें हास्यविनोद के लिए उपयोग किया जा रहा है, जो गलत है। प्रीतम और अमित मिश्रा की टीम ने बहुत ज्यादा नया किया है, ऐसी उम्मीद लगाना बेकार है। जंगली म्यूजिक ने इसे १५०/ रुपये में जारी किया है।

दो दिलों के खेल में

नए कलाकारों की फिल्म हो और गीतसंगीत अच्छा हो, तो उस फिल्म के चलने की उम्मीद बंध जाती है। ऐसी उम्मीद हम इस फिल्म से कर सकते हैं। कुल ७ गीतों में एक ही रिमिक्स है, जो बहुत अच्छी बात है। इस सीडी की खासियत यह भी है कि कम से कम इनले कार्ड पर पूरी एक लाईन दी गयी है, जिससे गीतों के बारे में पता चल जाता है कि किस टाईप का गीत है। गीतकारों पंछी जालोनवी, विजय अकेला, नफीस आलम और सजीत चौबे के गीतों को डब्बू मलिक, सतीशअजय और सुजीत चौबे ने संगीत दिया है।

पहला गीत रोमांटिक है। इसके बोल हैं ‘जाने क्यूं प्यार में’ को श्वेता पंडित और डब्बू मलिक ने ही गाया व कम्पोज किया है। इसका रिमिक्स भी है, जो अच्छा लगता है, लेकिन मूल रचना की बात ही कुछ और है। अब रेखा भारद्वाज की आवाज श्रोता जानने लगे हैं और फ़डकते गीतों की ही उम्मीद करते हैं। ‘रेशम का दुपट्‌टा’ उनकी अच्छी प्रस्तुति है। आगे सोहम की आवाज में ‘अजनबी एहसास को’ एक मीठा गाना है, उनकी आवाज में कशिश मौजूद है। ‘समझदार को इशारा काफी है’ एक कोरस टाईप गीत है, इसे सुनिधि चौहान, संदीप आचार्य हर्षदीप, डब्बू मलिक और एडी ब्वायज ने गाया है। इसमें सुनिधि ने खुलकर गाया है। यह ठीकठाक बन प़डा है। एक लंबे अर्से के बाद किसी फिल्म में ‘होली’ गीत आया है, जिसके लोकप्रिय होने के चांसेस हैं। उदित नारायण, श्रेया घोषाल, दीपक गिरी और शालिनी श्रीवास्तव के स्वरों में ‘रंग डालूंगा चुनरी’ बहुत ही ब़ढया गीत है। इसके बोल भी अच्छे हैं। अंत में कैलाश खेर का ‘तेरी याद आयी’ है। कैलाश अब टाईप्ड होते जा रहे हैं। उन्हें अपनी आवाज में अब थ़ोडा प्रयोग करना चाहिए। उदाहरण के लिए मैं बता दूं कि उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि गायक नीतिन मुकेश क्यों नहीं चल पाए, क्योंकि एक जैसी आवाज हर अदाकार पर सूट नहीं होती थी। डब्बू मलिक के संगीत की तारीफ अवश्य ही करनी होगी। वर्ल्ड वाईड रिकॉड्‌र्स ने इसे १२५/ रुपये में जारी किया है।

सौ बार जनम लेंगे रफी भाग४

शेमारू इंटरटेनमेंट की ओर से लगातार पुराने गायक/संगीतकारों की यादों को ताजा करने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। भाग३ की चर्चा मैं इसके पहले कर चुका हूं। मोहम्मद रफी के डिफरेंट मूड और यादों को ताजा करता यह अलबम एक दर्जन गीतों की ल़डयां लेकर आया है, जिसमें ‘ऐसे तो ना देखो, छ़ेडा मेरे दिल ने तराना तेरे प्यार का, मिले ना फूल तो, सौ बार जनम लेंगे, काली घटा छाई प्रेम रूत आयी, चांदनी रात में यूं, अगं बाई मैके तू जाउ नको’ जैसे लोकप्रिय गीत हैं। इसमें तीन देवियां, काला बाजार, दिल देके देखो, असलीनकली, अनोखी रात, काली घटा, उस्तादों के उस्ताद, शाका, मेरा करम मेरा धरम, एक श्रीमान एक श्रीमति और अमर अकबर एंथोनी’ फिल्में शामिल हैं। शेमारू इंटरटेनमेंट की यह वीसीडी ४५/ रुपये की है, जिससे रफी की यादें ताजा हो जाती है।

संजय एमतराणेकर

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